DNA on Presidential Election 2022: देश में इन दिनों राष्ट्रपति पद के चुनाव की बहुत चर्चा है. ऐसे में आपको इस बात को समझना चाहिए कि हमारे देश की विपक्षी पार्टियों और बीजेपी की सोच में कितना बड़ा अंतर है. राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष और बीजेपी दोनों को अपना उम्मीदवार चुनना था. इस दौरान बीजेपी ने एक ऐसी नेता को अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया, जिनके पास विधानपालिका का अनुभव है, सरकार में बतौर मंत्री काम करने का अनुभव है और जो 6 साल तक झारखंड की राज्यपाल भी रह चुकी हैं. 


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क्या मोदी विरोध की वजह से राष्ट्रपति उम्मीदवार बने यशवंत सिन्हा?


वहीं विपक्ष ने यशवंत सिन्हा (Yashwant Sinha) के रूप में एक ऐसे नेता को अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया, जो सिर्फ मोदी विरोध की राजनीति करते हैं. यानी विपक्षी दलों को यशवंत सिन्हा में यही खूबी पसन्द आई कि वो मोदी विरोध की राजनीति करते हैं और इससे आप समझ सकते हैं कि बीजेपी तो देश में प्रगतिशील और विकास की राजनीति कर रही है लेकिन विपक्षी दल और खासतौर पर कांग्रेस ने अब भी खुद को मोदी विरोध तक सीमित किया हुआ है.



अगर आप पिछले चार पांच वर्षों पर नजर डालेंगे तो आपको पता चलेगा कि इस दौरान देश में जितने भी बड़े आन्दोलन हुए, उनमें विपक्ष और कांग्रेस पार्टी कहीं थी ही नहीं. जब नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ देशभर में आन्दोलन हुए, तब ये आन्दोलन एक खास वर्ग के लोग कर रहे थे और इसमें विपक्ष की भूमिका कहीं नहीं थी. इसी तरह जब कृषि कानूनों के खिलाफ आन्दोलन हुआ तो किसानों ने इस आन्दोलन को विपक्ष से दूर रखा था. 


लोगों का विपक्ष पर से क्यों उठ गया भरोसा?


अब जब अग्निपथ के खिलाफ देश के कुछ युवा आन्दोलन कर रहे हैं तो इसमें भी विपक्ष दूर दूर तक नहीं है. इससे पता चलता है कि हमारे देश के लोगों के बीच विपक्षी दलों की विश्वसनीयता कितनी कम हो चुकी है. लोगों को ऐसा लगने लगा है कि अगर उनके आन्दोलन में विपक्षी दलों की भूमिका हुई तो देश की बाकी जनता उस आन्दोलन पर विश्वास नहीं करेगी और उसे अपना समर्थन नहीं देगी.


जबकि पहले ऐसा नहीं होता था. पहले विपक्षी दल और जनता दोनों मिल कर सरकार के खिलाफ़ आन्दोलन करते थे. जैसे 1975 में इमरजेंसी के दौरान जब देश में जय प्रकाश नारायरण ने जनता पार्टी के नेतृत्व में इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ आन्दोलन किया तो इस आन्दोलन में विपक्षी दल भी थे और देश की जनता भी शामिल थी. उस समय जे.पी. देश के लोगों से आन्दोलन में शामिल होने का आह्वान करते थे और जनता विरोध प्रदर्शनों में दौड़ी चली आती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब देश के लोग समझ गए हैं कि विपक्ष के पास प्रगतिशील राजनीति के लिए कोई मॉडल ही नहीं है.


द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी से कांग्रेस में धर्मसंकट


यहां हम आपसे एक और बात कहना चाहते हैं. वो ये कि बीजेपी ने द्रौपदी मुर्मू को अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी मुश्किल में डाल दिया है. क्योंकि जब सोनिया गांधी खुद एक महिला होते हुए, द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनने से रोकेंगी और उनके खिलाफ विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार का समर्थन करेंगी तो इससे लोगों के बीच गलत संदेश जाएगा.


आज़ादी के बाद से बीजेपी ने इस देश को दो राष्ट्रपति दिए हैं और द्रोपदी मुर्मू के रूप में वो देश को तीसरा राष्ट्रपति दे सकती है. जब आप इन तीनों नेताओं के बारे में पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि बीजेपी ने देश को जो पहला राष्ट्रपति दिया, वो डॉक्टर ए.पी.जे. अब्दुल कलाम थे जो मुस्लिम थे. इसके बाद बीजेपी ने रामनाम कोविंद को राष्ट्रपति बनाया, जो दलित हैं और अब द्रोपदी मुर्मू राष्ट्रपति बन सकती हैं, जो आदिवासी हैं. यानी बीजेपी ने राष्ट्रपति पद के लिए नेताओं का चुनाव करते समय देश की आबादी, क्षेत्र, जाति, विकास और प्रगतिशील सोच को आगे रखा है. जिसे विपक्ष शायद अभी समझ नहीं पा रहा है.


अधिकार संपन्न होता है राष्ट्रपति का पद


राष्ट्रपति का पद कितना बड़ा और महत्वपूर्ण होता है, इसे आप एक और उदाहरण से समझ सकते हैं. 25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उस समय के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से इमरजेंसी के अध्यादेश पर दस्तखत करा लिए थे.


अगर उस दिन फखरुद्दीन अली अहमद ने इमरजेंसी लगाने का विरोध किया होता और इमरजेंसी के अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया होता तो उस समय देश में इमरजेंसी लगती ही नहीं. उस समय के एक अख़बार ने इस घटना के लिए फखरुद्दीन अली अहमद की आलोचना की थी और एक कार्टून प्रकाशित किया था. जिसमें फखरुद्दीन अली अहमद को नहाते हुए इमरजेंसी के अध्यादेश पर दस्तखत करते दिखाया गया था.


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राष्ट्रपति भवन का आकार देखकर घबरा गए थे सी. राजगोपालाचारी


आज जब देश में राष्ट्रपति चुनाव की इतनी चर्चा हो ही रही है, तब हम आपको देश के राष्ट्रपति भवन से जुड़ा एक रोचक किस्सा भी बताना चाहते हैं. सी. राजगोपालाचारी भारत के पहले ऐसे नेता थे, जिन्हें वर्ष 1948 में देश का पहला Governor-General नियुक्त किया गया था. इस पद को सम्भालने के बाद उन्हें मौजूदा राष्ट्रपति भवन में जाकर रहना था. जब वो राष्ट्रपति भवन में रहने के लिए आए और उन्हें ये बताया गया कि अब से वो इस भवन के उस कमरे में रहेंगे, जहां ब्रिटिश Viceroy रहते थे तो वो काफ़ी घबरा गए. क्योंकि राष्ट्रपति भवन का ये कमरा बहुत भव्य और आलीशान था. 


सी. राजगोपालाचारी बहुत साधारण तरीके से रहना पसंद करते थे. इसलिए उन्हें लगा कि वो इस कमरे में कैसे रह सकते हैं. उन्होंने इस कमरे की जगह राष्ट्रपति भवन के एक दूसरे छोटे कमरे में रहने का फैसला किया. उनके बाद से इस भवन में जितने भी राष्ट्रपति रहने के लिए आए, उन्होंने कभी उस आलीशान कमरे में शिफ्ट होने की इच्छा नहीं जताई. आज इस कमरे का इस्तेमाल Guest Room के तौर पर होता है और यहां दूसरे देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भारत दौरे के दौरान रुकते हैं.