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क्या रहा है चारधाम यात्रा का इतिहास, जानें हर एक धाम से जुड़ी पौराणिक कथा

Uttarakhand Char Dham: छोटा चार धाम या चार धाम उत्तराखंड में स्थित चार तीर्थों की एक यात्रा है. इसमें गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ आते हैं. हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु तीर्थयात्रा के लिए यहां पहुंचते हैं.

char dham
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Char Dham Yatra: दुनिया के हर धर्म और मजहब में धार्मिक यात्राओं का उल्लेख मिलता है. कहीं इसे धर्म के अनिवार्य अंग के रूप में बताया जाता है तो कहीं इसे मोक्ष या शांति से जोड़ा जाता है. ऐसे ही सनातन धर्म में जब भी धार्मिक यात्रा का उल्लेख होता है तो सबसे पहले विचार चार धाम का आता है. देश और दुनियाभर से सनातनी हिंदू अपनी मान्यताओं के तहत इस यात्रा पर आते हैं. सनातन धर्म में मान्यता है कि चार धाम की यात्रा से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

क्या रहा है इतिहास: उत्तराखंड के चार धामों की स्थापना जगतगुरु शंकराचार्य जी द्वारा की गई थी. इन चार धामों में बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री औ यमनोत्री आते हैं. चार धाम की स्थापना के पीछे शंकराचार्य का उद्देश्य सनातन धर्म को संगठित और व्यवस्थित रूप देना था. दरअसल उस समय कोई एक केंद्र सरकार नहीं थी. अलग-अलग राजाओं के राज्य में धर्म और संस्कृति के संगठन के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी. इसलिए उन्होंने सोचा कि चार धाम और उनकी यात्रा के जरिए हिंदुओं को संगठित किया जा सकता है. चार धाम की यात्रा का अर्थ हिंदुओं को एकजुट करना था.

इसलिए शंकारचार्य जी ने मंदाकिनी नदी के किनारे केदरानाथ, अलकनंदा के किनारे बद्रीनाथ, भागीरथी के किनारे गंगोत्री और यमुना के किनारे यमुनोत्री धाम की स्थापना की. सनातन धर्म में मान्यता है कि इन चार धामों की यात्रा के जरिए व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है. आपको बता दें कि न सिर्फ भारत में बल्कि देश के बाहर रहने वाले हिंदू भी चार धाम की यात्रा के लिए आते हैं. आधुनिक समय में सरकारों के प्रयास से चार धाम यात्रा के लिए सुविधाओं का विकास हुआ है चाहे लोगों के रहने की व्यवस्था हो या मंदिर तक पहुंचने की व्यवस्था और अन्य तरह की व्यवस्था.

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शास्त्र या पुराण क्या कहते हैं 

केदारनाथ-  केदारनाथ की बात होती है तो सबसे पहले उल्लेख पांडवों का होता है. कहते हैं कि महाभारत का युद्ध जीतने के बाद पांडवों को ग्लानि हुई की उन्होंने अपने भाइयों को मारा है. इसलिए वे प्रायश्चित करने के लिए यहां आए. यहां उन्होंने भगवान शिव की पूजा की और अपने पापों से मुक्ति पाई.

बद्रीनाथ- बद्रीनाथ की कहानी नर और नारायण से जुड़ी है. बद्रीनाथ के पास के पहाड़ों को भी इसी नाम से जाना जाता है. नर और नारायण भगवान विष्णु की तपस्या करने के लिए यहां पहुंचे थे. उनकी तपस्या से प्रसन्न हो भगवान ने उनको दर्शन दिए थे.

गंगोत्री- गंगोत्री की कहानी तो गंगा जी के धरती पर अवतरण की कहानी है. राजा भगीरथ ने गंगा जी को धरती पर लाने के लिए तपस्या की थी. वे अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए गंगा जी को धरती पर लाना चाहते थे. भगीरथ की तपस्या रंग लाई थी और गंगा जी का धरती पर आना हुआ. पहले वह शिव की जटाओं में आईं और फिर धरती पर पहुंची.

यमुनोत्री- यमुनोत्री धाम बंदरपूंछ पर्वत के पास है. प्राचीन कथा बताती है कि ऋषि असित मुनि यमुना और गंगा दोनों पवित्र नदियों में प्रतिदिन स्नान करते थे. लेकिन जैसे-जैसे वह बूढ़े हुए वह हर दिन दोनों नदियों में जाकर स्नान करने में असमर्थ हो गए. उनकी भक्ति देख कालिंदी पर्वत के पास, पहले से मौजूद गंगा नदी के बगल में यमुना नदी की एक छोटी सी धारा प्रकट हुई. ऐसा माना जाता है कि जो कोई भी यमुना नदी में पवित्र स्नान करता है उसे यम लोक नहीं ले जाया जाता है.

आदि शंकराचार्य कौन थे-  आदि शंकराचार्य 8वीं शताब्दी में हुए थे. उन्हें प्रथम शंकराचार्य के रूप में भी जाना जाता है. उन्होंने विश्व को अद्वैत मत से परिचय कराया था. उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया. आदि शंकराचार्य का जन्म केरल में हुआ था.

कुछ अज्ञात तथ्य:

- आपको बता दें कि मूल बद्रीनाथ धाम मंदिर वह स्थान नहीं है जहां आज का मंदिर है, वास्तव में यह गरुड़ गुफाओं के अंदर बद्रीनाथ शहर के पास स्थित है.

- गंगोत्री धाम के पास बहुत ही अनोखा जलमग्न शिवलिंग पानी के अंदर स्थित है और यह केवल सर्दियों के महीनों के दौरान दिखाई देता है जब पानी का स्तर एक निश्चित बिंदु से नीचे चला जाता है और पानी के नीचे का शिवलिंग प्रकट हो जाता है.

- चार धाम मंदिर के संस्थापक आदि शंकराचार्य ने केदारनाथ मंदिर में महासमाधि प्राप्त की थी.

- शंख भगवान विष्णु को प्रिय है, लेकिन इसे बद्रीनाथ में बजाने की अनुमति नहीं है. ऐसा माना जाता है कि शंख बजने से राक्षस वातापी बाहर आ जाएगा.

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