Tejas: कंगना रौनत नई फिल्म के साथ आई हैं, तेजस. बीच में मणिकर्णिका (2019) के औसत नतीजे को छोड़ दें, तो 2015 में तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के बाद उनकी सारी फिल्मों ने निराश किया है. तेजस भी इसी की अगली कड़ी है. हाल के वर्षों में कंगना की समस्या सलमान खान जैसी हो गई है. जिस फिल्म में वह रहें, सारा कुछ उनके इर्द-गिर्द घूमे. बाकियों की कहानी में न्यूतम जगह हो. इसका खामियाजा कंगना भुगत रही हैं. कंगना की पिछली कुछ फिल्में देखकर लगता है कि सलमान खान की तरह उन्होंने पर्दे के किरदार और अपनी जिंदगी का फर्क मिटा दिया है. इसमें संदेह नहीं कि कंगना अच्छी अभिनेत्री हैं, लेकिन खास तरह की फिल्मों और एक विशिष्ट अंदाज में अपनी छवि गढ़ने के चक्कर में अपना ही नुकसान कर रही हैं. तेजस उनके करियर में एक और नाकामी की तरह दर्ज होती है.


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फिल्म में दिखाया
तेजस एक बहादुर भारतीय महिला वायुसेना अधिकारी तेजस गिल (कंगना रनौत) की कहानी है. वह अपने काम और देश से मर मिटने की हद तक प्यार करती है. शुरुआत में ही एक अन्य पायलट को बचाने के लिए अपनी और अपनी सह-पायलट अर्फिया (अंशुल चौहान) की जान जोखिम में डालने के लिए उसके खिलाफ जांच बैठने वाली होती है कि तभी एक अफसर प्रशांत (विशाख नायर) पाकिस्तान में आतंकियों द्वारा बंदी बना लिया जाता है. उसकी हत्या हो सकती है. उसे बचाने का मिशन तेजस को दिया जाता है. तेजस जब उसे बचा रही होती है, तब बुरी तरह से घायल प्रशांत उसे मैसेज देता है कि पाकिस्तानी आतंकवादी कुछ ही समय में, अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में आतंक फैलाने पहुंच रहे है. तेजस कैसे आतंकियों की योजना को विफल कराने का काम करती है और अंत में खतरनाक आतंकी खातूनी (मुश्ताक काक) को ऊपर भेजती है, यही फिल्म में दिखाया गया है.


यह कैसा आइडिया
तेजस की कहानी जितनी सपाट है, उतनी ही कमजोर इसकी पटकथा है. यही हाल संवादों का है. सर्वेश मेवाड़ा फिल्म की नाकामी के बड़े जिम्मेदार हैं. किसी भी दृश्य में ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने कुछ नया सोचा या कल्पना का सहारा लिया. आतंकियों के चंगुल से अपने अफसर को छुड़ाने के मिशन को उन्होंने कुछ-कुछ उरीः द सर्जिकल स्ट्राइक जैसा बनाने की कोशिश की, मगर फेल रहे. इसी तरह आतंकवादियों द्वारा राम जन्मभूमि को धमाकों से दहला देने के आइडिये को फिल्म के पर्दे पर उतारने की कोशिश एक बहुत खराब और खतरनाक आइडिये की तरह सामने आती है, जबकि हकीकत में अभी मंदिर बन ही रहा है. इसी तरह पाकिस्तानी आतंकियों और वहां की सेना को लेखक-निर्देशक ने उसी अंदाज में देखा, जैसा पहले की फिल्में दिखाती आ रही हैं. कुल मिलाकर कोई नयापन यहां गायब है.



‘पर्सनल’ मामला
फिल्म के केंद्र में तेजस बनी कंगना है. यहां बीच में उनकी बैकस्टोरी भी आती है. जहां 26/11 का मुंबई अटैक है. फिल्म की कहानी में इस हादसे के बाद आतंकवाद तेजस के लिए ‘पर्सनल’ हो जाता है क्योंकि वह अपने परिवार और प्यार को इस हमले में खो देती हैं. आतंकवाद के विरुद्ध पर्दे पर हीरो या हीरोइन का इस तरह ‘पर्सनल’ हो जाना कई बार आया है. कंगना इस फिल्म में निराश करती हैं. इमोशनल दृश्यों में वह असर नहीं पैदा कर पाईं और जब देशभक्ति का कोई संवाद बोलती हैं, तो वह किरदार के दिल से निकलने के बजाय खुद एक्ट्रेस के मुंह से निकलता लगता है. इस फिल्म में कंगना के फैन्स भी निराश होंगे.


थीम देशभक्ति
तेजस की तमाम कमजोरियों के बीच अगर कोई ठीक लगता है तो वह हैं, अंशुल चौहान. वह तेजस की को-पायलट अर्फिया बनी हैं. वास्तव में उन्हें ही कंगना के बाद सबसे ज्यादा स्पेस भी मिला है और वह अपने अंदाज से ध्यान खींचती हैं. प्रशांत बने विशाख नायर और स्टेज सिंगर एकवीर के रूप में वरुण मित्रा औसत हैं. आशीष विद्यार्थी यहां आईएएफ प्रमुख के रूप में आते हैं. मोहन अगाशे प्रधानमंत्री के रूप में उपस्थिति दर्ज कराते हैं. जबकि आतंकवादी खातूनी के रूप में मुश्ताक काक ठीक-ठाक हैं. रियो कपाड़िया रॉ प्रमुख के रूप में नजर आते हैं. बाकी किरदार समय-समय पर आते-जाते हैं. फिल्म की थीम देशभक्ति होने के बावजूद, संगीत कतई उत्साह पैदा नहीं पैदा करता. इसी तरह फिल्म का वीएफएक्स कई जगह पर निराश करता है. हालांकि इसके पीछे तर्क हो सकता है कि यह बड़े बजट की फिल्म नहीं है. सो, आप भी सिनेमाघर में जाने से पहले एक बार अपना बजट चैक कर लें.


निर्देशकः सर्वेश मेवाड़ा
सितारे: कंगना रनौत, अंशुल चौहान, विशाख नायर, वरुण मित्रा, आशीष विद्यार्थी
रेटिंग**