Sir Syed Ahmed Khan: हिंदुस्तानी मुसलमानों के लिए आधुनिक शिक्षा की मजबूद बुनियाद रखने वाले सर सैयद अहमद खां (Sir Syed Ahmed Khan) की 205वीं जयंती है. इस साल यह प्रोग्राम (Sir Syed Day) जोश-व-खरोश के साथ मनाया जाएगा. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में कोरोना की वजह से लगी पाबंदियों के चलते सर सैयद डे नहीं मनाया नहीं गया, या फिर ऑनलाइन माध्यमों से ही छोटे स्तर पर मनाया गया. फिलहाल कहीं भी कोरोना की पाबंदियां नहीं लगी हैं. 


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कैसे मिली हिंदुओं को AMU में इजाज़त
इस मौके पर हम सर सैयद अहमद खां के ख्वाबों की ताबीर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की तारीख से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी के बारे में बताते हैं. सबसे पहले तो यह कि इसकी स्थापना 1875 में हुई लेकिन उस वक्त प्राइवेट यूनिवर्सिटी बनाने की इजाजत नहीं थी, जिसकी वजह से इसका कयाम एक मदरसे के तौर पर किया था. इसका पहला नाम मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल (एमएओ) था. मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज को विघटित कर 1920 में अंग्रेजी सरकार की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के एक्ट के ज़रिए AMU एक्ट लाया गया. पार्लियामेंट ने 1951 में AMU संशोधन एक्ट पास किया, जिसके बाद इस इदारे के दरवाजे गैर-मुसलमानों के लिए खोले गए.


कितनी बड़ी है अलीगढ़ यूनिवर्सिटी
यह यूनिवर्सिटी ना सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि दुनियाभर में मशहूर है. 15 विभागों से शुरू हुए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में आज 108 विभाग हैं. करीब 1200 एकड़ में फैली यूनिवर्सिटी में 300 से ज्यादा कोर्स हैं. यहां 1400 का टीचिंग स्टाफ है और 6000 के करीब नॉन टीचिंग स्टाफ है. यूनिवर्सिटी कुल 1200 एकड़ में फैली हुई है.


मौलाना आजाद लाइब्रेरी
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी भी बहुत बड़ी है. एएमयू अपनी लाइब्रेरी के लिए भी जाना जाता है. जानकारी के मुताबिक AMU की मौलाना आजाद लाइब्रेरी में साढ़े 13 लाख किताबों के साथ तमाम दुर्लभ पांडुलिपियां भी मौजूद हैं. इसमें अकबर के दरबारी फैजी की फारसी में अनुवादित गीता, 400 साल पहले फारसी में अनुवादित महाभारत की पांडुलीपि, तमिल भाषा में लिखे भोजपत्र, 1400 साल पुरानी कुरान, सर सैयद की पुस्तकें और पांडुलिपियां भी शामिल है.


कौन थे सर सैयद अहमद खान
सर सैयद अहमद खां एक शिक्षक और नेता थे जिन्होंने भारत के मुसलमानों के लिए आधुनिक शिक्षा का आगाज़ की. खान अपने वक्त के सबसे असरदार मुस्लिम नेता थे और उन्होंने उर्दू को भारतीय मुसलमानों की इजतेमाई ज़बान बनाने पर जोर दिया था. कहा जाता है कि जहां भी उनका तबादला होता था, वहां वो स्कूल खोल देते थे. एक जानकारी के मुताबिक जब सैयद साहब को लगा कि अंग्रेजी और साइंस पढ़े बिना काम नहीं चलेगा तो उन्होंने मुस्लिम बच्चों को मॉडर्न एजुकेशन देने के लिए स्कूलों की स्थापना की.