नवरात्रि में 9 शक्ति पीठों की कहानी- इस मंदिर के गर्भ गृह में नहीं है मूर्ति, श्रीयंत्र की होती है पूजा

नवरात्रि के पावन दिनों में zeeupuk आपके लिए लाया है हर रोज एक शक्तिपीठ की कहानी. आज नवरात्रि का तीसरा दिन हैं. आज बात करेंगे तीसरे शक्तिपीठ की और ये शक्तिपीठ है अम्बा जी मंदिर जोकि गुजरात में है..आइए जानते हैं इस रहस्यमयी मंदिर के बारे में...

 नवरात्रि में 9 शक्ति पीठों की कहानी- इस मंदिर के गर्भ गृह में नहीं है मूर्ति, श्रीयंत्र की होती है पूजा
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आज चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन है. नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की विधि-विधान से पूजा की जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनसार, मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना करने से भक्त निर्भय और सौम्य बनता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मां चंद्रघंटा की पूजा करने से चंद्रमा की स्थिति सुधरती है.

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अम्बाजी का मंदिर गुजरात

अम्बाजी मंदिर शक्तिपीठों में शामिल सबसे प्रमुख स्थल है क्योंकि यहां माता सती का हृदय गिरा था. इसका उल्लेख "तंत्र चूड़ामणि" में भी मिलता है. शक्तिस्वरूपा अम्बाजी देश के अत्यंत प्राचीन 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. सफेद संगमरमर के पत्थरों से बना गुजरात का अम्बाजी मंदिर बेहद प्राचीन है. मां अम्बा-भवानी के शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर के प्रति मां के भक्तों में अपार श्रद्धा है. इस मंदिर के गर्भगृह में मां की कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है. शक्ति के उपासकों के लिए यह मंदिर बहुत महत्व रखता है.

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कहने को तो ये मंदिर भी शक्ति पीठ है पर इस मंदिर के गर्भगृह में मां की कोई भी मूर्ति स्थापित नहीं है. इस मंदिर में मां अम्बाजी की पूजा श्रीयंत्र की आराधना से होती है जिसे सीधे आंखों से नहीं देखा जा सकता. यहां के पुजारी इस श्रीयंत्र का श्रृंगार इतने अद्भुत तरीके से करते हैं कि श्रद्धालुओं को लगता है कि मां अम्बाजी जी यहां साक्षात विराजमान है.  इसके पास ही पवित्र अखण्ड ज्योति जलती रहती है. ऐसा कहा जाता है कि यहां पर भगवान श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार संपन्न हुआ था. कहा तो ये भी जाता है कि यहां पर भगवान राम भी शक्ति की उपासना के लिए आ चुके हैं. इस शक्तिपीठ में आरती के बीच में एक मिनट का विराम लिया जाता है. ऐसा सुबह शाम दोनों पहर किया जाता है.

मां अम्बाजी मंदिर गुजरात-राजस्थान सीमा पर स्थित है. मंदिर का शिखर एक सौ तीन फुट ऊंचा है. शिखर पर 358 स्वर्ण कलश सुसज्जित हैं. माना जाता है कि ये मंदिर लगभग बारह सौ साल पुराना है. इस मंदिर के जीर्णोद्धार का काम 1975 से शुरू हुआ था और तब से अब तक जारी है. 

इस मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर गब्बर नामक पहाड़ है. ये पहाड़ भी मां अम्बे के पद चिन्हों और रथ चिन्हों के लिए जाना जाता है. भक्त इस पर्वत पर पत्थर से बने मां के पैरों के चिन्ह और मां के रथ के निशान देखने के लिए आते हैं. अम्बाजी के दर्शन के बाद श्रद्धालु गब्बर जरूर जाते हैं. हर महीने की पूर्णिमा और अष्टमी पर यहां मां की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है.

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नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्रि पर्व में श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां माता के दर्शन के लिए आते हैं. इस समय मंदिर प्रांगण में गरबा करके शक्ति की आराधना की जाती है. समूचे गुजरात से कृषक अपने परिवार के सदस्यों के साथ मां के दर्शन के लिए एकत्रित होते हैं. व्यापक स्तर पर मनाए जाने वाले इस समारोह में ‘भवई’ और ‘गरबा’ जैसे नृत्यों का प्रबंध किया जाता है. साथ ही यहां पर ‘सप्तशती’ (मां की सात सौ स्तुतियां) का पाठ भी आयोजित किया जाता है।

कैसे पहुंचें
अम्बाजी मंदिर गुजरात और राजस्थान की सीमा से लगा हुआ है. आप यहां राजस्थान या गुजरात जिस भी रास्ते से चाहें पहुंच सकते हैं. यहां से सबसे नजदीक स्टेशन माउंटआबू का पड़ता है. आप अहमदाबाद से हवाई सफर भी कर सकते हैं. अम्बाजी मंदिर अहमदाबाद से 180 किलोमीटर और माउंटआबू से 45 किलोमीटर दूरी पर स्थित है.

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