भारत एक धार्मिक देश है जहां धार्मिक आस्था का सैलाब जर्रे-जर्रे में समाया नजर आता है। आस्था के पावन पर्व में श्रद्धालु उमड़ते हैं। तकरीबन हर जगह धार्मिक उत्सव के बीच आस्था का सैलाब उमड़ता है। लेकिन कभी-कभार इंसानी गलती की वजह से यह सैलाब दुखों के पहाड़ के रुप में टूट पड़ता है।


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झारखंड के देवघर में सावन के दूसरे सोमवार को तकरीबन यही दुखद रुप देखने को मिला। जब सावन के सोमवार का जश्न बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर में मातम में बदल गया। बेलाबागान स्थित दुर्गा मंदिर में भगदड़ के करीब 11 लोगों की मौत हो गई और 50 से ज्यादा लोग घायल हो गए।


झारखंड में देवघर 12 ज्योतिर्लिगों में से एक है। यहां आम दिनों में भी श्रद्धालुओं की तादाद हजारों में रहती है। लेकिन किसी पर्व त्यौहार के मौकै पर खासकर शिवरात्रि, सावन के महीने में और वह भी सोमवार के दिन यह श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में पहुंच जाती है। इस बार भी सोमवार को सावन के दिन लगभग सवा दो लाख भोले के दरबार में श्रद्धालु दर्शन के लिए आए थे। प्रशासन को इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद नहीं थी। लेकिन भीड़ इतनी हुई की सबकुछ चरमरा गया।


किसी भी श्रद्धालु की आस्था पर चोट भी नहीं किया जा सकता। एक खास दिन भगवान शंकर के शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए इतने लोगों के आने से यकीनन इंतजाम प्रभावित होता है। क्योंकि बिहार और झारखंड में उन मंदिरों को लेकर वैसी सुरक्षा इंतजाम का हमेशा अभाव होता है जहां श्रद्धालु लाखों की संख्या में आते है। दक्षिण भारत के मशहूर मंदिर जैसे तिरुपति मंदिर में रोजाना लाखों की संख्या में भीड़ होती है लेकिन वहां प्रशासन मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चौकन्ना रहता है।


देवघर में श्रद्धुलाओं की मंदिर से 17 किलोमीटर दूर तक लंबी लाइन थी जिसमें लाखों लोग अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे थे। बैरिकेड व्यवस्था लोगों की लोगों की तादाद के मुताबिक नहीं थी। क्योंकि प्रशासन को अंदाजा ही नहीं था कि इतने लोग आ जाएंगे। धक्का-मुक्की में लाइन से अलग हुए लोगों को नियंत्रित करने के लिए हुए हल्के लाठीचार्ज ने माहौल बिगाड़ने का काम किया । सावन के सोमवार में शिव मंदिरों में भक्तों की संख्या तो बढ़ ही जाती है। लेकिन आस्था का सैलाब इतना दुखद रुप ले लेगा किसी ने सोचा भी नहीं था।


हादसे के अहम कारणों में स्थानीय पुलिस के मुताबिक बाबा भोलेनाथ को जल चढ़ाने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगी थी। 17 किलोमीटर पहले ही श्रद्धालुओं की लाइन लगनी शुरू हो गई थी। लोगों को कतार में रखने के लिए प्रशासन ने रस्सी बांध रखी थी, लेकिन वो रस्सी कुछ श्रद्धालुओं के पैर में फंस गई। श्रद्धालुओं के बीच आगे जाने की होड़ लगी थी। इसी दौरान सुबह करीब पौने पांच बजे मंदिर से करीब 3 किलो मीटर दूर भगदड़ मच गई। कुछ लोग आगे जाने की कोशिश करते भी दिखे और हादसा हो गया।


किसी भी मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का जाना यह उनकी उत्कट आस्था है जिसे किसी भी सूरते हाल में रोका नहीं जा सकता है। लेकिन जब श्रद्धालु लाखों की संख्या में मंदिरों में दर्शन के लिए रुख करते है तो यह प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि उन्हें दर्शन के क्रम में किसी प्रकार की तकलीफ नहीं हो। इसके लिए सिर्फ बैरिकेडिंग ही काफी नहीं होती है बल्कि इसके लिए पुलिस के साथ वोलिंटियर्स की भी मदद ली जानी चाहिए। कई जगहों पर ऐसी व्यवस्था की जाती है कि जब यह देखा जाता है कि मंदिर में भीड़ तेजी से बढ़ रही है तो लाइन को काफी दूर रोक दिया जाता है ताकि जो लोग मंदिर परिसर तक दर्शन के लिए पहुंच चुके है उन्हें दर्शन करने में कोई तकलीफ नहीं हो। इस व्यवस्था का सीधा फायदा यह होता है कि दर्शन के क्रम में ना तो कोई व्यवधान होता है और ना ही किसी प्रकार का दबाव का सामना करना पड़ता है। यह व्यवस्था सबकुछ निर्विघ्न संपन्न होने की बुनियात रखती है। जिसपर हमेशा चिंतन मनन कर उस मुताबिक इंतजाम किया जाना चाहिए।


देवघर हादसा पहला हादसा नहीं है जिसमें श्रद्धालुओं ने आस्था के सैलाब के बीच अपनी जान गंवाई हो। इससे पहले भी देश में कई जगहों पर ऐसी कई घटनाएं हुई है। दुख इस बात पर होता है कि ऐसे हादसों पर ठोस पहल करने की बजाय सिर्फ जांच और मुआवजे का ऐलान कर लीपापोती कर दी जाती है। हादसों के कारणों की जांच की रिपोर्ट भी सौंपी जाती है। लेकिन नतीजा सिफर होता है। ऐसे हादसे फिर होते है। आस्था के इस सैलाब में निर्दोष लोगों के जान गंवाने का सिलसिला चलता रहता है। इसपर पूर्णविराम कब लगेगा, यह एक यक्ष प्रश्न है।