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उत्तरकाशी में टीचर के ट्रांसफर पर गांववाले हुए भावुक, रो पड़े बच्‍चे और अभिभावक

आशीष डंगवाल का जब ट्रांसफर हुआ तो पूरा गांव उनकी विदाई में रो पड़ा. आशीष को गांव वालों ने भवुक होकर पूरे ढोल दमाऊं, नाच गाने और गाजे बाजे के साथ विदा किया. खुद आशीष भी जब गांव छोड़कर जा रहे थे तो भावुक हो गए. 

उत्तरकाशी में टीचर के ट्रांसफर पर गांववाले हुए भावुक, रो पड़े बच्‍चे और अभिभावक
शिक्षक आशीष का ट्रांसफर होने के बाद रो पड़े सभी गांववाले.

उत्‍तरकाशी : उत्तराखंड में जहां एक ओर शिक्षक पहाड़ पर चढ़ने से कतराते हैं तो दूसरी ओर आज भी ऐसे शिक्षक हैं जो जी जान लगाकर बच्चों को पढ़ाते हैं. ऐसे शिक्षकों का जब ट्रांसफर होता है तो गांववाले भावुक हो जाते हैं. ऐसे ही एक शिक्षक आशीष डंगवाल हैं. आशीष डंगवाल का जब ट्रांसफर हुआ तो पूरा गांव उनकी विदाई में रो पड़ा. आशीष को गांव वालों ने भवुक होकर पूरे ढोल दमाऊं, नाच गाने और गाजे बाजे के साथ विदा किया. खुद आशीष भी जब गांव छोड़कर जा रहे थे तो भावुक हो गए. 

आशीष उत्तरकाशी के भटवाड़ी ब्लॉक के केल्सी घाटी के भकोली गांव में 3 साल तक तैनात रहे. आशीष की 2016 में पहली पोस्टिंग भकोली गांव में हुई जंहा इन्होनें 3 साल तक बच्चों को सामाजिक विज्ञान और राजनीति विज्ञान पढ़ाया. आशीष की खासियत ये रही कि वो इस घाटी के लोगों के साथ पूरी तरह घुल मिल गए. आशीष डांगवाल का मात्र 23-24 साल की उम्र उत्तराखंड लोक सेवा के जरिए चयन हुआ.

आशीष की खासियत ये रही कि उन्‍होंने न सिर्फ बच्चों को पढ़ाया बल्कि उनके साथ भावनात्मक रूप से भी जुड़ गए. यही कारण रहा कि स्कूल के बाद भी बच्चे आशीष के पास आने जाने लगे. इससे बच्चों के माता पिता से भी आशीष का सम्पर्क बढ़ गया. बढ़े बुजुर्ग आशीष को प्यार दुलार करने लगे.

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आशीष डंगवाल का कहना है कि 3 साल में उन्‍होंने इस घाटी के रहन सहन, बोली भाषा और संस्कृति को अपना लिया. यहां का पारंपरिक नृत्य भी सीख लिया. इससे यंहा के लोगों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ गए. आशीष आगे कहते हैं कि जब वो बच्चों को पढ़ाते थे तो उन्होंने एसी तकनीक का इस्तेमाल किया जिससे वो बच्चों के साथ बेहतर सम्पर्क और तालमेल कर सकें.

आशीष बताते हैं कि उत्तराखंड में किसी भी शिक्षक को गांव में गुरु जी बोलने की परम्परा है. बड़े बुजुर्ग भी उम्र में छोटे से छोटे शिक्षक को गुरु जी कहते हैं. लेकिन जब उन्हें गुरु जी सम्बोधित किया जाने लगा तो उन्होंने इसे मना कर सीधा नाम से पुकारे जाने की विनती की. इसे गांव के बुजुर्गों से मान लिया. इससे भी गांव के लोगों से लगाव बढ़ता चला गया.

भकोली गांव की निवासी ममता रावत का कहना है कि जो भी अच्छे टीचर आते हैं वो जल्दी ही चले जाते हैं. लेकिन आशीष डंगवाल का प्रोमोशन हुआ ये अच्छी बात भी है. डंगवाल जी से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला है. आशीष डंगवाल ने सभी शिक्षकों के लिए एक उदाहरण पेश किया है. आशीष अब टिहरी के जौनपुर क्षेत्र में अपनी सेवायें देने के लिए तैयार हैं. उम्मीद है कि आशीष इस क्षेत्र के लोगों का दिल भी जल्दी जीत लेंगे.