यूँ तो सारा चमन हमारा है, फूल जितने भी हैं पराए हैं

जाती है धूप उजले परों को समेट के, ज़ख़्मों को अब गिनूँगा मैं बिस्तर पे लेट के

पहले तो मेरी याद से आई हया उन्हें, फिर आइने में चूम लिया अपने-आप को

भीगी हुई इक शाम की दहलीज़ पे बैठे, हम दिल के सुलगने का सबब सोच रहे हैं

रहता था सामने तिरा चेहरा खुला हुआ, पढ़ता था मैं किताब यही हर क्लास में

कोई भूला हुआ चेहरा नज़र आए शायद, आईना ग़ौर से तू ने कभी देखा ही नहीं

तू ने कहा न था कि मैं कश्ती पे बोझ हूँ, आँखों को अब न ढाँप मुझे डूबते भी देख

लोग देते रहे क्या क्या न दिलासे मुझ को, ज़ख़्म गहरा ही सही ज़ख़्म है भर जाएगा

सोचो तो सिलवटों से भरी है तमाम रूह, देखो तो इक शिकन भी नहीं है लिबास में

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