'दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता'; निदा फाजली के शेर

Siraj Mahi
Sep 20, 2023

ब किसी से भी शिकायत न रही... जाने किस किस से गिला था पहले

अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला... हम ने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला

यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें... इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

स के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा... वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता... कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी... जिस को भी देखना हो कई बार देखना

दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता... दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए

कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है... सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है

हर एक बात को चुप-चाप क्यूँ सुना जाए... कभी तो हौसला कर के नहीं कहा जाए

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