नेहरू 1948 में कश्मीर में सेना भेजने के इच्छुक नहीं थे :आडवाणी

सरदार पटेल को ‘‘पूरी तरह साम्प्रदायिक’’ बताने का पंडित जवाहरलाल नेहरू पर आरोप लगाने के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवणी ने गुरुवार को कहा कि 1947 में पाकिस्तानी सेना के कश्मीर में घुसने के बावजदू देश के पहले प्रधानमंत्री वहां सेना भेजने को इच्छुक नहीं थे लेकिन पटेल के दबाव से ऐसा करना पड़ा।

अंतिम अपडेट: Nov 7, 2013, 08:41 PM IST

नई दिल्ली : सरदार पटेल को ‘‘पूरी तरह साम्प्रदायिक’’ बताने का पंडित जवाहरलाल नेहरू पर आरोप लगाने के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवणी ने गुरुवार को कहा कि 1947 में पाकिस्तानी सेना के कश्मीर में घुसने के बावजदू देश के पहले प्रधानमंत्री वहां सेना भेजने को इच्छुक नहीं थे लेकिन पटेल के दबाव से ऐसा करना पड़ा।
आडवाणी ने अपने ब्लाग के नए लेख में 1947 में कर्नल रहे सैम मानिकशॉ के एक इंटरव्यू के हवाले से कहा कि पाकिस्तान की मदद से कबाइलियों के श्रीनगर के समीप पंहुचने पर भारतीय सेना को वहां भेजने का निर्णय करना था हालांकि, नेहरू इसके लिए तैयार नहीं लग रहे थे और वह उस मामले को संयुक्त राष्ट्र ले जाना चाहते थे।
वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा द्वारा किए गए मानेकशॉ के इंटरव्यू के हवाले से आडवाणी ने कहा कि महाराजा हरि सिंह द्वारा विलय के समझौते पर हस्ताक्षर करने के तुरंत बाद लार्ड माउंटबेटन ने कैबिनेट की बैठक बुलाई। इसमें नेहरू, पटेल और रक्षा मंत्री बलदेव सिंह आदि शामिल हुए।
मानेकशॉ ने उसमें ‘‘सैन्य स्थिति’’ को पेश किया और सुझाव दिया कि भारतीय सेना को आगे बढ़ना चाहिए। आडवाणी ने इंटरव्यू के हवाला देते हुए कहा, ‘‘हमेशा की तरह नेहरू संयुक्त राष्ट्र, रूस, अफ्रीका, ईश्वर और हर किसी की उस समय तक बात करते रहे, जब तक कि सरदार पटेल ने अपना आपा नहीं खो दिया।
उन्होंने कहा, ‘जवाहरलाल, आप कश्मीर चाहते हैं, या आप उसे गंवाना चाहते हैं।’ उन्होंने (नेहरू) कहा, ‘निस्संदेह, मैं कश्मीर चाहता हूं।’ तब उन्होंने (पटेल) कहा, ‘मेहरबानी करके आदेश दीजिए।’ और इससे पहले कि वह कुछ कहते सरदार पटेल मेरी तरफ पलटे और कहा, ‘आपको आदेश मिल चुका है’।’’
भाजपा नेता ने कहा, इसके बाद भारतीय सेना को पाकिस्तानी सेना से मोर्चा लेने के लिए श्रीनगर विमानों से भेजा गया और महाराजा हरि सिंह के मुस्लिम सैनिकों ने पाकिस्तान की ओर पाला बदल लिया। आडवाणी ने कहा, ‘‘मानेकशॉ और प्रेम शंकर झा से संबंधित यह रिपोर्ट नेहरू और पटेल के बीच मतभेदों की ठोस पुष्टि करती है।’’
इससे पहले उन्होंने अपने ब्लॉग पर पांच नवम्बर को 1947 बैच के आईएएस अधिकारी एम. के. के. नायर की पुस्तक ‘द स्टोरी ऑफ एन एरा टोल्ड विदआउट इल विल’’ का उद्धरण दिया। इस किताब में हैदराबाद के खिलाफ ‘पुलिस कार्रवाई’ से पहले हुई कैबिनेट की बैठक में नेहरू और पटेल के बीच हुए कथित ‘तीखे वार्तालाप’ का जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि नेहरू हैदराबाद के भारत में विलय के लिए पटेल की पुलिस कार्रवाई की योजना के खिलाफ थे।
सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने हालांकि भाजपा नेता द्वारा पेश उक्त सामग्री पर संदेह जाहिर करते हुए ट्वीटर पर आडवाणी से सवाल करते हुए कहा कि आईएएस की स्थापना 1946 में हुई थी। अगर नायर ने 1947 में ज्वाइन किया तो क्या उस स्तर के अधिकारी को 1948 में कैबिनेट की गोपनीय चर्चाओं की जानकारी हो सकती थी?
भाजपा कुछ समय से सरदार पटेल को हिन्दुत्व की विचारधारा के करीब बताने का प्रयास कर रही है। 31 अक्तूबर को पटेल के जन्मदिवस के मौके पर गुजरात में उनकी विशाल प्रतिमा के निर्माण की परियोजना की आधारशिला रखी गयी थी। उस कार्यक्रम में आडवाणी ने पटेल की प्रशंसा की थी। कार्यक्रम में मौजूद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि भारत को पटेल की धर्मनिरपेक्षता की जरूरत है न न कि वोट बैंक की धमनिरपेक्षता की।
तिवारी ने संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कहा, ‘‘वह आडवाणी का सम्मान करते हैं। वह देश के एक वरिष्ठ नेता हैं और साथ ही सवाल किया कि उन्होंने एक अधिकारी की पुस्तक का हवाला कैसे दिया जिससे उस समय की कैबिनेट की बैठक में क्या हुआ इसकी जानकारी होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है।
तिवारी ने सवाल किया, ‘‘उसे यह कैसे पता चला कि उसके नौकरी में आने के दो साल पहले कैबिनेट की बैठक में नेहरू ने क्या कहा। या अगर वह 1947 में आईएएस ज्वाइन किया तो क्या वह एक साल में ही ऐसी स्थिति में पहुंच गया कि उसे यह पता हो कि नेहरू कैबिनेट की बैठक में क्या कहते हैं। (एजेंसी)