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नई दिल्ली: सैयद अब्बास मेहदी रिज़वी: 1990 में सोवियत यूनियन से अज़रबइजान आज़ाद हुआ. आज़ादी मिलने के बाद तेल और गैस से मालामाल इस छोटे मुल्क ने तेल से मिलने वाली दौलत से पिछले 20 बरसों में ख़ूब तरक़्क़ी और ख़ुशहाली हासिल की. अज़रबैजान की दारुल हुकूमत बाकूमुल्क की तरक्क़ी की तर्जुमानी करता है. आज के बाकू की तस्वीर 1994 के बाकू की तस्वीर से बिलकुल बरअक्स है.
यह वह साल था जब अज़रबैजान और अर्मेनिया के बीच नागोर्नो-काराबाख के इलाक़े में 6 साल से जारी जंग का ख़ात्मा हुआ था. हालांकि ख़ित्ते में तनाव कभी कम नहीं हुआ. दोनों मुल्कों के बीच इस पहाड़ी इलाक़े में कई बार झड़पें हो चुकी हैं. 2016 में भी चार दिनों की एक जंग हुयी थी जिसमें 200 से ज़्यादा अफ़राद हलाक हुए थे.
क्यों बार-बार होता है टकराव
अर्मेनिया और अज़रबैइजान के बीच लड़ाई की अस्ल वजह नागोर्नो-काराबाख पर कंट्रोल और अज़रबैजाइन के इलाक़ों पर मुक़ामी अर्मेनिया की आबादी का क़ब्ज़ा है. नागोर्नो-काराबाख बुनियादी तौर पर अज़रबैइजान की सरहद के अंदर वाक़े एक पहाड़ी है लेकिन यहां पर आबादी की अक्सरियत अर्मेनिया के साथ जाना चाहती है. हालांकि आलमी सतह पर इस इलाक़े को अज़रबैइजान का हिस्सा तस्लीम किया जाता है.
6 साल तक चली थी दोनों मुल्कों में जंग
साल 1988 से 1994 तक जारी रहने वाली जंग के दौरान अर्मेनिया की मदद से नागोर्नो काराबाख़ के मुक़ामी जंगजुओं ने अज़रबैइजान के सात इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर लिया था.1994 में दोनो मुल्कों के बीच जंग बदी तो हुयी लेकिन कोई अम्न समझौता नहीं हुआ अज़रबैइजान उन सात इलाक़ों पर आज भी मुक़ामी अर्मेनी आबादी का क़ब्ज़ा है. जिस पर दोबारा कंट्रोल करने के लिए अज़रबैइजान बेचैन है. 2016 में अज़रबैइजान कुछ इलाक़ों पर क़ब्ज़ा करने में कामयाब भी हो गया था.
दुनिया की नज़र इस जंग पर
दोनों मुल्कों की फ़ौजी ताक़त भी महदूद है. दोनों ही मुल्क ज़्यादा लंबी लड़ाई नहीं लड़ सकते. हालांकि ये साफ़ नहीं हो पाया है कि मौजूदा कशीदगी का आग़ाज़ किस मुल्क ने किया. लेकिन दुनिया भर के दूसरे ममालिक ने अम्न क़ायम रखने की बात की है. अमेरिका और रुस ने फ़ौरन जंग रोकने की अपील की है तो वहीं तुर्की ने अज़रबैइजान की खुले तौर पर हिमायत की है. ईरान जिसकी सरहद दोनों मुल्कों से लगती है उसने सालसी (मध्यस्थता) की पेशकश की है.
बड़ी शक्ल अख़्तियार कर रही है ये जंग
अज़रबैइजान-अर्मेनिया के बीच जारी जंग के बीच लोगों के मन में एक सवाल तेज़ी से पैदा हो रहा है कि कहीं ये आलमी जंग की आहट तो नहीं. नागोर्नो-काराबाख के पहाड़ी इलाके को लेकर इतवार से अर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच जंग चल रही है. दोनों ही तरफ़ से भारी हथियारों का इस्तेमाल किया जा रहा है. अर्मेनिया के मिसाइल हमले में अज़रबैजान के कई टैंक तबाह हुए थे तो अज़रबैजान ने भी जवाबी हमले में देर नहीं लगाई.
अज़रबैजान की ओर से अर्मेनिया के ख़िलाफ़ ड्रोन जंग छेड़ दिया गया है. ड्रोन के ज़रिए अज़रबैजान दुश्मन देश अर्मेनिया के टैंकों को तबाह करने पर तुला है. दावा किया जा रहा है कि अज़रबैजान तुर्की से ख़रीदे गए ड्रोन का इस्तेमाल हमले के लिए कर रहा है.
अज़रबैजान ने तुर्की से बायरक्तार TB 2 ड्रोन ख़रीदा था. ये औसत ऊंचाई पर उड़ते हुए लंबीदूरी तक हमला करने की सलाहियत रखता है. अर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच जंग में सिर्फ़ ड्रोन ही नहीं बल्कि तोप, टैंक, रॉकेट और फाइटर जेटका भी इस्तेमाल हो रहा है. दोनों मुल्कों के बीच जंग में अब आम शहरियों को मुश्किल का सामना करना पड़ा रहा है. दोनों तरफ़ से दर्ज़नों लोग मारे जा चुके हैं. लोगों के घर तबाह हो गए हैं. अर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच जंग अब धीरे-धीरे अज़ीम जंग मेंबदलती जा रहा है. दोनों मुल्कों की हिमायत में दुनिया के अलग-अलग मुल्क खड़े हो गए हैं. जिससे वर्ल्ड वॉर का ख़तरा मंडरा रहा है.
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