नई दिल्लीः Lok Sabha Election: इस बार देश में 18वीं लोकसभा का चुनाव होने जा रहा है. इसे देखते हुए सभी पार्टियों ने अपनी-अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं. इतिहास के पन्नों में लोकसभा चुनाव से जुड़े कई किस्से-कहानियां दर्ज हैं. इन्हीं किस्सों में से एक किस्सा देश के पहले कानून मंत्री डॉ. भीमराव अंबेडकर से जुड़ा है. साल 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में बाबा साहब को अपने ही करीबी रहे एनएस काजोलकर से कड़ी शिकस्त का सामना करना पड़ा था. 


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1951 में कांग्रेस से दे दिया इस्तीफा
बात 27 सितंबर 1951 की है. हिंदू कोड बिल पर कांग्रेस से मतभेद की वजह से भीमराव अंबेडकर ने अंतरिम सरकार से इस्तीफा दे दिया. इस दौरान बाबा साहब ने पीएम पंडित जवाहरलाल नेहरू पर अपने बयानों से पलटने का आरोप भी लगाया था. कांग्रेस सरकार से इस्तीफे के बाद बाबा साहब देश में अनुसूचित जातियों को संगठित करने में लग गए और शेड्यूल कास्ट्स फेडरेशन नाम से एक नया संगठन बनाया. 


अंबेडकर की पार्टी ने देश में उतारे 32 उम्मीदवार
कांग्रेस सरकार से इस्तीफे के एक साल बाद ही देश में पहला लोकसभा चुनाव होने वाला था. इसमें अंबेडकर ने भी भाग लेने का फैसला किया और देश भर में अपने 35 उम्मीदवार उतारे. हालांकि, चुनावी नतीजे देख अंबेडकर के पैरों तले जमीन खिसक गई. उनकी पार्टी मजह 2 सीटें ही जीत पाई. अंबेडकर को खुद भी हार का सामना करना पड़ा. उन्होंने महाराष्ट्र की उत्तरी मुंबई सीट से चुनाव लड़ा था और करीब 15 हजार वोटों से हार गए थे. 


कांग्रेस ने काजोलकर को बनाया था उम्मीदवार
उत्तरी मुंबई की सीट से कांग्रेस ने अंबेडकर के खिलाफ उनके ही करीबी रहे एनएस काजोलकर को उम्मीदवार बनाया था. काजोलकर एक दूध व्यवसायी थे और पिछड़े वर्ग से आते थे. कहा जाता है कि नेहरू ने खुद काजोलकर के लिए चुनावी सभाएं आयोजित करवाई थीं और दो बार इस लोकसभा क्षेत्र में काजोलकर के लिए प्रचार-प्रसार किया था. 


चौथे स्थान पर रहे थे अंबेडकर 
उस चुनाव में अंबेडकर को 1 लाख 23 हजार 576 वोट मिले थे. वहीं, काजोलकर को 1 लाख 37 हजार 950 वोट. उस चुनाव में उत्तरी मुंबई की सीट पर चतुष्कोणीय लड़ाई देखने को मिली थी और अंबेडकर चौथे स्थान पर रहे थे. अंबेडकर के हार का सिलसिला यही पर नहीं रुका. इसके ठीक दो साल बाद 1954 में उन्होंने बंडारा की लोकसभा सीट से उप चुनाव लड़ा और इस बार भी हार गए. इसके दो साल बाद 1956 में उनकी मौत हो गई. लिहाजा वे 1957 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ पाए. 


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