Poetry on Lips: 'नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए'; पढ़ें होठों पर चुनिंदा शेर

Siraj Mahi
Aug 21, 2023

अनवर शऊर
मुस्कुराए बग़ैर भी वो होंट... नज़र आते हैं मुस्कुराए हुए

नासिर काज़मी
एक दम उस के होंट चूम लिए... ये मुझे बैठे बैठे क्या सूझी

मीर तक़ी मीर
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए... पंखुड़ी इक गुलाब की सी है

फ़रहत एहसास
एक बोसे के भी नसीब न हों... होंठ इतने भी अब ग़रीब न हों

मिर्ज़ा ग़ालिब
कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब... गालियाँ खा के बे-मज़ा न हुआ

अहमद फ़राज़
सो देख कर तिरे रुख़्सार ओ लब यक़ीं आया... कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी

अनवर शऊर
सिर्फ़ उस के होंट काग़ज़ पर बना देता हूँ मैं... ख़ुद बना लेती है होंटों पर हँसी अपनी जगह

काविश बद्री
एक बोसा होंट पर फैला तबस्सुम बन गया... जो हरारत थी मिरी उस के बदन में आ गई

अहमद हुसैन माइल
दूर से यूँ दिया मुझे बोसा... होंट की होंट को ख़बर न हुई

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