नई दिल्ली. ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी (एआईकेएससीसी) के ऐलान के बाद आज से दिल्ली में तीन राज्यों के किसानों का दो दिवसीय विरोध-प्रदर्शन शुरू हो रहा है. खेती से जुड़े केंद्र सरकार के तीन क़ानूनों का विरोध करते हुए पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान 26-27 नवंबर को 'दिल्ली चलो' के आह्वान के साथ आज से राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन के लिए पहुँचने वाले हैं.


केंद्र सरकार के कृषि कानून हैं निशाने पर


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कृषि बिल का विरोध कर रहे ये आंदोलनकारी किसान आज राजधानी दिल्ली में चक्का जाम करने की योजना के साथ दिल्ली पहुँचने वाले हैं. ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी (एआईकेएससीसी) इस आंदोलन का नेतृत्व कर रही है और उसने घोषणा की है कि इन आंदोलनकारी किसानों को जहां भी दिल्ली में जाने से रोका जाएगा, वे वहीं पर बैठकर विरोध-प्रदर्शन शुरू कर देंगे. योगेंद्र यादव की पार्टी 'स्वराज इंडिया' के किसान संगठन 'जय किसान आंदोलन' और भारतीय किसान यूनियन (लखोवाल ग्रुप) के किसान इस आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं. स्वराज इण्डिया का कहना है कि कि हरियाणा पुलिस ने एक एडवाइज़री जारी करके हरियाणा से आगे किसानों को रोकने की तैयारी कर ली है, किन्तु फिर भी किसान आंदोलन को रोकना किसी तरह सम्भव नहीं होगा.


ये हैं तीनों  क़ानून


सितंबर में केंद्र सरकार के लाए गए तीन किसान क़ानूनों का तीन प्रदेशों के किसान संगठन कड़ा विरोध कर रहे हैं और विपक्षी दल भी इन कानूनों को लेकर कड़ा एतराज जता रहे हैं. आइए देखते हैं इन तीनों कानूनों में ऐसा क्या प्रावधान किया गया है जिस पर इतना हल्ला मच रहा है:


1. कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020


इस कानून के माध्यम से एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने की योजना है जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी से बाहर फ़सल बेचने की स्वतंत्रता प्राप्त होगी. इन प्रावधानों के माध्यम से राज्य के अंदर और दो राज्यों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने का प्रयास भी किया जायेगा. साथ ही मार्केटिंग और ट्रांस्पोर्टेशन पर ख़र्चा भी कम किया जायेगा.


2. कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) मूल्य आश्‍वासन और कृषि सेवा पर क़रार विधेयक, 2020


इस विधेयक के द्वारा सरकार ने में कृषि क़रारों पर राष्ट्रीय फ्रेमवर्क का प्रावधान किया है. इस बिल के माध्यम से कृषि उत्‍पादों की बिक्री, फ़ार्म सेवाओं, कृषि व्यापार फ़र्मों, प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं और निर्यातकों के साथ किसानों को जोड़ने की दिशा में मजबूती से काम करता है. इस कानून के माध्यम से अनुबंधित किसानों को गुणवत्ता वाले बीज की आपूर्ति सुनिश्चित की जायेगी, उनको तकनीकी सहायता प्रदान की जायेगी साथ ही फ़सल स्वास्थ्य की निगरानी, कर्जा लेने की सुविधा तथा फ़सल बीमा सुविधा भी प्रदान की जायेगी.


3. आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020


इस कानून के अंतर्गत अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्‍याज़ आलू को आवश्‍यक वस्‍तुओं की सूची से बाहर करने का प्रावधान किया गया है. सरकार का कहना है इस विधेयक के प्रावधानों से बाज़ार में स्पर्धा बढ़ेगी और किसानों को उचित मूल्य मिल सकेगा.


ये कारण हैं विरोध के


''बाजार के हित में बने हैं कानून''


किसान संगठनों का कहना है कि सरकार के ये कानून बाजार के हित में बनाये गये हैं, किसानों के हित में नहीं. किसान संगठनों ने आरोप लगाया है कि नए क़ानून के लागू होते ही कृषि क्षेत्र भी पूँजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका नुक़सान किसानों को होगा. किसान कहते हैं कि यदि उनको बाज़ार में अच्छा दाम मिल ही रहा होता तो वो अपनी उपज बेचने बाहर क्यों जाते.


''उपज कम दाम पर बेचने को विवश हैं''


किसानों का कहना है कि जिन उत्पादों पर किसानों को एमएसपी नही मिलती, वे उत्पाद उनको कम दाम पर बेचने को विवश होना पड़ता है.


''एफसीआई हतोत्साहित होगी''


आन्दोलनकारी किसानों में इन कानूनों के कारण यह भय पैदा हो गया है कि अब  एफ़सीआई राज्य की मंडियों से ख़रीद नहीं कर पाएगा और इस वजह से दलालों और आढ़तियों को ढाई फीसदी कमीशन का घाटा होगा. इसके अलावा राज्य का भी छह प्रतिशत के अपने कमीशन का नुकसान होगा, ये कमीशन राज्य एजेंसी की ख़रीद पर लगाता है. किसानों को डर है कि इससे होगा ये कि आने वाले समय में धीरे-धीरे मंडियां ख़त्म होने लगेंगी.


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