गुंजन शर्मा/नई दिल्ली:नवरात्रि में नौ दिनों तक मां दुर्गा के कई स्वरूपों को पूजा जाता है.वैसे तो हमारे देश में मां के अनगिनत मंदिर हैं जहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है, लेकिन मां की एक शक्तिपीठ पाकिस्तान में भी स्थित है, जहां नवरात्रि के नौ दिनों तक शक्ति की उपासना का विशेष आयोजन किया जाता है.देश विदेश से यहां भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं.पाकिस्तान में केवल अजान ही नहीं बल्कि माता के मंदिर की गूंज भी सुनाई देती है. 


बता दें कि दुर्गा भवानी के पूरे देश में कुल 51 शक्तिपीठ हैं. 51 में से 42 भारत में हैं और बाकी 1 तिब्बत, 1 श्रीलंका, 2 नेपाल, 4 बांग्लादेश और एक पाकिस्तान में है. 


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पाकिस्तान के बलूचिस्तान में है मां हिंगलाज शक्तीपीठ


51 में से एक शक्तिपीठ बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है.जहां दर्शन मात्र से ही सभी पापों का अंत हो जाता है.ये मंदिर सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में एक प्रकृतिक गुफा में बना है.  इतिहास में उल्लेख है कि सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में स्थित यह गुफा मंदिर लगभग 2000 साल पुराना है. यहां इंसान की बनाई हुई कोई प्रतीमा नहीं है बल्कि एक मिट्टी की वेदी बनी है जहां एक छोटे आकार की शिला को हिंगलाज माता के रूप में पूजा जाता है. 


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यहां नवरात्रि के नौ दिनों तक शक्ति की उपासना का विशेष आयोजन किया जाता है. जिसके लिए सिंध-कराची के लाखों सिंधी हिन्दू श्रद्धालु यहां माता के दर्शन को आते हैं. भारत से भी हर साल एक दल यहां दर्शन के लिए जाता है.


मुस्लिम समुदाय के लोग करते हैं देखभाल
वैसे तो पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हिंगोल नदी के पास स्थित ये मंदिर हिन्दू भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं. लेकिन इस शक्तिपीठ की देखभाल वहां के स्थानीय मुसलिम लोग करते हैं. वे लोग इसे बेहद चमत्कारिक स्थान मानते हैं. 


स्थानीय मुस्लिम इसे कहते हैं 'नानी पीर' 
कहते हैं जब पाकिस्तान का जन्म नहीं हुआ था तो उस समय भारत की पश्चिमी सीमा अफगानिस्तान और ईरान से जुड़ती थी. तब से बलूचिस्तान के मुसलमान  हिंगलाज देवी की पूजा करते थे. उन्हें 'नानी' कहकर मुसलमान लाल कपड़ा, अगरबत्ती, मोमबत्ती, इत्र और सिरनी चढ़ाते थे. तालिबानी कहर और धार्मिक कट्टरवाद के कारण इस मंदिर पर कई हमले भी हुए. लेकिन स्थानीय हिन्दू और मुसलमानों ने मिलकर इस मंदिर को बचाया. कहा जाता है कि आतंकवादियों ने जब इस मंदिर को क्षति पहुंचाने का प्रयास किया, तो वे माता के चमत्कार से हवा में लटकते पाए गए. 


पाकिस्तान में इस मंदिर का है अपना महत्व
प्राचीन ग्रंथों के मुताबिक हिंदू चाहे चारों धाम यात्रा,काशी के गंगा स्नान और अयोध्या में दर्शन कर ले.लेकिन अगर उसने हिंगलाज देवी के दर्शन नहीं किए तो उसका जीवन व्यर्थ माना जाता है. स्थानीय परंपरा के मुताबिक जो स्त्रियां इस स्थान के दर्शन कर लेती हैं उन्हें हाजियानी कहते हैं. उन्हें हर धार्मिक स्थान पर सम्मान के साथ देखा जाता है.


यात्रा है बड़ी कठिन
हिंगलाज सिद्ध पीठ पर जाने के लिए 2 रास्ते हैं, एक रेगिस्तान से होकर जाता है और दूसरा पहाड़ से होकर जाता है. दर्शन के लिए पहले श्रद्धालुओं को कराची से छह-सात मील चलकर "हाव" नदी पार करनी पड़ती है. यहीं से हिंगलाज की यात्रा शुरू होती है. यहां शपथ ग्रहण की क्रिया सम्पन्न होती है, यहीं पर लौटने तक की अवधि तक के लिए संन्यास ग्रहण किया जाता है. यहीं पर छड़ी का पूजन होता है और यहीं पर रात में विश्राम करके प्रात:काल हिंगलाज माता की जय बोलकर मरुतीर्थ की यात्रा प्रारंभ की जाती है. कराची से पहले लसबेल पहुंचना पड़ता है और फिर लयारी जाना पड़ता है. 


रास्ते में कई बरसाती नाले तथा कुएं भी पड़ते हैं. इस इलाके की सबसे बड़ी नदी हिंगोल है जिसके निकट चंद्रकूप पहाड़ हैं. चंद्रकूप तथा हिंगोल नदी के बीच लगभग 15 मील का फासला है. 
मंदिर की यात्रा के लिए पैदल या छोटी गाड़ियों से यात्रा करनी पड़ती है. हिंगोल नदी के किनारे से यात्री माता हिंगलाज देवी का गुणगान करते हुए चलते हैं. इससे आगे आसापुरा नामक एक स्थान है जहां यहां यात्री विश्राम के लिए रुकते हैं.


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यहां स्नान कर पुराने कपड़े किए जाते हैं दान
आसापुरा में भक्त स्नान करते हैं और यात्रा के वस्त्र उतार कर साफ कपड़े पहनते हैं. उतारे हुए कपड़े गरीबों और जरूरतमंदों को दे दिए जाते है. यहां से वापस यात्रा शुरू कर थोड़ा आगे काली माता का मंदिर आता है, जहां आराधना करने के बाद यात्री हिंगलाज देवी के लिए रवाना होते हैं. यात्री यहां से चढ़ाई करके पहाड़ पर जाते हैं जहां मीठे पानी के तीन कुएं हैं. मान्यता है कि इन कुंओं का जल बेहद पवित्र है, जो मन को शुद्ध कर  पापों से मुक्ति दिलाता है.


जानें क्या है माता का चुल?
चुल अंगारों से भरा एक बाड़ा होता है जिसे 10 फिट लंबा बनाया जाता है. ये मंदिर के बाहर बनाया जाता है. मन्नत मांगने के लिए लोग अंगारों से भरे इस चुल को पार करके मंदिर में पहुचते हैं. कहा जाता है कि माता के चमत्कार से मन्नतधारी को जरा सी पीड़ा नहीं होती और ना उसके पैर जलते हैं.


श्रद्धालुओं की मानें तो एक बार यहां माता ने प्रकट होकर वरदान दिया कि जो भक्त मेरा चुल चलेगा उसकी हर मनोकामना पुरी होगी. इसी के बाद से ये परंपरा शुरू हुई थी.हालांकि अब इस परंपरा को खत्म कर दिया है. 


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