International Day of the Girl Child: इस्लाम ने औरतों को पढ़ाने लिखाने के बारे में बताया है. इस्लाम कहता है कि अगर औरत पढ़ी लिखी होगी तो आपकी नस्लों को पढ़ा लिखा कर देगी. बच्चों की परवरिश में औरत का बड़ा हाथ होता है. वह बच्चों को पढ़ाएंगी तो समाज सुधर जाएगा. इस्लाम में मां की गोद को पहला स्कूल कहा गया है. यह देखा गया है कि जहां पर औरतें पढ़ी लिखी होती हैं, उनके बच्चे पढ़े लिखे होते हैं. जिन लोगों की माएं पढ़ी लिखी नहीं हैं, उन बच्चों को पढ़ने लिखने के लिए बहुत जद्दो-जहद करनी पड़ती है.


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औरतों की तालीम पर इस्लाम
इस हदीस से साफ जाहिर है कि इस्लाम लड़कियों की तालीम पर जोर देता है. हजरत अब्दुल्लाह बिन मसऊद से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल स0. ने फरमाया कि "जिस शख्स के यहां लड़की पैदा हो और वह खुदा की दी हुई नेमतों की इस पर बारिश करे, तालीम व तरबियत और हुस्ने अदब से बहरावर करे, तो मैं खुद ऐसे सख्स के लिए जहन्नम की आड़ बन जाऊंगा (हदीस: बुखारी मुस्लिम)"


इस्लाम में बेटियों की परवरिश
इस्लाम में बताया गया है कि जिस शख्स ने तीन बेटियों या तीन बहनों की परवरिश की और उनकी शादी की, तो अल्लाह ताला ने ऐसे शख्स के लिए अपने ऊपर जन्नत वाजिब कर ली. मतलब अल्लाह ताला ऐसे शख्स को हर हाल में जन्नत भेजेगा. अगर किसी शख्स की दो बेटियां और दो बहनें हैं और उसने दोनों बेटियों और बहनों की परवरिश की, तालीम दिलाई और उनकी शादी की, तो उनको भी यही बदला दिया जाएगा.


इस्लाम में लड़कियों को लेकर मर्दों को हिदायत
एक दूसरी जगह कुरान में अल्लाह ताला कहते हैं कि "वह तुम्हारे लिए लिबास हैं और तुम उनके लिए लिबास हो." (सूरा- अलबकर: 187) इस आयत के जरिए अल्लाह ताला कहना चाहता है कि कई ऐसे काम हैं जो सिर्फ औरत ही कर सकती है. इसी तरह औरत की जिंदगी के कुछ ऐसे पहलू भी हैं, जहां मर्दों की दरकार होती है. कुरान में एक जगह कहा गया है कि मियां-बीवी का रिश्ता गुस्सा और नफरत का नहीं बल्कि मोहब्बत और चाहत का है.


इस्लाम की नजर में मर्द औरत बराबर
परिवार को चलाने के लिए इस्लाम ने मर्द और औरतों को अलग-अलग हक दिए और उन्हें इस्लामी माशरे के लिए जरूरी करार दिया. इंसानों के जिंदा रहने की बुनियाद इसी पर है कि दोनों के दरमियान ऐसा ताल्लुक बना रहे कि वह इंसानी जिंदगी को आगे बढ़ाएं. इसलिए इस्लाम में बताया गया है कि हक के लिहाज से इस्लाम में मर्द और औरत बराबर हैं. कुरान में आता है कि "औरतों के लिए भी मारूफ तरीके पर वही हुकूक हैं जैसे मर्दों के हुकूक उन पर हैं." (कुरान- सूरा, बकर: 228)