नई दिल्ली: मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के काफी पहले से जिस नेता को कांग्रेस पार्टी लाइमलाइट से बाहर करने की कोशिश करती रही है, वह हैं 10 साल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह. कमलनाथ के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और सिंधिया को प्रचार समिति का प्रमुख बनाए जाने के बाद पार्टी ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्रदेश की कमान इसी जोड़ी के हाथ में होगी. अपने स्वभाव के मुताबिक दिग्गी राजा ने इस फैसले पर किसी तरह का ऐतराज नहीं किया. लेकिन जल्द ही वे खबरें भी अखबारों में दिखने लगीं कि भोपाल के रोशनपुरा पर बने प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय पर हुए कार्यक्रम में दिग्विजय की तस्वीर पोस्टर से गायब है. दिग्विजय ने तुरंत इस बात को रफा-दफा करने वाले बयान दिए.


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मंदसौर में राहुल गांधी ने जब किसान-मजदूर रैली की, तो उसमें भी दिग्विजय मंच पर तो रहे, लेकिन राहुल गांधी के हाव-भाव से साफ दिखा कि अब दिग्विजय सिंह के साथ उनकी वैसी नजदीकी नहीं है, जो उनकी राजनीतिक यात्रा के शुरुआती 10 साल में हुआ करती थी. तब तो यह आलम था कि दिग्विजय के बिना राहुल कदम नहीं रखते थे और मध्य प्रदेश का यह नेता 6-6 राज्यों का प्रभारी महासचिव होता था.


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राहुल गांधी ने जब भोपाल में रोड शो किया, तो उनकी बस के दरवाजे पर दिग्विजय लटके नजर नहीं आए. मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव ज्यों-ज्यों परवान चढ़ता गया, दिग्विजय और ज्यादा हाशिये पर होते गए.


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लेकिन अब दिग्विजय सिंह फिर सुखिर्यों में आने लगे हैं. जब भाजपा के पूर्व मंत्री और बुजुर्ग नेता सरताज सिंह कांग्रेस में शामिल हुए, तो यह काम दिग्विजय के हाथों से संभव हुआ. अखबारों में दिग्विजय और सरताज की मुस्कुराती हुई तस्वीरें छपीं. जब पार्टी ने प्रत्याशियों की सूची जारी की और अचानक पूरे प्रदेश में कांग्रेस के असंतुष्टों और बागियों की फौज नजर आने लगी, तो पार्टी को एक बार फिर दिग्विजय को आगे करना पड़ा. वह खुलकर कह भी रहे हैं कि पार्टी ने उन्हें रूठों को मनाने का काम दिया है और वह वही काम कर भी रहे हैं. एक तरह से देखा जाए तो कांग्रेस के राजसूय यज्ञ में वह कृष्ण की तरह पांव पखारने का काम कर रहे हैं.



 


अगर दिग्विजय यह काम कामयाबी से करते हैं, तो शीर्ष नेतृत्व की नजर में उनका कद बहाल होने से रह नहीं सकता. यह काम उन्हें सौंपना पार्टी की मजबूरी भी है. क्योंकि कांग्रेस में नेता तो बहुत हैं लेकिन कोई पूरे प्रदेश का नेता नहीं है. सिंधिया की पकड़ ग्वालियर-चंबल में है, अजय सिंह सतना और आसपास तक सिमटे हैं, कमलनाथ को छिंदवाड़ा के बाहर कोई नहीं जानता, असंतुष्ट होने के बावजूद सत्यव्रत चतुर्वेदी बुंदेलखंड में ही सीमित हैं. जीतू पटवारी जैसे युवा नेता मंदसौर से बाहर नहीं हैं. ले-देकर दिग्विजय हैं जो पूरे प्रदेश में पकड़ रखते हैं. पूरे प्रदेश के ब्लॉक लेवल तक के नेताओं को वह नाम और काम से जानते हैं. इन रिश्तों में गरमाहट डालने के लिए वह सपत्नीक छह महीने की नर्मदा यात्रा ठीक चुनाव से पहले कर चुके हैं. इस यात्रा ने दिग्विजय की छवि में बदलाव किए हैं. अब वह रूठों को मनाने में जुटे हैं तो उनके यह जमीनी संपर्क और यात्रा से पनपे नए रिश्ते इस काम में उनकी मदद ही करेंगे.


वह जिस तरह पूरे प्रदेश के बागियों से दोस्ताना बातचीत कर रहे हैं, उससे लगता है कि उन्हें काफी हद तक कामयाबी मिल जाएगी. उनमें वह हुनर है कि जहां वह अपने रूठों को नहीं मना पाएंगे, वहां वह भाजपा के रूठों को अपने पाले में ले आएंगे. हां, यह जरूर हो सकता है कि अगर वह यह काम ज्यादा कुशलता से करें, तो पार्टी के भीतर से ही उन पर नए हमले होने लगें. 


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लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति के मिथक पुरुष अर्जुन सिंह की छत्रछाया में राजनीति की बारीकियां सीखे दिग्विजय की सेहत पर इन हमलों का असर नहीं होने वाला. क्योंकि मनमोहन सिंह सरकार के उत्तरार्ध में जब दिग्विजय आरएसएस और हिंदू धर्म को लेकर आक्रामक बयान दिया करते थे और मीडिया में उनकी आलोचना होती थी, तब भी वह सब सोच-समझकर करते थे. 


मध्य प्रदेश कांग्रेस में दिग्विजय के करीबी एक बुजुर्ग नेता ने मुझे इसका रहस्य कुछ इस तरह समझाया था. जब उन नेता ने दिग्विजय से पूछा कि आप आलोचना के बावजूद ऐसे बयान क्यों देते रहते हो, तो दिग्विजय ने कहा था पार्टी ने मुझे गाली खाने का काम दिया है और मैं गालियां खा रहा हूं. आज पार्टी ने उन्हें रूठों को मनाने का काम दिया है और अब वह उस काम में मसरूफ हैं.