Jaipur: जयपुर शहर की जनता अपना वोट देकर अब ठगा-सा महसूस कर रही है. तमाम टेक्स और शुल्क देने के बावजूद भी उसे सीवरेज के बहते पानी और कचरे के ढेर पर रहना मजबूरी हो गई है. शहरी सरकार को बने हुए डेढ़ साल से ज्यादा का समय बीत गया है, लेकिन शहर में सफाई जैसी बेसिक समस्या भी अब तक दूर नहीं हुई.


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सफाई व्यवस्था बे-पटरी पर है
शहर में न तो सफाई हो रही और न ही समय पर कचरा उठ रहा है. गलियों से लेकर मुख्य सड़कें कचरे के डिपो बन गए है, वहीं शहर में बरसात के पानी की बजाए जगह-जगह सीवर का पानी बहता नजर आ रहा है. हालात तब हैं जब मेयर और आयुक्त के बीच पटरी अच्छी बैठ रही हैं लेकिन सफाई व्यवस्था बे-पटरी है.


जनता से किए गए वादे भूल गए
आज से ठीक 608 दिन पहले शहरी सरकार के (नगर निगम ग्रेटर) नुमाइंदो ने शहर के लोगों को ''सब्जबाग'' और विकास का सपना दिखाकर अपने आप को कुर्सी पर काबिज किया,लेकिन यह शहर की सरकार के नुमाइंदे अपने ही किए गए वादों को भूल गए है. जयपुर शहर में विकास तो दूर सफाई को लेकर जो हालात बने हुए है उसे देखकर लगता है कि वादे आखिर वादे ही होते है.


कर्मचारियों-अधिकारियों की बड़ी फौज लेकिन शहर कचरे से अटा पड़ा है 
अब शहर की जनता पूछ रही है कि क्या हुआ तेरा वादा? लेकिन शहर की सरकार के नुमाइंदों के पास कोई जवाब नहीं है. मेयर सहित 150 पार्षद, आयुक्त से लेकर उपायुक्त और 5 हजार से ज्यादा सफाई कर्मचारी, सैंकड़ों कर्मचारियों-अधिकारियों की बड़ी फौज होने के बावजूद शहर कचरे से अटा पड़ा है और उस कचरे में आवारा पशु मुंह मार रहे है.साथ में सीवरेज के चैम्बर से उफान मारता पानी शहरी सरकार के वादों की गवाई दे रहा है.


शहर में सफाई के हालत बद से बदतर
पिछले दिनों से कुछ जुमले जो कभी कभार कहीं कार्टून, व्यंग या हास-परिहास में दिखाई या सुनाई दे जाते थे वो अब अक्सर शहर में आम आदमी की जुबान पर रहते हैं.जैसे नरक-निगम, उफ्फ ये टूटी सड़कें, आवारा पशु, सांड से बचो तो खैर मनाओ, जगह-जगह पर ट्रैफिक जाम और भिखारी आम, बदहाली की बस कुछ न पूछो? लेकिन अब ये जुमले अब रोज और आसपास कहीं भी सुने जा सकते हैं क्योंकि शहर में सफाई के हालत बद से बदतर हैं.


शहर की गलियां हो या फिर कोई मुख्य सड़क सीवरेज की समस्या के चलते हर जगह सिर्फ गन्दगी का अम्बार दिखाई देता है.इसके बावजूद यहां निगम की ओर से दावे तो बहुत सारे किये जाते हैं कि हम शहर को साफ और सुन्दर बनाएंगे.लेकिन जब हकीकत की बात करते हैं या जिम्मेदार अधिकारी से बात करते हैं तो संसाधनों की कमी और सफाई कर्मचारियों के आभाव की बात कहकर ये लोग अपना पल्ला झाड़ते हुए नजर आते हैं.


दायित्वों को निभाने में नाकाम सा साबित हो रहा नगर निगम ग्रेटर


अब तक शहरी सरकार की मुखिया यानी नगर निगम ग्रेटर जयपुर की महापौर डॉ. सौम्या गुर्जर आयुक्त से तालमेल नहीं होने का राग अलाप रही थी. लेकिन अब तक आयुक्त महेन्द्र सोनी के साथ भी उनकी खूब पटरी बैठ रही है, लेकिन शहर की सफाई व्यवस्था अब भी बेपटरी है. पार्षद से लेकर जनता और विधायक सब शिकायतों का पुलिंदा मेयर और अफसरों को दे चुके है, लेकिन नगर-निगम जो शहर को साफ और सुंदर रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं अब अपने दायित्वों को निभाने में नाकाम सा साबित हो रहा है और इसकी वजह है सफाई की दुर्व्यवस्था.


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नगर निगम शहर की सफाई की मूल योजना नहीं बना पाया
सफाई को लेकर बड़े बड़े दावे करने वाली शहरी सरकार की पोल जगह जगह जमा कचरे के ढेरों से प्रतिदिन खुल रही है.जिसको कानफोडू भोंपू भी ठीक नहीं कर पा रहा है. नगर निगम के मेयर और आयुक्त जनता की सिविक सेन्स की बात करते है, जबकि वास्तविकता यह है कि सिविक सेन्स तो नगर-निगम के अधिकारियों में नहीं है इसलिए तो आज तक नगर निगम शहर की सफाई की मूल योजना नहीं बना पाया है.


बहरहाल, कहा जाता है कि परिवेश स्वच्छ होगा तभी वातावरण स्वच्छ होगा. तभी लोग स्वस्थ रहेंगे लेकिन यह सिर्फ कहने की बातें रह गई हैं, लेकिन गर्व है हम पुरानी एक कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं.नाम बड़े और दर्शन छोटे. सिक्के हैं बहुत पर हैं सब खोटे.


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