How Does the Islamic Banking System Work: आर्थिक संकट, अमीर-गरीब में बढ़ती खाई के बीच दुनियाभर में एक बार फिर इस्लामिक बैंकिंग की मांग जोर पकड़ने लगी है. हालिया दिनों अफगानिस्तान ने भी इस्लामिक बैंकिंग को अपनाने का ऐलान किया है. इस्लाम में ब्याज (सूज) या रिबा हराम है, तो फिर इस्लामिक बैंक कैसे काम करता है. आइये जानते हैं कि वह कैसे मुनाफा कमाने के साथ कस्टमर्स को भी फायदा पहुंचाता है.
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Islamic Banking System: अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने गुजिश्ता दिनों पूरे देश में इस्लामिक बैंकिंग कानून लागू करने का ऐलान किया था. इसके बाद एक बार फिर पूरी दुनिया में इस्लामिक बैंकिंग को लेकर चर्चा शुरू हो गई है, और इस सिस्टम को अपनाने की बात जोर पकड़ रही है. वह भी एक ऐसे दौर में जब इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ पूरी दुनिया में नैरेटिव तैयार किए जा रहे हों. दरअसल, इस्लाम ने हमेशा से इंसाफ और संतुलन पर आधारित आर्थिक व्यवस्था की बात की है.
खासकर ब्याज यानी रिबा को नुकसानदायक बताते हुए इससे दूर रहने की सख्त हिदायत दी गई है, क्योंकि सूद समाज में अमीरी-गरीबी की खाई को और गहरा करता है. आज के समय में यही उसूल इस्लामिक बैंकिंग को एक मजबूत और भरोसेमंद विकल्प बना रहे हैं, जो बिना सूद के भी लोगों को आर्थिक सहूलियतें दे रही है और तेजी से लोगों के बीच अपनी जगह बना रहा है.
आज दुनिया के कई कामयाब इस्लामिक बैंक न सिर्फ लगातार मुनाफा दे रहे हैं, बल्कि बदलते समय की जरूरतों को भी समझ रहे हैं. चाहे हलाल तरीके से घर खरीदने की सहूलत हो, प्रॉपर्टी बेस्ड इंवेस्टमेंट हो या पूरी तरह साफ-सुथरे तरीके से काम करने वाले सेविंग अकाउंट. ये बैंक ऐसे तरीके मुहैया करा रहे हैं, जो मजहबी लोगों के साथ-साथ उन लोगों को भी पसंद आ रहे हैं जो इंसाफ पंसदी के साथ अपने उसूलों पर रहकर कारोबार करना चाहते हैं, और पारदर्शी आर्थिक व्यवस्था चाहते हैं. कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि जब दुनियाभर के बैंक घाटे में हैं, और इंवेस्टर्स के पैसे डूब रहे हैं, उस दौर में भी इस्लामिक बैंकिंग तेजी के साथ लोकप्रिय कैसे हो रही है?
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कैसे काम करता है इस्लामिक बैंक?
इस्लामिक बैंकिंग एक साफ और पारदर्शी ढांचे पर आधारित होती है, जिसमें सूद, सट्टा और अनैतिक कारोबार से दूरी रखी जाती है. इसमें बैंक सीधे कर्ज देकर मुनाफा नहीं कमाते, बल्कि असली आर्थिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं, और कस्टमर के साथ जोखिम यानी घाटे को भी शेयर करते हैं. इसका मतलब यह है कि अगर किसी बैंक की किसी स्कीम में कस्टमर को घाटा हो रहा है, तो इस्लामिक बैंक को भी घाटा होगा.
इसका सबसे अहम सिद्धांत यह है कि किसी भी तरह का ब्याज नहीं लिया जाता. बैंक सामान की खरीद-फरोख्त, किराया या शेयरिंग के जरिए मुनाफा कमाते हैं. दूसरा नियम यह है कि किसी भी सौदे में अनिश्चितता या धोखा नहीं होना चाहिए. हर समझौता साफ और स्पष्ट होता है, ताकि किसी तरह का भ्रम न रहे. तीसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पैसा सिर्फ जायज और नैतिक कामों में लगाया जाता है. शराब, जुआ या ऐसे किसी भी काम में इंवेस्ट नहीं किया जाता, जो समाज के लिए नुकसानदेह हो. हर इंवेस्ट को इस्लाम के कानूनों के मुताबिक जांचा और परखा जाता है.
चौथा सिद्धांत यह कहता है कि हर लेन-देन किसी असली संपत्ति से जुड़ी होना चाहिए, जैसे जमीन, मशीन या कोई सामान. इससे पैसा सीधे वास्तविक अर्थव्यवस्था से जुड़ा रहता है और सिर्फ कागजी लेन-देन तक सीमित नहीं रहता. पांचवां नियम है कि मुनाफा और नुकसान दोनों को शेयर किया जाता है. इसमें तय और निश्चित फायदे की गारंटी नहीं होती, जिससे बैंक और कस्टमर दोनों की जिम्मेदारी बराबर रहती है. यानी अगर बैंक को नुकसान होगा तो कस्टमर को भी समान नुकसान होगा.
किन तरीकों से इस्लामिक बैंकिंग कमाता है मुनाफा
इस्लामिक बैंकिंग में अलग-अलग तरह के तरीके अपनाए जाते हैं, जिनका मकसद मुनाफे और इंवेस्ट को कारोबार या संपत्ति से जोड़ना होता है, न कि तय सूद आधारित सिस्टम पर. इन तरीकों को आसान भाषा में समझें तो हर मॉडल का अपना एक अलग तरीका और काम करने का ढांचा होता है. सबसे पहले बात करते हैं "मुराबाहा" की.
"मुराबाहा" एक ऐसा तरीका है जिसमें बैंक पहले किसी सामान को खुद खरीदता है और फिर उसमें एक तय मुनाफा जोड़कर कस्टमर को बेच देता है. उदाहरण के तौर पर अगर किसी कस्टमर को एक लाख रुपये का सामान चाहिए तो बैंक पहले उसे खरीदता है और फिर 1 लाख 10 हजार रुपये में कस्टमर को बेच देता है, जिसे कस्टमर किश्तों में चुका देता है.
"इजारा" मॉडल में बैंक किसी संपत्ति को खरीदकर उसे कस्टमर को किराए पर देता है. इसमें कस्टमर उस संपत्ति का इस्तेमाल करता है और हर महीने किराया देता है. कई मामलों में किराया पूरा होने के बाद वह संपत्ति कस्टमर के नाम भी हो सकती है. "मुदारबा" में एक पक्ष पैसा लगाता है जबकि दूसरा पक्ष उस पैसे से कारोबार चलाता है. इसमें मुनाफा पहले से तय नहीं होता, बल्कि जो भी फायदा होता है उसे दोनों आपस में बांट लेते हैं.
इसी तरह "मुशारका" में दोनों पक्ष मिलकर इंवेस्ट करते हैं और कारोबार से होने वाले फायदा और नुकसान को मिलकर शेयर करते हैं. अब बात करते हैं "सूकूक" की. "सूकूक" एक ऐसा इंवेस्टमेंट मॉडल है जिसमें पैसा किसी असली संपत्ति जैसे सड़क, बिल्डिंग या प्रोजेक्ट में लगाया जाता है. इससे मुनाफा उस संपत्ति से होने वाली इनकम पर निर्भर करती है और इंवेस्टर्स को उसी के हिसाब से मुनाफा मिलता है. इन सभी तरीकों की खास बात यह है कि ये सीधे ब्याज पर नहीं बल्कि वास्तविक संपत्ति और कारोबार से जुड़े लेन-देन पर आधारित होते हैं.
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