Brahma ji and Vishnu ji Gurudakshina: गुरु पूर्णिमा का पर्व कुछ दिन पहले ही मनाया गया था. गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ बताया गया है, क्योंकि गुरु ही अपने शिष्य के जीवन को ज्ञान से प्रकाशित करता है. शिष्य भी गुरु से मिले ज्ञान के आधार पर अपने जीवन को सत्कर्मों में लगाता है और बदले में गुरु को गुरु दक्षिणा देता है. कई बार गुरु ही अपने शिष्य से दक्षिणा मांग लेते हैं. जैसा एकलव्य के मामले में गुरु द्रोणाचार्य ने किया था. यदि ऐसा नहीं हुआ और गुरु ने कुछ भी नहीं मांगा तो भी शिष्य का कर्तव्य है कि वह अपनी क्षमतानुसार अपने गुरु को अधिक से अधिक दान दें. 


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क्या आप जानते हैं कि भगवान ब्रह्मा और विष्णु जी ने भी एक बहुत ही श्रेष्ठ गुरु से गूढ़ ज्ञान प्राप्त किया. जब गुरु दक्षिणा का समय आया तो उन्होंने दक्षिणा में रुपया, पैसा, हीरे, जवाहरात आदि देने के बजाए अपने को ही समर्पित कर दिया.


शिवपुराण के विद्येश्वर संहिता के अनुसार, मां जगदम्बा पार्वती के साथ एक आसन पर विराजमान महेश्वर ने ब्रह्मा और विष्णु जी को शिष्य के रूप में पहले तो सृष्टि और स्थिति, संहार और तिरोभाव जैसे कृत्यों को सिखाया और फिर ओंकार नामक महामंगलकारी मंत्र के महत्व के बारे में बताया. इसके बाद महादेव ने इन दोनों महान शिष्यों को एक पर्दे से ढंकने के बाद उनके सिर पर हाथ रखकर धीरे से उच्चारण करते हुए मंत्र का उपदेश दिया और उसके पालन की विधि की बतायी. तीन बार मंत्र का उच्चारण करते हुए, उन्हें मंत्र को जाग्रत करने का तरीका बताते हुए दीक्षा दी.


दीक्षा प्राप्त करने के बाद दोनों शिष्यों को अपना कर्तव्य याद आया और वह कर्तव्य था गुरु दक्षिणा देने का. दोनों से अपने गुरु महेश्वर महादेव का तरह-तरह से अभिवादन करते हुए दक्षिणा के रूप में अपने आपको ही उनके सामने समर्पित कर दिया और उनके चरण स्पर्श  किए.