Shahpura News: राजस्थान के शाहपुरा जिला के मेवाड़ के शक्तिपीठो में से एक प्राचीन शक्तिपीठ धनोप माता का मन्दिर भीलवाड़ा से 120 किलोमीटर की दूरी पर खारी नदी व दूसरी तरफ मानसी नदी के छोर पर स्थित है. वर्ष के दोंनो नवरात्र के पवित्र दिनों में मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं कि भीड़ लग जाती हैं. 


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धनोप माता मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह राणावत ने बताया कि विष्णुपुराण में 6000 वर्ष पुरानी दैनिक भागवत के अनुसार, धनोप का राजा धुन्ध जो खारी नदीं के तट पर किले में रहता था, जो किला आज भी  मौजूद है. राजा  भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने उड़ीसा जा रहे थे. तब कोलकता में माता ने दर्शन दिया और कहा कि तू वापस चला जा मैं तेरे धनोप  स्थित टीले पर ही हूं और जगदीशवरी हूं.


राजा ने बात को ना मान कर अपनी यात्रा जाड़ी रखी. कोलकाता के आगे निकलने के दौरान राजा की नेत्र की ज्योति चली गई. मातेश्वरी द्वारा कहीं गई बात पर राजा ने पुनः विचार किया और वापस लौट गया, जिससे नेत्र ज्योति वापस आ गई. राजा धनोप पंहुच कर, ग्राम वासियों को साथ ढ़ोल नगाड़ों के साथ, टीले पर पहुचे. जहां माता की 7 मूर्तियां प्रकट हुई जिनमें, श्री अष्टभुजा, श्री अन्नपूर्णा, श्री चामुंडा, श्री महिषासुरमर्दिनी (बिश्वनजी), श्री कालका इन पांचों मूर्तियों सहित 2 अदृश्य मूर्तियां है,जो दर्शन नही देती,उनकी पूजा-अर्चना की और छमा मांगी. माताजी का श्रृंगार आज भी फूल-पत्ती द्वारा किया जाता है एवं कुआं था, जो आज भी मौजूद है.
 
एक और पूरानी प्रसीद्ध कथा 


कन्नौज के राजा जयचंद व चित्तौड़ के महाराणा समर सिंह के मध्य युद्ध के दौरान हुई सन्धि मे राजा जयचंद ने छतरी बनाई व चित्तौड़ के महाराणा समर सिंह ने शिव परिवार की स्थापना की जो आज भी विधमान है. मातेश्वरी मंदिर के सामने भेरुजी महाराज का पवित्र स्थान है जहां पर प्रेत,आत्माओं से पीड़ित आमजन को छुटकारा मिलता है. पीड़ित नवरात्र में वहीं रहकर पूजा अर्चना करता हैं. 


गरीब से लेकर अमीर व्यक्ति भी माता के चौखट पर पूजा-अर्चना कर कार्य पूर्ण करने की प्रार्थना करता हैं. वर्ष के दोंनो नवरात्र के पवित्र दिनों में पूरे मंदिर परिसर को भव्य रूप से रौशनी, रंग-बिरंगी पताकाओं से सजाया जाता है. श्रद्धालुओं के लिए शुद्ध जल, ठहरने, वाहनों की सुरक्षा एवं आने जाने के रास्तो की व्यवस्थाएं की गई है. 


मेलें में अनुशासन एवं शांति को बरकरार रखने के लिए फूलियाकलां पुलिस 24 घंटे तैनात रहेंगे. प्रशासन द्वारा धनोप मातेश्वरी स्थान पर इंदिरा रसोई खोलने का चयन किया है जहां पर आने वाले श्रद्धालुओं एवं दर्शनार्थियों को मात्र ₹8 में पौष्टिक भोजन भी उपलबद्ध हैं.
 
पुजारी मदनलाल पंडा  ने बताया कि धनोप माता की आरती हर रोज़ सुबह-शाम दोनो समय होती है. लेकिन नवरात्रा के समय एकम से लेकर दशमी तक प्रातः 3:30 बजे मंगला आरती, सुबह 7.30 बजे मुख्य आरती और 6.30 बजे सायं आरती कि जाति हैं. दसमीं को 11 दिवसीय शारदीय नवरात्र मेले का समापन हो जाता हैं.