Poetry
रहमतों से निबाह में गुज़री उम्र सारी गुनाह में गुज़री

Aug 04, 2023

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लम्हा लम्हा बार है तेरे बग़ैर ज़िंदगी दुश्वार है तेरे बग़ैर

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हाए वो ज़िंदगी की इक साअत जो तिरी बारगाह में गुज़री

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जीने वाले क़ज़ा से डरते हैं ज़हर पी कर दवा से डरते हैं

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बदलती जा रही है दिल की दुनिया नए दस्तूर होते जा रहे हैं

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आप जो कुछ कहें हमें मंज़ूर नेक बंदे ख़ुदा से डरते हैं

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वो हम से दूर होते जा रहे हैं बहुत मग़रूर होते जा रहे हैं

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वो हवा दे रहे हैं दामन की हाए किस वक़्त नींद आई है

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हम से मय-कश जो तौबा कर बैठें फिर ये कार-ए-सवाब कौन करे

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तुझ से बरहम हूँ कभी ख़ुद से ख़फ़ा कुछ अजब रफ़्तार है तेरे बग़ैर

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