Kaifi Azmi Shayari: कैफी आजमी उर्दू मशहूर शायर थे. उनका असली नाम अख्तर हुसैन रिजवी था. उनका ताल्लुक उत्तर प्रदेश से था. कैफी आजमी ने 11 साल की उम्र से ही शेर व शायरी करनी शुरू की. कम उम्र में ही उन्होंने मुशायरों में जाना शुरू किया. कैफी आजमी ने उर्दू जर्नल ‘मजदूर मोहल्ला’ का संपादन किया. कैफी आजमी की शादी शौकत से हुई. वह भी शायरा थीं. दोनों से दो बच्चे हुए. एक का नाम शबाना और दूसरे का नाम बाबा है. 10 मई 2002 को कैफी इस दुनिया को अलविदा कह गए.


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आज सोचा तो आँसू भर आए 
मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए 


हर क़दम पर उधर मुड़ के देखा 
उन की महफ़िल से हम उठ तो आए 


रह गई ज़िंदगी दर्द बन के 
दर्द दिल में छुपाए-छुपाए 


दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं 
याद इतना भी कोई न आए 
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शोर यूँही न परिंदों ने मचाया होगा 
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा 


पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था 
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा 


बानी-ए-जश्न-ए-बहाराँ ने ये सोचा भी नहीं 
किस ने काँटों को लहू अपना पिलाया होगा 


बिजली के तार पे बैठा हुआ हँसता पंछी 
सोचता है कि वो जंगल तो पराया होगा 


अपने जंगल से जो घबरा के उड़े थे प्यासे 
हर सराब उन को समुंदर नज़र आया होगा 
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की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ 
थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ 


गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो 
डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ 


मंज़िल से वो भी दूर था और हम भी दूर थे 
हम ने भी धूल उड़ाई बहुत रहनुमा के साथ 


रक़्स-ए-सबा के जश्न में हम तुम भी नाचते 
ऐ काश तुम भी आ गए होते सबा के साथ 


इक्कीसवीं सदी की तरफ़ हम चले तो हैं 
फ़ित्ने भी जाग उट्ठे हैं आवाज़-ए-पा के साथ 


ऐसा लगा ग़रीबी की रेखा से हूँ बुलंद 
पूछा किसी ने हाल कुछ ऐसी अदा के साथ