'मुझे पढ़ता कोई तो कैसे पढ़ता'; वसीम बरेलवी के चुनिंदा शेर

Siraj Mahi
Sep 11, 2023

मुझे पढ़ता कोई तो कैसे पढ़ता... मिरे चेहरे पे तुम लिक्खे हुए थे

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा... किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है... भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है

आते आते मिरा नाम सा रह गया... उस के होंटों पे कुछ काँपता रह गया

हर शख़्स दौड़ता है यहाँ भीड़ की तरफ़... फिर ये भी चाहता है उसे रास्ता मिले

मैं बोलता गया हूँ वो सुनता रहा ख़ामोश... ऐसे भी मेरी हार हुई है कभी कभी

झूट वाले कहीं से कहीं बढ़ गए... और मैं था कि सच बोलता रह गया

बहुत से ख़्वाब देखोगे तो आँखें... तुम्हारा साथ देना छोड़ देंगी

झूट के आगे पीछे दरिया चलते हैं... सच बोला तो प्यासा मारा जाएगा

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