देश की एक और एयरलाइन कंपनी क्रैश हो गई है. हम बात कर रहे हैं Go First की, जिसने तीन दिनों के लिए अपनी सभी उड़ानों को रद्द कर दिया है और खुद को दिवालिया घोषित करने की अपील भी नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल यानी NCLT में दायर कर दी है. सवाल ये तो है ही कि Go First ऐसे कैसे दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गई, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल ये है कि क्या Go First कोई एयलाइन चला रही है या गली-नुक्कड़ की दुकान या कोई लोकल टाइप का सिनेमाघर, जब मर्जी चाहे अपने ग्राहकों को कह दिया कि आज दुकान बंद है या तीन दिन सिनेमाघर में कोई पिक्चर नहीं चलेगी. 


COMMERCIAL BREAK
SCROLL TO CONTINUE READING

Go First ने एवियेशन रेगुलेटर DGCA को बता दिया कि 3, 4 और 5 मई को उसकी सभी उड़ानें रद्द रहेंगी, लेकिन यात्रियों को इसकी जानकारी तब मिली जब वो फ्लाइट पकड़ने एयरपोर्ट पहुंचे जहां उन्हें Go First के सारे काउंटर बंद मिले. उन्हें ना ये बताया गया कि फ्लाइट क्यों कैंसल हुईं हैं ना ये बताया गया कि उनके टिकट का रिफंड कब और कैसे मिलेगा. DGCA ने भी एयरलाइंस को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और 24 घंटे के अंदर जवाब मांगा है. नोटिस में पूछा गया है कि फ्लाइट कैंसिल करने की वजह से जिन यात्रियों को परेशानी हो रही है, उनकी असुविधा दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं लेकिन कोई कदम उठाए गए होते तो यात्रियों को एयरपोर्ट पर इतनी परेशानियां नहीं झेलनी पड़तीं.


Go First देश की No Frill एयरलाइंस है. यानी ये लोगों को सस्ती हवाई यात्रा करवाती है  तो क्या सस्ती यात्रा करवाने के चक्कर में ही Go First का बेड़ा गर्क हो गया है या वजह कुछ और है.  DGCA को दी गई जानकारी में Go First ने बताया है कि एयरलाइन के पास कैश खत्म हो गया है. इस कारण वो ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के बकाये का भुगतान नहीं कर पा रही है. इन कंपनियों ने उसे तेल देने से इन्कार कर दिया है. एयरलाइन का कहना है कि इंजन बनाने वाली अमेरिकी कंपनी Pratt एंड Whitney के इंजन लगातार फेल हो रहे हैं, जिसके चलते उसे अपने आधे विमानों की उड़ान रोकनी पड़ी है.


रिपोर्ट के मुताबिक Go First ने Pratt & Whitney के खिलाफ मुकदमा भी किया है जिसमें उसने कहा है कि एयरलाइन को अगर इंजन नहीं मिले तो कंपनी दिवालिया हो जाएगी  लेकिन Pratt & Whitney की तरफ से कहा गया है कि Go First ने उसका पेंडिंग भुगतान क्लियर नहीं किया है ऐसे में उसे और इंजनों की सप्लाई संभव नहीं है. Go First ने खुद भी माना है कि उसकी हालत ठीक नहीं है. 


कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक उसके बेड़े में कुल 61 विमान हैं. 31 मार्च तक के आंकड़ों के मुताबिक आधे यानी 30 विमान फ्यूल की कमी से ऑपरेट नहीं हो पा रहे थे. इनमें 9 विमान ऐसे भी हैं जिनके लीज़ पेमेंट का भी भुगतान अटका हुआ है. 


कम पैसे में हवाई यात्रा करवाने वाली Go Air के पास अब खुद पैसे कम पड़ गये हैं. उसने खुद को दिवालिया घोषित करने की अपील दायर कर दी है लेकिन ये सबकुछ एकदम से नहीं हुआ है. ये अलग बात है कि कंपनी ने सरकार से इस बात को छिपाये रखा. 


एयरलाइंस के मुताबिक..


- दिसंबर 2019 में उसके सिर्फ 7 प्रतिशत विमान उड़ान नहीं भर पा रहे थे.


- दिसंबर 2020 में उसके 31 प्रतिशत विमान ग्राउंड किये गये यानी उड़ान नहीं भर रहे थे.


-  दिसंबर 2022 में उसके 50 प्रतिशत विमान ग्राउंड हो चुके थे ।


कंपनी इसका ठीकरा इंजन निर्माता कंपनी Pratt & Whitney पर फोड़ रही है. अभी ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब टाटा की एयर इंडिया ने बोइंग और एयरबस के साथ विमानों की सबसे बड़ी डील की थी तो इसे दुनिया के एवियेशन सेक्टर में मील का पत्थर बताकर खूब प्रचारित किया गया था,  लेकिन Go First के दिवालियापन ने भारतीय एवियेशन सेक्टर की बदहाली का सबूत दे दिया है.  Go First की इस बदहाल माली हालत की वजह क्या है.


कंपनी के माली हालत की क्या है वजह


सिविल एवियेशन मिनिस्टर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 1 मई को ही ये ऐलान किया था और दावा किया था कि भारत में घरेलू एयर ट्रैफिक अब कोविड से पहले वाली एवरेज पर पहुंच गया है. जिसके लिए उन्होंने एक डेटा शेयर करते हुए बताया था कि 27 अप्रैल 2023 को एक दिन में 3054 घरेलू उड़ानों का रिकॉर्ड बना और 30 अप्रैल को 4 लाख 56 हजार से ज्यादा घरेलू यात्रियों ने उड़ान भरी जो कोविड के बाद एक रिकॉर्ड है. 


तो जब सरकार कह रही है कि देश में घरेलू विमान यात्रियों के नंबर्स तेजी से बढ़ रहे हैं और भारतीय सिविल एवियेशन सेक्टर रोज नए कीर्तिमान रच रहा है तो फिर घरेलू उड़ानें संचालित करने वाली Go First दिवालिया कैसे हो गई, जबकि Go First ने खुद बताया है कि पिछले तीन वर्षों में एयरलाइन में 3200 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है. जिसमें से 2400 करोड़ रुपये पिछले 24 महीनों में डाले गए थे और 290 करोड़ तो अकेले अप्रैल 2023 में लगाये गये. यानी एक महीना पहले.


इसके बाद भी Go First को तीन दिन के लिए अपनी सारी फ्लाइट्स कैंसिल करनी पड़ गईं और दिवालिया होने की अपील दायर करनी पड़ गई. वो भी तब जब Go First का संचालन वाडिया ग्रुप के पास है जो देश का बड़ा बिजनेस ग्रुप है . इसके बावजूद Go First काफी लंबे समय से घाटे में चल रही थी.  रिपोर्ट्स के मुताबिक Go First पर इस समय 6,521 करोड़ रुपये का कर्ज है  और वो यात्रियों की घटती संख्या की वजह से नुकसान झेल रही है और अब जल्द ही देश की एक और एयरलाइन कंपनी दिवालिया हो जाएगी. 


भारत में प्राइवेट एयरलाइंस फेल क्यों हो जाती हैं?


पहली वजह है - AIr Turbine Fuel यानी ATF की बढ़ती कीमतें


एयरलाइंस की कुल ऑपरेटिंग कॉस्ट का करीब 50 फीसदी ATF खरीदने पर ही होता है. पिछले कुछ वर्षों में ATF की कीमतों में 70 प्रतिशत तक का इजाफा हो चुका है. जिससे एयरलाइंस कंपनियों की ऑपरेटिंग कॉस्ट तेजी से बढ़ी है और घाटा बढ़ा है. भारत में ATF पर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग और बहुत ज्यादा वैट लगता है. एयरलाइंस कंपनियों की मांग है कि ATF को GST के तहत लाया जाए.


दूसरी वजह है - डॉलर की बढ़ती वैल्यू


ATF खरीदने से लेकर नये एयरक्राफ्ट खरीदने, मेंटनेंस जैसे सारे कामों की पेमेंट डॉलर में होती है. डॉलर की कीमत बढ़ती है तो ये खर्च भी बढ़ता है जिससे एयरलाइंस कंपनियों का मुनाफा घटता है और आर्थिक बोझ पड़ता है.


तीसरी वजह है - हाई मेंटनेंस कॉस्ट


एयरलाइन कंपनियों को अपने हवाई जहाजों की मेंटनेंस पर भारी खर्च करना पड़ता है. अगर कोई विमान ग्राउंडेड है यानी उड़ान नहीं भी भर रहा है तब भी उसकी पूरी मेंटनेंस पर खर्च होता है. उदाहरण के तौर पर कोरोना महामारी के दौरान जब विमान सेवाएं ठप थीं तब भी एयरलाइन कंपनियों को मेंटनेंस पर पूरा खर्च करना पड़ रहा था.


चौथी वजह है - सरकार का दखल


सिविल एवियेशन सेक्टर को काफी हद तक सरकार ही रेगुलेट करती है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक सरकारें प्राइवेट एयरलाइंस के मुकाबले सरकारी एयरलाइंस के हित को ध्यान में रखकर नीतियां बनाती हैं जिससे प्राइवेट एयरलाइंस को नुकसान होता है. प्राइवेट कंपनियों के हवाई टिकटों की कीमतें भी सरकार ही रेगुलेट करती है जिससे प्राइवेट एयरलाइंस घाटे में चली जाती हैं.


पांचवी वजह है - विमान यात्रियों की कम संख्या


दरअसल भारत में सिर्फ 4 प्रतिशत यात्री ही हवाई जहाज से ट्रेवल करते हैं जबकि एयरलाइन कंपनी खोलने के लिए एक बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश की जरूरत पड़ती है. लेकिन उसके मुकाबले यात्रियों की संख्या उतनी नहीं होती कि प्राइवेट एयरलाइन कंपनियां अपनी लागत निकाल पाएं और मुनाफा कमा पाएं. इसलिए भारत में ज्यादातर प्राइवेट एयरलाइन कंपनियां पांच साल भी नहीं चल पातीं.


आम धारणा ये है कि एयरलाइंस कंपनियों यात्रियों से टिकट की भारी-भरकम कीमतें वसूलकर खूब मुनाफा कमाती हैं लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं. एयरलाइन कंपनी चलाना एक कम मुनाफे का बिजनेस होता है. इसकी ऑपरेशन कॉस्ट इतनी ज्यादा होती है कि महंगे टिकट बेचकर भी उसकी भरपाई करना एक चुनौती बन जाता है  और ये चुनौती सिर्फ एयरलाइन कंपनियों की नहीं है..मोदी सरकार की भी है. क्योंकि सिर्फ एयरपोर्ट्स बना देने से काम नहीं चलेगा .उन एयरपोर्ट्स को चलाने के लिए प्राइवेट एयरलाइंस का चलना भी जरूरी है  लेकिन जिस तरह से प्राइवेट एयरलाइंस भारी घाटे में चल रही हैं वो भारत के सिविल एवियेशन सेक्टर की अच्छी तस्वीर पेश नहीं कर रही है.


जरूर पढ़ें


Karnataka Election: 'विषकन्या', 'नालायक बेटा' टिप्पणी पर बीजेपी, कांग्रेस विधायकों की मुश्किलें बढ़ीं, चुनाव आयोग का नोटिस
Weather Update: मई में Winter Returns! गर्मी के लॉकडाउन वाले महीने में क्यों निकालने पड़े कंबल? चौंकाने वाली है वजह
ब्रिटिश शाही परिवार ने कोहिनूर से बनाई दूरी, किंग चार्ल्स के ताजपोशी में शामिल नहीं होगा Kohinoor, जानिए क्यों?
'रशियन लड़कियों का डांस कराना चाहता हूं', प्रत्याशी के नाम से EC को लिखा लेटर Viral