जब 'बिरसा मुंडा की जय' के नारों से दहला पाकिस्तान! जानिए क्या है सेकंड बिहार रेजिमेंट का सबसे बड़ा बलिदान

MEO लाहौर के कर्नल आपजी रणधीर सिंह ने लिखा है, 'कल, मैंने अपना अधिकांश समय 11 जनवरी 1948 की रात को पाकिस्तान के गुजरात में शरणार्थी ट्रेन के बचे हुए लोगों के साथ बिताया. करीब 2 हजार पाकिस्तानी पठानों की भीड़ ने ट्रेन पर हमला किया था.

जब 'बिरसा मुंडा की जय' के नारों से दहला पाकिस्तान! जानिए क्या है सेकंड बिहार रेजिमेंट का सबसे बड़ा बलिदान
जानिए क्या है सेकंड बिहार रेजिमेंट का सबसे बड़ा बलिदान. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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राजेश कुमार/पटना: MEO लाहौर के कर्नल आपजी रणधीर सिंह ने लिखा है, 'कल, मैंने अपना अधिकांश समय 11 जनवरी 1948 की रात को पाकिस्तान के गुजरात में शरणार्थी ट्रेन के बचे हुए लोगों के साथ बिताया. करीब 2 हजार पाकिस्तानी पठानों की भीड़ ने ट्रेन पर हमला किया था. उन पठानों को लूटपाट, हत्या और आगजनी के लिए उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत के इलाके से पैसे देकर हायर किया गया था, जिसका इस्तेमाल बाद में जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग में भी किया गया.'

'हालांकि, सेकंड बिहार रेजिमेंट (Bihar Regiment) के जवानों की वजह से 6 घंटे से ज्यादा समय तक खूंखार पठान एक भी शरणार्थी को नुकसान नहीं पहुंचा सके लेकिन सुबह 7.30 बजे तक जवानों का गोला बारूद पूरी तरह से खत्म हो गया. बार-बार संपर्क करने के बाद भी पाकिस्तानी सेना से किसी भी तरह की मदद नहीं मिली. जबकि सबको पता था कि पाकिस्तान के गुजरात में पाक आर्मी की दो बटालियन मौजूद है. उन्मादी पठान ट्रेन में लूटपाट मचाते रहे, कत्ले आम करते रहे और कई महिलाओं को उठाकर ले गए.'

दरअसल, ये कहानी नफरत के उस जुनून की है, जिसने सरहद के दोनों तरफ लाखों जिंदगियों को जलाकर खाक कर दिया. आपने अगर अनिल शर्मा की 'गदर एक प्रेम कथा' देखी हो तो आपने मौत के इस तांडव को जरूर देखा होगा. आजाद भारत के नक्शे पर रेडक्लिफ ने एक लकीर खींच दी और इसके साथ ही दो नए मुल्क भारत और पाकिस्तान अस्तित्व में आ गए. इसके साथ ही आस्तित्व में आया नफरती उन्माद और ज्वार जिसने लाखों लोगों की जिंदगी को लील लिया और करोड़ों जिंदगियों पर कभी ना मिटने वाला असर डाला.

ये कहानी है सेकेंड बिहार रेजिमेंट (Second Bihar Regiment) के जवानों को अदम्य शौर्य और साहस की. ये कहानी है सर्वोच्च बलिदान की, जिन्होंने अपने लहू का एक-एक कतरा इस देश पर कुर्बान कर दिया और अपने फर्ज से इंच भर पीछे नहीं हटे. ये कहानी है सेकेंड बिहार रेजिटमेंट के उन 36 जवानों की बहादुरी की जिनकी वीरता इतिहास के पन्नों में खोकर रह गई.

यह कहानी शुरू होती है 11 जनवरी 1948 की आधी रात को... करीब 24 सौ शरणार्थियों से भरी एक ट्रेन रात के सन्नाटे को चीरती हुई बेधड़क दौड़ रही थी. ट्रेन में ज्यादातर हिन्दू और सिख शरणार्थी थे जो पाकिस्तान के मारी इंडस से भारत के अमृतसर आ रहे थे. तभी ट्रेन पाकिस्तान के गुजरात स्टेशन पर खड़ी हुई, यहां ट्रेन को ट्रैक चेंज करना था और स्टेशन मास्टर की तरफ से सिग्नल नहीं दिया जा रहा था. इसी वक्त करीब 2000 उन्मादी पठानों की भीड़ ने ट्रेन पर हमला बोल दिया.

ट्रेन के मुसाफिरों की सुरक्षा का जिम्मा था सेकेंड बिहार रेजिमेंट के चार्ली कंपनी के जवानों का. उन जवानों ने मोर्चा संभाल लिया. कबिलाई पठानों के हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया गया. एक तरफ घातक हथियारों से लैस 2 हजार पठानों की भीड़ तो दूसरी तरफ 3 दर्जन से कुछ ज्यादा सेकेंड बिहार रेजिमेंट के लड़ाकू जवान. इस घटना को इतिहास में सारागड़ी की तरह याद करना था. लेकिन अफसोस शौर्य की इस गौरवशाली दास्तान को इतिहास की किताब में हाशिये पर भी जगह नहीं मिली.

गुरू गोविंद सिंह ने कहा था कि 'सवा लाख से एक लड़ावां, तां गोविंद सिंह नाम धरावां'...दुनिया भर में इस नारे को बलिदान का प्रतीक माना जाता है. संयोग देखिए कि बिहार रेजिमेंट ने गुरू गोविंद सिंह के इस कथन को सही साबित किया और गुरू गोविंद सिंह का जन्म भी बिहार की धरती पर ही हुआ था.

सेकेंड बिहार रेजिमेंट मिलिट्री इवैक्यूएशन ऑर्गेनाइजेशन(MEO) के एक अहम हिस्से के तौर पर काम कर रही थी, जिसका काम पाकिस्तान से लोगों को सुरक्षित भारत लाना था. दरअसल, MEO के गठन का मकसद दोनों मुल्कों से शरणार्थियों को सुरक्षित पहुंचाना ही था. इसका मुख्यालय दिल्ली और लाहौर में था. 11-12 जनवरी 1948 की रात सेकेंड बिहार रेजिमेंट की चार्ली कंपनी को पाकिस्तान के मारी इंडस से भारत के अमृतसर तक ट्रेन को इस्कॉट करने की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

ट्रेन पर जब हमला हुआ तो सेकेंड बिहार रेजिमेंट के जवानों ने 'जय बजरंगबली' और 'बिरसा मुंडा की जय' के नारों के साथ ट्रेन पर सवार मुसाफिरों की सुरक्षा के लिए जान की बाजी लगा दी. ट्रेन में सेकेंड बिहार रेजिमेंट की कंपनी को लीड कर रहे थे कैप्टन गुरबचन सिंह ग्रेवाल. 50 से भी कम जवानों ने 2 हजार बर्बर आक्रमणकारियों को 6 घंटें से ज्यादा समय तक रोके रखा, जब तक ट्रेन में सवार सेकेंड बिहार रेजिमेंट के एक भी जवान के शरीर में हरकत बाकी थी, उन्मादी पठान एक भी मुसाफिर को छू भी नहीं सके. लेकिन सुबह साढ़े 7 बजे तक जवानों का गोला बारूद पूरी तरीके से खत्म हो गया. सेकेंड बिहार रेजिमेंट के जो जवान ट्रेन पर मौजूद थे उन्होंने पाकिस्तानी आर्मी (Pakistani Army) से भी संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन किसी तरह की सहायता नहीं मिली. विभाजन हुए अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता था और दोनों तरफ के आर्मी अधिकारी एक दूसरे को जानते थे। भारतीय जवानों को ये भी मालूम था कि जिस जगह वे उन्मादी पठानों का सामना कर रहे हैं वहां से बस थोड़ी दूरी पर ही पाकिस्तान आर्मी का कैंप है और गुजरात में ही पाक आर्मी की दो बटालियन थी. ट्रेन में ज्यादातर वैसे रिफ्यूजी सवार थे जिनका दंगों में भारी नुकसान हुआ था, उनकी संपत्ति लूटी जा चुकी थी और उनके अपने मारे गए थे. ये भी कहा जाता है कि पाकिस्तान की सरकार ने कबिलाई पठानों को खुली छूट दे दी थी कि वो लूट-पाट कर सके.

वहीं, जब बहादुर जवानों की गोलियां खत्म हो गई, तो बर्बर हमलावर ट्रेन के बेकसूर मुसाफिरों पर टूट पड़े. एक-एक कर सेकेंड बिहार रेजिमेंट के 36 बहादुर सैनिक बेरहमी से मौत के घाट उतार दिए गए. उन्हें क्रूरता पूर्वक मारा गया, लेकिन सेकेंड बहादुर रेजिमेंट के इन जवानों की जब तक सांसें चलती रहीं ट्रेन के मुसाफिरों को हमलावर छू तक नहीं पाए. इसके बाद पठानों ने ट्रेन में जमकर लूट मचाई. कहा जाता है कि ट्रेन में 2400 शरणार्थी सवार थे लेकिन ट्रेन जब भारत पहुंची तो उसमें केवल 7 सौ लोग सवार थे. करीब 13 सौ लोग मार दिए गए और बाकी लापाता बताए गए.

मरने वालों में सेकेंड बिहार रेजिमेंट के 36 बहादुर सैनिक भी थे, जिन्हें बेरहमी से मारा गया था. ज्यादातर जवान अविभाजित बिहार और इस वक्त के झारखंड के रहने वाले थे. उन्हें मालूम था कि मौत मुहाने खड़ी है, लेकिन अपने फर्ज से उन्हें रत्ती भर भी मुंह मोड़ना मंजूर नहीं था. कुछ जवानों को मरणोपरांत सम्मानित जरूर किया गया. लेकिन उनके शौर्य की चर्चा नहीं की गई, जिस सम्मान के वे हकदार थे उन्हें नहीं मिल पाया.

जमादार श्याम बहादुर सिंह को मरणोपरांत कीर्ति चक्र
कैप्टन गुरबचन सिंह ग्रेवाल को मरणोपरांत शौर्य चक्र
सिपाही शंकर हेम्ब्रम को मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया. इनके अलावा बलिदान की इस कहानी में सेकेंड बिहार रेजिमेंट के जिन बहादुरों ने अपनी जान गंवाई ...उनमें

  • नायक रमा पति सिंह
  • सीता राम
  • सिपाही हरि चरण
  • धर्म नाथ सिंह
  • माणकी जरिका
  • बारनबास साय
  • पोथलु सिंह
  • जुनास डंगवार
  • राम अवतार
  • सेना भद्रु सिंह
  • हरनंद सिंह
  • बाला दीन
  • रोएन सुरीन
  • राम राज सिंह
  • शिव चरण बिरजुआ
  • इश्वर दत्त टोप्पे
  • जोशेफ तूड़ी
  • शनि चरण करवा
  • जमुना सिंह
  • बुढ़वा मुंडा
  • शिव कुमार
  • पीरथी सिंह
  • गोपी नाथ सिंह
  • शिव नंदन राय
  • द्वारका सिंह
  • बबुनी
  • लाल धारी सिंह
  • शिव प्रसाद सिंह
  • राम प्रसाद
  • सुदर्शन सिंह
  • मुन्नी लाल
  • और
  • सिपाही
  • पैका धान का नाम शामिल है.

दरअसल, ऐसी कहानियां सेकेंड बिहार रेजिमेंट और भारतीय सेना (Indian Army) के अदम्य साहस की गवाही देती हैं. ये बताती हैं कि भारतीय सेना का गौरवशाली इतिहास बहादुर जवानों को लहू से सींचा गया है और जब भी जरूरत पड़ी है बिहार और झारखंड के बहादुर बेटे अपनी जान की कुर्बानी देने से पीछे नहीं हटे हैं.