राजेंद्र प्रसाद के कहने पर इन्होंने बनाई थी पहली भोजपुरी फिल्म, अंग्रेजों ने सुनाई थी फांसी की सजा!
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राजेंद्र प्रसाद के कहने पर इन्होंने बनाई थी पहली भोजपुरी फिल्म, अंग्रेजों ने सुनाई थी फांसी की सजा!

Nazir Hussain Movies: आजादी के कुछ महीनों पहले ही इन्हें अंग्रेजों ने फिर बंदी बना लिया. सबको लगा कि वो मर गए हैं लेकिन नजीर जिंदा थे और उन्हें अंग्रेजों को चकमा देना आता था.

राजेंद्र प्रसाद के कहने पर इन्होंने बनाई थी पहली भोजपुरी फिल्म, अंग्रेजों ने सुनाई थी फांसी की सजा!

Nazir Hussain Life Facts: भोजपुरी गाने तो हमने खूब सुने हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी शुरुआत भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के कहने पर मशहूर एक्टर नजीर हुसैन (Nazir Hussain) ने की थी? नजीर हुसैन फादर ऑफ भोजपुरी सिनेमा, जिन्होंने भोजपुरी की पहली फिल्म गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो बनाई. वैसे नजीर थे तो हिंदी सिनेमा के मशहूर कलाकार, जिन्होंने करीब 500 फिल्मों में काम किया. हिंदी फिल्मों में नजीर ज्यादातर पिता के रोल में नजर आए हैं. इनकी रियल लाइफ की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं. आजाद हिंद फौज के सिपाही, जिन्हें कभी वर्ल्ड वॉर 2 के समय मलेशिया में बंदी बनाया गया तो कभी इन्हें अंग्रेजों ने फांसी देने का फैसला किया.

15 मई 1922 को जन्मे नजीर हुसैन के पिता रेल्वे में गार्ड थे. नजीर बड़े हुए तो उन्हें भी पिता की सिफारिश में रेल्वे में फायरमैन की नौकरी मिल गई. वर्ल्ड वॉर के दौरान इन्होंने ब्रिटिश आर्मी जॉइन की. इनकी पोस्टिंग मलेशिया और सिंगापुर में हुई थी, जहां वॉर के सैनिकों को बंदी बना लिया गया था. उन सैनिकों को जब दिल्ली में फांसी दी जाने वाली थी तो साथियों ने ट्रेन पर हमला कर नजीर की जान बचाई. छूटकर जब भारत आए तो सुभाष चंद्र बोस के साथ ये आजाद हिंद फौज का हिस्सा बने. लिखने में माहिर थे तो सुभाष चंद्र बोस ने इन्हें प्रचार प्रसार का काम दे दिया. आजादी के कुछ महीनों पहले ही इन्हें अंग्रेजों ने फिर बंदी बना लिया. सबको लगा कि वो मर गए हैं लेकिन नजीर जिंदा थे और उन्हें अंग्रेजों को चकमा देना आता था.

कोलकाता से दिल्ली जाते हुए नजीर ने अंग्रेजों से पेन पेपर लिया और तुरंत अपने बंदी बने होने की जानकारी लिखी और चिट्ठी दिलदारनगर रेल्वे स्टेशन पर फेंक दी. वो चिट्टी एक गांववाले को मिली और उसने गांव में बताया कि नजीर जिंदा हैं. जब 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ तो अंग्रेजों ने सभी कैदियों को रिहा कर दिया.

आजादी के बाद काम ढूंढ रहे नजीर को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपने भाई सरन के पास कोलकाता भेजा. पहले उन्होंने न्यू थिएटर कंपनी के लिए नाटक लिखे, जहां काम से खुश होकर बिमल रॉय ने उन्हें अपना असिस्टेंट बना लिया. 1950 की पहला आदमी फिल्म के बाद नजीर हिंदी सिनेमा का अहम हिस्सा बन गए.1963 में भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत करने के बावजूद ये हिंदी फिल्मों में नजर आए. 16 अक्टूबर 1987 में कई फिल्में अधूरी छोड़ नजीर हार्ट अटैक आने से दुनिया छोड़ गए.

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