Umang Singhar: मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने पीढ़ी परिवर्तन की तरफ कदम बढ़ाया है. तेज तर्रार नेता उमंग सिंघार को नेता प्रतिपक्ष बनाकर कांग्रेस ने कई सियासी मैसेज दिए हैं. कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने उमंग को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है, लेकिन कई सीनियर नेताओं को दरकिनार करते हुए उमंग को ही नेता प्रतिपक्ष के लिए क्यों चुना गया, इसके पीछे कई वजह हैं. उमंग ने केवल राहुल गांधी के भरोसे पर खरे उतरे हैं बल्कि राज्य की जातिगत समीकरणों में भी फिट बैठे हैं. 


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बुआ ने कराई सियासी एंट्री 


कांग्रेस नेता उमंग सिंघार की राजनीति में एंट्री उनकी बुआ जमुना देवी ने ही कराई थी. उमंग युवा अवस्था से ही जमुना देवी का राजनीति में हाथ बंटाने लगे थे 1998 में वह पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े थे, जिसमें उन्हें बेहद कम अंतर से हार का सामना करना पड़ा था. लेकिन 2008 में वह पहली बार विधानसभा चुनाव में जीते और उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. यानि उन्हें जमुना देवी का राजनीतिक सीख विरासत में मिली है. खास बात यह है कि जमुना देवी प्रदेश की उपमुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष रह चुकी है. ऐसे में उमंग के पास एक लंबा सियासी अनुभव है, इसके अलावा भी कई और कारण उन्हें नेता प्रतिपक्ष जैसे अहम पद तक पहुंचाने में सफल रहे हैं. 


उमंग के नेता विपक्ष बनने के बड़े कारण 


जातिगत समीकरण 


मध्य प्रदेश की राजनीति में आदिवासी वर्ग सबसे अहम माना जाता है, राज्य की 47  विधानसभा सीटें इस वर्ग के लिए आरक्षित हैं, जबकि 100 सीटों पर इस वर्ग का सीधा प्रभाव रहता है. ऐसे में कांग्रेस ने उमंग सिंघार को नेता प्रतिपक्ष बनाकर इस वर्ग को साधने की कोशिश की है. खास बात यह है कि 2018 के चुनाव में आदिवासी वर्ग का साथ मिलने से कांग्रेस 15 साल बाद सत्ता में वापसी करने में सफल रही थी. लेकिन 2023 में इस वर्ग का साथ फिर से छूटा है, जिससे कांग्रेस को नुकसान हुआ है, ऐसे में कांग्रेस उमंग सिंघार के जरिए 2023 के नुकसान की भरपाई 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में करने की पूरी कोशिश करना चाहेगी. खास बात यह है कि विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने हर वर्ग को कुछ न कुछ दिया है. लेकिन अब तक आदिवासी वर्ग को बड़ा पद प्रदेश में नहीं मिला है. ऐसे में कांग्रेस उमंग सिंघार को आगे किया है. 


मालवा-निमाड़ से आते हैं उमंग सिंघार 


बीजेपी ने इस बार बड़ा दांव चलते हुए तमाम दिग्गजों को दरकिनार करते हुए डॉ. मोहन यादव को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया है, जो मालवा-निमाड़ से आते हैं. ऐसे में कांग्रेस ने भी बीजेपी की राह पर चलते हुए उमंग सिंघार को नेता प्रतिपक्ष बना दिया. मालवा-निमाड़ क्षेत्र की कई सीटों पर आदिवासी वर्ग प्रभावी है, जबकि यहां सबसे ज्यादा 65 विधानसभा सीटें आती हैं. ऐसे में कांग्रेस अभी से मालवा-निमाड़ में अपनी जमीन मजबूत करना चाहती है. पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी भी इसी वर्ग से आते हैं. 


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युवा नेता और तेज तर्रार छवि 


कांग्रेस अब तेजी से युवाओं को आगे कर रही है. मध्य प्रदेश में तो फिलहाल यही मैसेज देने की कोशिश की गई है. उमंग सिंघार गंधवानी सीट से लगातार चौथी बार विधानसभा पहुंचे हैं, इस चुनाव में जहां कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं का सियासी कौशल धरा का धरा रह गया. वहां उमंग अपना सियासी लोहा मनवाने में फिर कामयाब रहे. उन्होंने गंधवानी सीट को कांग्रेस के मजबूत गढ़ में तब्दील कर दिया है. इतना ही नहीं उमंग के पास संगठन में काम करने का पूरा अनुभव है, वह युवा कांग्रेस के अध्यक्ष से लेकर पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. जबकि राजनीति में उनकी सक्रियता और उनकी सियासत का अंदाज भी युवा को वर्ग को भाता है. जिससे वह हर मोर्चे पर खरे उतरे. 


गुटबाजी से दूरी 


मध्य प्रदेश में कांग्रेस के ऊपर हमेशा गुटबाजी के आरोप लगते रहे हैं. लेकिन उमंग सिंघार ऐसे नेताओं में गिने जाते हैं, जो गुटनिरपेक्ष राजनीति के लिए जाने जाते हैं. वह मध्य प्रदेश के दो प्रभावशाली गुटों में से किसी के ज्यादा करीबी नहीं रहे. उमंग की राजनीति की अपनी अलग स्टाइल रही है. बेबाकी से हर बात रखना उनकी प्रभाव की सबसे बड़ी बात रही है. संगठन में काम करने के अनुभव के साथ-साथ जुझारू नेता की छवि उन्हें नेता प्रतिपक्ष की रेस में बाजी मारने में महत्वपूर्ण साबित हुई है. इसके अलावा उमंग को आगे करके कांग्रेस ने यह मैसेज देने की कोशिश की है कि पार्टी में संगठन से बड़ा कोई नहीं है. राहुल गांधी से उनकी करीबी भी इसमें एक बड़ी वजह हैं. 


सदन में जोश और अनुभव का मिश्रण 


मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार मिली है. पार्टी 230 में से केवल 66 सीटें ही जीत पाई. ऐसे में विधानसभा में पार्टी इस बार थोड़ी कमजोर नजर आ रही हैं. ऐसे में कांग्रेस को ऐसे नेता की जरुरत थी जो अनुभव के साथ-साथ जोश से भी लबरेज हो. उमंग इस मामले में बिल्कुल फिट बैठे. वह चौथी बार विधानसभा चुनाव पहुंचे हैं, ऐसे में उन्हें बतौर विधायक 15 साल से भी ज्यादा का अनुभव हैं, जबकि तेज तर्रार युवा की नेता कि छवि और भाषण शैली भी उमंग की मजबूती है. ऐसे में वह सत्ता पक्ष को घेरने में पूरी तरह से कारगर साबित हो सकते हैं. 


ऐसा है उमंग का सियासी सफर 
 
बात अगर उमंग सिंघार के सियासी सफर की जाए तो सियासत उन्हें विरासत में मिली है. बुआ जमुना देवी की ऊंगली पकड़कर वह राजनीति में आए हैं. 2001 में युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बने थे. 2008 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीते. 2018 में लगातार तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीतकर कमलनाथ सरकार में वनमंत्री की जिम्मेदारी संभाली. 2023 का चुनाव जीतकर अब नेता प्रतिपक्ष जैसी बड़ी जिम्मेदारी संभालेंगे. 


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