Shayari: देखना है खींचता है मुझ पर पहला तीर कौन... परवीन शाकिर के गजब के शेर

Ansh Raj
Nov 26, 2024

वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी इंतजार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे

क़दमों में भी थकान थी, घर भ करीब था पर क्या करें कि अब के सफ़र ही अजीब था

दुश्मनों के साथ मेरे दोस्त भी आजाद हैं. देखना है खींचता है मुझ पर पहला तीर कौन

यूं बिछड़ना भी बहुत आसान न था उस से मगर जाते-जाते उसका वो मुड़ कर दोबारा देखना

मैं सच कहूंगी मगर फिर भी हार जाऊंगी वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा

ग़ैर मुमकिन है तिरे घर के गुलाबों का शुमार मेरे रिसते हुए ज़ख़्मों के हिसाबों की तरह

बंद कर के मिरी आँखें वो शरारत से हँसे बूझे जाने का मैं हर रोज़ तमाशा देखूँ

चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया इश्क़ के इस सफ़र ने तो मुझ को निढाल कर दिया

कुछ तो तिरे मौसम ही मुझे रास कम आए और कुछ मिरी मिट्टी में बग़ावत भी बहुत थी

कैसे कह दूं कि उसने छोड़ दिया है मुझे बात तो सच है, मगर बात है रुसवाई की

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