Guru Dutt Film: हिंदी सिनेमा की शानदार फिल्मों की कोई भी लिस्ट निर्माता-निर्देशक-अभिनेता गुरु दत्त (Guru Dutt) की फिल्मों के बिना पूरी नहीं हो सकती. आज के निर्देशक भले ही किताबों के नाम पर सस्ते अंग्रेजी उपन्यास (English Novels) पढ़ें, मगर गुरु दत्त के दौर में निर्माता-निर्देशक अच्छा साहित्य पढ़ते थे. खुद गुरु दत्त के पास कमरा भर कर किताबें थीं और हर महीने हजारों रुपयों की किताबें-पत्रिकाएं खरीदते-पढ़ते थे. सिर्फ हिंदी ही नहीं बल्कि बांग्ला, मराठी, अंग्रेजी और दक्षिण भारतीय भाषाओं का साहित्य भी. उन्हीं दिनों में उन्होंने बांग्ला के प्रसिद्ध उपन्यासकार बिमल मित्र (Bimal Mitra) का उपन्यास पढ़ा साहब बीवी और गुलाम. किताब पढ़ कर वह समझ गए कि इसकी स्क्रिप्ट से कोई और लेखक न्याय नहीं कर सकेगा, सो उन्होंने बिमल मित्र को ही कलकत्ता (Kolkata) से मुंबई (Mumbai) बुलवा कर महीनों अपने साथ रखा. बिमल मित्र से स्क्रिप्ट लिखवाई.


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डायरेक्टर कौन...
आज के समय में निर्माता-निर्देशक कोई कहानी या उपन्यास पसंद आने पर अपने किसी सस्ते राइटर को सौंप देंगे और कहेंगे कि इससे इंस्पायर होकर कुछ ऐसा ही लिख लो. वे मूल लेखक को न क्रेडिट देंगे, न पैसा और न ही सम्मान. गुरु दत्त की संवेदनशीलता और लेखन को समझने की ही वजह से उनके खाते में साहब बीवी और गुलाम, कागज के फूल और प्यासा जैसी क्लासिक फिल्में हैं. साहब बीवी और गुलाम (1962) में गुरु दत्त, मीना कुमारी (Meena Kumari), रहमान और वहीदा रहमान (Wahida Rahman) मुख्य भूमिकाओं में थे. गाने साहिर लुधियानवी (Sahir Ludhyanvi) ने लिखे थे. संगीत हेमंत कुमार (Hemant Kumar) का था. फिल्म के गानों आज भी कोई मुकाबला नहीं. फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी गुरु दत्त ने अपने सहायक अबरार अल्वी को सौंपी. हालांकि जानकार बताते हैं कि इसकी मेकिंग और एक-एक दृश्य के पीछे गुरु दत्त की ही सोच थी.



बातें भूतनाथ की
साहब बीवी और गुलाम एक ऐसे युवक भूतनाथ (गुरु दत्त) की कहानी थी, जो गांव से कलकत्ता नौकरी ढूंढने के लिए आता है. वह अपने रिश्त के भाई के पास रुकता है, जो एक जमींदार की हवेली के सर्वेंट क्वार्टर में रहता है. जमींदार की पत्नी (मीना कुमारी) से भूतनाथ का परिचय होता है और फिर आप भूतनाथ की नजरों से उस हवेली के भीतर-भीतर टूटने-बिखरने की कहानी देखते हैं. यह फिल्म अंग्रेजों के भारत (British India) में 19वीं सदी में ढहती भारतीय सामंतवादी व्यवस्था को मार्मिक ढंग से दिखाती है. मीना कुमारी ने छोटी बहू का जो किरदार जीया, वह हिंदी सिनेमा के पर्दे पर अमर है. बाहर कोठों पर रात बिताने वाले जमींदार पति को अपने पास रोके रखने, उसे खुश करने के लिए छोटी बहू सब कुछ करने को तैयार है. वह उसके कहने पर शराब भी पीती है और धीरे-धीरे उसकी आदी हो जाती है. फिल्म जब भारत की तरफ से ऑस्कर अवार्ड्स (Oscar Awards) में भेजी गई तो चयन समिति ने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया कि किसी स्त्री का शराब पीना, पति के लिए उसका बलिदान कैसे माना जा सकता है. फिल्म आप ट्यूब पर फ्री देख सकते हैं.


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