रोते फिरते हैं सारी सारी रात, अब यही रोज़गार है अपना

Siraj Mahi
Jul 31, 2024

बेवफ़ाई पे तेरी जी है फ़िदा, क़हर होता जो बा-वफ़ा होता

शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ, दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का

क्या कहें कुछ कहा नहीं जाता, अब तो चुप भी रहा नहीं जाता

शर्त सलीक़ा है हर इक अम्र में, ऐब भी करने को हुनर चाहिए

क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़, जान का रोग है बला है इश्क़

फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थे, पर हमें उन में तुम्हीं भाए बहुत

दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है, ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया

कोई तुम सा भी काश तुम को मिले, मुद्दआ हम को इंतिक़ाम से है

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