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रांची की ई-रिक्शा चालक संतोषी ने बताया कैसे उसने बनाया खुद को सशक्त

संतोषी आज खुद को कामयाब मानती है. उसका कहना है कि जब आप मन में किसी चीज को ठान लेते हो और आपकी लगन सच्ची हो तो आपको कोई नहीं रोक सकता है.

रांची की ई-रिक्शा चालक संतोषी ने बताया कैसे उसने बनाया खुद को सशक्त
संतोषी रांची में ई-रिक्शा चलाती है.

रांचीः महिलाओं की सशक्तिकरण की बात प्रदेश से लेकर देश और दुनिया में हो रही है. लेकिन इसके लिए पहल कितनी की जा रही है यह काफी बड़ा सवाल है. हालांकि महिलाएं अपनी सशक्तिकरण को लेकर काफी गंभीर है. इस बात का पता रांची की एक महिला को देखने के बाद होता है. जिसने छोटी ही सही लेकिन अपने दम पर अपना नाम बनाया है. महिला का नाम संतोषी है जो एक ई-रिक्शा चालक है.

ई-रिक्शा चालक सुनकर ही आप समझ गए होंगे कि महिला जो झारखंड जैसे प्रदेश में रहकर रिक्शा चलाने का काम कर रही है. उसके लिए इस काम की शुरूआत करना ही कितना कठिन होगा. जिस समाज में महिलाओं को सड़कों पर गाड़ी चलाते देखा जाना सही नहीं समझा जाता है. लेकिन संतोषी ने इसकी परवाह किए बगैर अपने मंजिल की ओर बढ़ती चली गई.

संतोषी आज खुद को कामयाब मानती है. उसका कहना है कि जब आप मन में किसी चीज को ठान लेते हो और आपकी लगन सच्ची हो तो आपको कोई नहीं रोक सकता है. संतोषी ने बताया कि जिस राह पर वह चल रही थी उसे किसी ने ठीक नहीं कहा, किसने ताना मारा तो किसी ने गाली दी. रिक्शा लेकर जब सड़क पर उतरी तो तरह-तरह के कमेंट किए जाते थे. लेकिन उसने किसी की भी परवाह नहीं की.

अब उसका कहना है कि मेरी सफलता के बाद आज वही कमेंट करने वाले उसके सपोट में खड़े हो गए हैं. संतोषी का कहना है कि वह 2 साल से ई-रिक्शा चलाने का काम कर रही है. जिससे वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही है. उसके घर में दो भाई और दो बहन है.

संतोषी के सपने कुछ ज्यादा नहीं है और न ही वह बड़े ख्वाब देखने की कोशिश करती है. लेकिन वह इतना चाहती है कि महिलाओं को जो इस तरह से समाज में ताना मारा जाता है इसके लिए कुछ किया जाए. संतोषी ने बताया कि उसे ई-रिक्शा चलाने का आईडिया बड़े शहरों में महिलाओं को मोटरगाड़ियां चलाते देख कर आया.

हालांकि पहले उसे काफी डर लगा. छोटे शहरों में सड़क पर रिक्शा चलाना जहां पुरूषों के बीच उसे खड़े रहना पड़ता था और कमेंट भी सुनने पड़ते थे. वहीं, यात्री भी महिला को देखकर उसके रिक्शे पर डर से नहीं बैठते थे. लेकिन अब न संतोषी को डर लगता है और न ही यात्रियों को ही उसके रिक्शे पर बैठने से डर लगता है. अब यात्री भी उसे बढ़ावा देते हैं कि महिला होकर उसने ऐसा काम चुना.

संतोषी एक सिलाई सेंटर खोलना चाहती है. जिससे की वह आमदनी भी बढ़ा सके और इससे जुड़कर अन्य महिलाएं भी अपने आप को सशक्त बनाने में कामयाब हो सके.