Urdu Poetry: "दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूं या रब"

Siraj Mahi
Aug 06, 2024

इल्म में भी सुरूर है लेकिन, ये वो जन्नत है जिस में हूर नहीं

हया नहीं है ज़माने की आँख में बाक़ी, ख़ुदा करे कि जवानी तिरी रहे बे-दाग़

सौ सौ उमीदें बंधती है इक इक निगाह पर, मुझ को न ऐसे प्यार से देखा करे कोई

फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का, न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है

नशा पिला के गिराना तो सब को आता है, मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी

न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालो, तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा, हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा

तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया, यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी

दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब, क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो

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