लखनऊः आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या, कर्ज में डूबे किसान ने की आत्महत्या, बेरोजगार युवक ने की आत्महत्या, परीक्षा में कम नंबर आने पर आत्महत्या, बीवी के मायके जाने पर आत्महत्या, प्रेमिका के छोड़ जाने पर आत्महत्या, प्रेमी से विवाह न होने पर आत्महत्या और घरेलू कलह के कारण आत्महत्या, ऐसी खबरें आए दिन अखबारों में छपती रहती है. इन खबरों को हम रोज पढ़ते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. लेकिन यह मसला कोई आम मसला नहीं है. देशभर के लिए ये भीषण त्रासदी बनती जा रही है.


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लखनऊ स्थित नूर मंजिल मनोरोग केंद्र द्वारा जारी एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आत्महत्या से होने वाली मौतों के मामले मे भारत विश्व स्तर पर 38वें स्थान पर पहुंच गया है. यह केंद्र राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य देखभाल संगठन के तहत मनोरोग अस्पतालों की एक श्रृंखला है.


रिपोर्ट में बताया गया है कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2021 में प्रति लाख जनसंख्या पर 12 आत्महत्याएँ दर्ज की गईं; और उत्तर प्रदेश उन राज्यों में से एक था, जहां उस साल देशभर में सबसे ज्यादा आत्महत्या के मामले सामने आए थे. 


नूर मंजिल में नैदानिक मनोवैज्ञानिक, डॉ. अंजलि गुप्ता ने कहा, “लोगों के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि आत्महत्याओं को सिर्फ अवसाद से जोड़ना काफी नहीं है. खासकर युवाओं में आत्महत्या के बढ़ते मामले बेहद डरावने हैं." 


एक्सपर्ट मानते हैं कि आत्महत्या एक जटिल सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, जो सभी उम्र, लिंग और पृष्ठभूमि के लोगों को प्रभावित करती है. विशेषज्ञों का कहना है कि हर आत्महत्या से पहले, पीड़ितों, विशेष रूप से पुरानी बीमारी से पीड़ित लोगों में लक्षण दिखते हैं, जिन्हें अगर समझा जाए और गंभीरता से लिया जाए तो आत्महत्या को रोकने में मदद मिल सकती है.


कल्याण सिंह सुपर स्पेशलिटी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड हॉस्पिटल (केएसएसएससीआईएच) के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. देवाशीष शुक्ला कहते हैं, "अगर मूड गंभीर से मध्यम है तो चीजें ठीक हैं, लेकिन जब यह मध्यम अवसाद से गंभीर स्तर तक चला जाता है, तो आत्महत्या की प्रवृत्ति देखी जा सकती है." 


मनोचिकित्सा के विशेषज्ञ शुक्ला ने कहा, "बुनियादी लक्षणों में आप देख सकते हैं कि एक मरीज ने अपने आस-पास के लोगों से बात करना बंद कर दिया है. वह निराशा से भर जाता है और थोड़ा सा काम करने के बाद जल्दी थका हुआ महसूस करता है. ये लक्षण अचानक और बिना किसी स्पष्ट कारण के ध्यान देने योग्य हो जाते हैं. अगर ऐसा है तो परिवार को सतर्क हो जाना चाहिए. मरीज को किसी मनोचिक्तिसक से दिखाना चाहिए." 


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