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CAA News: शाहीन बाग खामोश, भाजपा शासित असम में शुरू हुआ विरोध-प्रर्दशन

CAA News: केंद्र सरकार ने विवादित नागरिकता संशोधन कानून-2019 को सोमवार को देशभर में लागू कर दिया है. इस कानून के लागू होने के बाद मुस्लिम समुदाय के उलेमा ने लोगों से शांति बनाए रखने और कानून का सम्मान करने की अपील की है, लेकिन असम में इसके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. आईये जानते हैं, इस कानून के बनने के बाद कब क्या हुआ?   

CAA लागू करने के बाद असम में विरोध करते हुए ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के सदस्य
CAA लागू करने के बाद असम में विरोध करते हुए ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के सदस्य

नई दिल्लीः केंद्र सरकार के विवादित कानून नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, को भारी विरोध के बावजूद चार साल बाद देशभर में लागू कर दिया गया है.  इस कानून को 2019 में संसद में पास किया गया था. इसका मकसद पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई समुदाय को भारत में नागरिकता प्रदान करना है. संसद में इस कानून के पास होने के बाद देशभर में मुसलमानों और नार्थ ईस्ट के राज्यों के निवासियों ने इसका भारी विरोध किया था. इसके विरोध-प्रदर्शन में सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी और सैंकड़ों लोगों पर सरकार ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल में बंद कर दिया. सीएए कानून के विरोध में जामिया यूनिवर्सिटी और शाहीन बाग के आंदोलन ने देश और दुनियाभर में इस कानून में मौजूद खामियों और भेदभावपूर्ण प्रावधानों को उजागर कर दिया था. सोमवार को इस कानून के लागू होने के बाद देशभर के उलेमा और मुस्लिम नेताओं ने मुसलमानों से शांति की अपील की है. वहीं, इस कानून के लागू होते ही असम में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. 
ऑल असम स्टूडेंट यूनियन और असम युवा छात्र परिषद ने बक्सा जिले के तामूलपुर के गांधी बारी में जोरदार प्रदर्शन शुरू कर दिया है. संगठनों ने दावा किया है कि अगर सरकार इस कानून को वापस नहीं लेगा तो हम आंदोलन करेंगे. 

 कानून के संसद में पास होने के बाद कब क्या हुआ ? 
संसद में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम को 11 दिसंबर 2019 को पास किया गया था. इसके बाद इस विधेयक को राष्ट्रपति ने 12 दिसंबर को मंजूरी दी थी. इस कानून के लागू होने के बाद नागरिकता देने का अधिकार पूरी तरीके से केंद्र सरकार के पास होगा. 11 मार्च को केंद्र सरकार ने इस कानून को पूरे देश में लागू कर दिया है.

 कानून का क्या है मकसद ? 
नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019 का मकसद पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई समुदाय से संबंधित प्रवासियों को भारत में नागरिकता देना है. इस कानून से उन तीन पड़ोसी देशों अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने का रास्ता साफ हो जाएगा, जो लंबे अरसे से भारत में शरण लिए हुए हैं. जो लोग 31 दिसंबर 2014 तक भारत में आकर बस गए थे, उन्हें ही नागरिकता मिलेगी. हालांकि, इस कानून के तहत उन लोगों को अवैध प्रवासी माना जाएगा, जो भारत में बिना पासपोर्ट और वीजा के घुस आए हैं.

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क्यों हुआ था विरोध ? 
संसद में इस विधेयक को पेश किए जाने के बाद 4 दिसंबर 2019 को असम में भारी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था. उन्हें डर था कि इससे उनके ’राजनीतिक, सांस्कृतिक और भूमि अधिकारों’ को नुकसान होगा. 15 दिसंबर 2019 को नई दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया के पास शाहीनबाग में भी धरना-प्रदर्शन हुआ. दिल्ली पुलिस ने 16 दिसंबर को आसिफ इकबाल तन्हा और शरजील इमाम सहित कई छात्रों को दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया, जो आज भी जेल में बंद है. मुसलमान और देश का विपक्ष मानता है कि ये कानून धार्मिक आधार पर बनाया गया है, जो देश के संविधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है. इससे देश के मुसलमानों को लक्षित किया जा सकता है.  हालांकि, सरकार ने कोविड-19 महामारी और उसके बाद देशभर में लागू लॉकडाउन की आड़ में सीएए के विरोध-प्रदर्शनों और चर्चाओं को दबा दिया.

पिछले दो सालों में 1,414 विदेशी हिंदुओं को मिली नागरिकता 
सीएए कानून बनने के बाद पिछले दो सालों में नौ राज्यों के 30 से ज्यादा जिला अधिकारियों और गृह सचिवों को नागरिकता कानून-1955 के तहत अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को भारतीय नागरिकता देने का अधिकार दिया गया है. गृह मंत्रालय की 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, एक अप्रैल 2021 से 31 दिसंबर 2021 तक इन तीन देशों के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदायों के कुल 1,414 विदेशियों को भारतीय नागरिकता दी गई है. वे नौ राज्य जहां पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता कानून, 1955 के तहत भारतीय नागरिकता दी जाती है, उनमें गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और महाराष्ट्र शामिल हैं.

नागरिकता कानून से भाजपा शासित असम और पूर्वोत्तर राज्यों को है दिक्कत  
सीएए कानून असम और पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रूप से बहुत संवेदनशील है. सरकार ने इन दोनों राज्यों में से किसी भी जिले के अधिकारियों को अब तक नागरिकता प्रदान करने का अधिकार नहीं दिया है. असम में विपक्षी दलों ने सीएए को लागू करने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की है. ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने कहा कि वह केंद्र के इस कदम के खिलाफ कानूनी रूप से लड़ाई लड़ेगा. आसू ने 1979 में अवैध प्रवासियों की पहचान और निर्वासन की मांग को लेकर छह वर्षों तक आंदोलन किया था. रायजोर दल के अध्यक्ष और विधायक अखिल गोगोई ने कहा, ’’असम में अवैध रूप से रह रहे 15 से 20 लाख बांग्लादेशी हिंदुओं को वैध बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. सड़क पर आकर इस असंवैधानिक कृत्य के खिलाफ विरोध करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा.’’ आसू और नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन के मुख्य सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य ने कहा, "'आसू\' सीएए को स्वीकार नहीं करेगा और इसके खिलाफ अपना विरोध जारी रखेगा.’’

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