नई दिल्ली: क्या आपको लगता है कि काम के तनाव से केवल आपके Employee ही परेशान हैं- तो आज आपको काम के तनाव के गणित को समझना बेहद जरूरी है. वर्कप्लेस से मिले स्ट्रेस यानी काम के तनाव का नतीजा ये है कि दुनिया को हर साल 1 लाख करोड़ का नुकसान हो रहा है. WHO ने हाल ही में ये डाटा इकट्ठा करके चेतावनी दी है कि अगर कॉरपोरेट जगत में कर्मचारियों के लिए अनुकूल माहौल नहीं तैयार किया गया तो कंपनियों की बैलेंस शीट और साख दोनों का गिरना तय है.


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वर्क प्लेस स्ट्रेस से जूझ रहे हैं आप?
'सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है - इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों हैं'- अगर हम ऑफिस को एक शहर मान लें तो उस शहर में रहने वाले कई चेहरों पर आपको यही भाव चिपका हुआ दिखाई दे जाएगा कि यहां हर शख्स परेशान सा क्यों हैं- जाहिर है कि पैसा जीने के लिए.... और काम हमें व्यस्त रखने के लिए बेहद जरूरी हैं लेकिन कामकाजी जीवन और निजी जीवन के बीच जब संतुलन ना बन पा रहा हो और काम का प्रेशर आपके साथ घर तक पहुंचने लगे तो समझ जाइए कि आप काम के तनाव यानी वर्क प्लेस स्ट्रेस से जूझ रहे हैं.


किसी को रोज नौकरी छोड़ने का मन करता है- किसी को अपनी सीट बदल लेने का तो किसी को बॉस की शक्ल देखते ही पसीने आने लगते हैं. नतीजा ये है कि कर्मचारी काम से नहीं काम के तनाव से निपटने में ही लगे हैं और बदले में कंपनियां काम का नुकसान झेल रही हैं, क्योंकि अगर आपका Employee काम के वक्त खुश ही नहीं है तो वो बेमन से काम करेगा.


काम से तनाव से हो रहा अरबों का नुकसान
इसी का हिसाब लगाकर WHO ने बताया है कि दुनिया भर को काम के तनाव की वजह से हर वर्ष 1 लाख करोड़ का नुकसान झेलना पड़ रहा है. और 2030 तक हालात ऐसे ही रहने वाले हैं.


विश्व स्वास्थ्य संगठन ने काम के तनाव से होने वाले नुकसान का एक आंकलन किया है जिसके हिसाब से डिप्रेशन और तनाव के शिकार कर्मचारियों की वजह से दुनिया को हर वर्ष 1 लाख करोड़ का नुकसान हो रहा है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकलन के मुताबिक अगर काम से जुड़े तनाव को कम किया जा सके तो हर साल लोग अभी जितना काम  कर रहे हैं. उसमें 12 बिलियन कामकाजी दिन और जोड़े जा सकते हैं- यानी 365 दिनों में जो काम अभी हो रहा है- उसमें 12 करोड़ दिनों में होने जितना काम और बढ़ जाएगा.


कुल आबादी के 60% लोग हैं कामकाजी
WHO के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया की कुल आबादी के 60% लोग कामकाजी हैं. दुनिया भर में कुल 100 करोड़ लोग मानसिक परेशानियों के शिकार हैं और इनमें से 15% कामकाजी युवा तनाव के शिकार हैं.


WHO के मुताबिक काम के दबाव और काम के तनाव के बीच फर्क होता है- काम का दबाव काम का जरूरी हिस्सा होता है. जिससे कर्मचारी अलर्ट और मोटिवेटिड रहते हैं, लेकिन अगर काम का बंटवारा सही नहीं है, कंपनी की पॉलिसी कर्मचारियों के हिसाब से नहीं है या बॉस और सहकर्मियों से कोई मदद ना मिल रही हो तो दबाव को तनाव में बदलते देर नहीं लगती है.


तनाव के लक्षण
काम पर बॉस से सामना होने से बचना, काम से लौटकर भी चिड़चिड़ा रहना, घरवालों पर बिना वजह गुस्सा निकालना या फिर छुट्टी लेने से डरना- ये कुछ लक्षण हैं जो बताते हैं कि आप काम के दबाव में नहीं हैं बल्कि काम के तनाव की चपेट में हैं.


ITC की कंपनी Fiama ने Nilsen के साथ मिलकर एक सर्वे किया जिसमें कई चौंकाने वाली बाते सामने आई हैं. युवाओं को तनाव को झेलने का स्तर वयस्कों के मुकाबले काफी कम पाया गया है. आईटीसी के डिवीजनल सीईओ समीर सत्पति के मुताबिक महिलाओं वर्क लाइफ बैलेंस से ज्यादा परेशान हैं.


81%  युवा मानते हैं कि उनके जीवन में तनाव की सबसे बड़ी वजह उनकी नौकरी है. इस तनाव के तीन बड़े कारण सामने आए हैं- काम का प्रेशर , वर्कप्लेस का माहौल और तीसरा - खराब बॉस


67% युवा मानते हैं कि काम के तनाव की वजह से उन्हें नींद आनी काफी कम हो गई है.


महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले ज्यादा तनाव होता है. 72% महिलाओं को सोमवार को ऑफिस जाने से पहले तनाव होने लगता है  - इसे Monday blues भी कहते हैं. 


10 में से 9 महिलाएं मानती हैं कि कंपनियों को Work life balance पॉलिसी पर काम करना चाहिए. यानी जिससे काम और घर के बीच संतुलन बनाया जा सके.


71%  यानी तीन चौथाई महिलाओं बर्नआउट की शिकार हैं.


तनाव की दूसरी बड़ी वजह रिश्तों के टूटने का डर देखी गई.


87% युवाओं को लगता है कि अगर उनका रिश्ता उनके पार्टनर से टूट जाता है तो वो तनाव में आ जाते हैं.


86% महिलाएं भी मानती हैं कि रिश्तों के टूटने के डर से वो तनाव में रहती हैं.


तीसरी वजह को जानकर आप हैरान हो सकते हैं- तनाव की तीसरी बड़ी वजह बन रहा है सोशल मीडिया


सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किसी को कैसा रेस्पॉंस मिल रहा - यानी कमेंट और लाइक्स की संख्या कितनी है या उन्हें लेकर क्या कमेंट किए जा रहे हैं.  ये भी तनाव देते हैं.


भारत में 66% युवाओं ने इस तनाव से छुटकारा पाने के लिए कुछ वक्त के लिए सोशल मीडिया ब्रेक लिया - हालांकि वो ऐसा ज्यादा वक्त के लिए नहीं कर पाए। केवल 33% युवाओं ने किसी मनोचिकित्सक तक जाने का फैसला किया. ऐसे में करना क्या चाहिए.


कंपनियों को समय समय पर अपने कर्मचारियों से बात करनी चाहिए - संवाद से समस्याएं हल हो सकती हैं. कर्मचारी पॉ़जिटिव सोच के साथ दिन शुरू करें. छोटे-छोटे टारगेट्स सेट करें और उन्हें पूरा करें, खुद को व्यवस्थित करें, वाद विवाद में ना उलझें, अपनी सामर्थ्य पहचानें और वैसे ही काम करें, मल्टी टास्किंग से बचें, लंच के बाद एक छोटा ब्रेक ले सकते हैं, म्यूजिक सुनें, स्ट्रेचिंग करें और ना कहना सीखें - अगर काम सच में जरूरत से ज्यादा है तो विनम्रता से इस मुश्किल को अपने बॉस से शेयर करें.


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