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सांसद बनने को छोड़ी IPS की नौकरी; खुद को बताया संघी, फिर भी नहीं मिला टिकट!

Ex IPS Anand Mishra: बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय, के बाद असम कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी आनन्द मिश्रा का सांसद बनने का सपना टूट गया है, क्योंकि बक्सर लोकसभा सीट से भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया है. 

पूर्व आईपीएस आनन्द मिश्रा
पूर्व आईपीएस आनन्द मिश्रा

नई दिल्लीः नेतागिरी के चक्कर में नौकरी छोड़कर 'न घर के न घाट के' रहने वाले देश के आईएएस और आईपीएस अफसरों की एक लंबी फहरिश्त है, जिन्हें राजनीतिक दलों ने नौकरी छोड़ने के बाद ठेंगा दिखा दिया है. नेताओं के इस झांसे का शिकार एक और आईपीएस बन गया है, जिसने लोकसभा के टिकट की लालच में नौकरी छोड़ दी, लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया, जबकि वह सार्वजनिक तौर पर कह रहा है कि मैं आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित हूं.

 हम बात कर रहे हैं, असम कैडर के तेज तर्रार आईपीएस अधिकारी आनन्द मिश्रा की, जिन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने की आस में अपनी नौकरी छोड़ दी. 
कयास लगाए जा रहे थे कि बिहार निवासी असम कैडर के आईपीएस अधिकारी आनन्द मिश्रा को भारतीय जनता पार्टी लोकसभा बक्सर लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाएगी.

बक्सर लोकसभा सीट पर इंडिया और एनडीए गठबन्धन ने अपने -अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है, और आनन्द मिश्रा उम्मीदवारी की राह देखते रह गए. सियासत के मैदान में मिश्रा को राजनेताओं के आगे मुंह की खानी पड़ी. मिश्रा के साथ इस व्यवहार से स्थानीय लोगो में भी काफी नाराजगी है.

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सियासी मैदान में चूकने के बाद आनन्द मिश्रा अपनी इज्जत बचाने के लिए अब सोशल कैम्पेनिग कर खुद को स्थापित करने की कोशिश में लगे हुए है. सांसद बनने का सपना लेकर बक्सर आये आनन्द मिश्रा ने कहा, "हम अपने घर आये हैं, और अब यहां से वापस नही जाने वाला हूँ. ऐसा नहीं है कि प्लेटफॉर्म नहीं मिला तो जीना छोड़ दूंगा. काम करना छोड़ दूंगा. मेरा स्टैंड बिल्कुल साफ है. मैं अपने मिशन पर काम करता रहूंगा. जब आईपीएस की नौकरी छोड़कर आया था, तो कई विजन लेकर आया था.’’

आनंद मिश्रा ने साफ तौर पर कहा कि उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता संघ के साथ है, इसलिए उन्हें भाजपा और संघ की सियासत ही सूट करती है, लेकिन अफसोस है कि इतने समर्पण के बाद भी पार्टी ने उन्हें घास नहीं डाला!  

आनंद मिश्रा के साथ वही हुआ जो , 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले डीजीपी का पद त्यागकर विधायक बनने का सपना लेकर बक्सर पहुँचे गुप्तेश्वर पांडेय के साथ हुआ था. सियासी मैदान में नेताओं ने उन्हें ऐसी पटकनी दी की नेता बनने का ख्वाब हमेशा के लिए त्यागकर वह कथावाचक बन गए. उससे पहले लालू के शासनकाल में बिहार के डीजीपी डीपी ओझा ने भी चुनाव लड़ा था, लेकिन वह अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए थे, और आज वह कहां है किसी को खबर तक नहीं है. 

देश में सिविल सेवकों द्वारा सिविल सेवा को छोड़कर या रिटायरमेंट के बाद सियासत में आने की एक लंबी परंपरा रही है. इसमें छत्तीसगढ़ के साबिक मुख्यमंत्री अजीत जोगी, मणिशंकर अययर, यशवंद सिन्हा, नटवर सिंह, मीरा कुमार, अरविंद केजरीवाल से लेकर वर्तमान विदेश मंत्री एस. जयशंकर तक के नाम शामिल हैं, जो आइएएस या आइएफएस की नौकरी छोड़कर राजनीति में आ गए.  वहीं आईपीएस की नौकरी छोड़ राजनीति में कदम रखने वालों में के. अन्नामलाई, निखिल कुमार, डॉ. एन नटराज, ए.एक्स. अल्कजेंडर और एजी मौर्या जैसे नाम शामिल हैं. ये उन कामयाब लोगों की लिस्ट है, लेकिन इस सियासत के लालच में अपनी नौकरी गंवाने और फिर न घर के न घाट के रहने वाले आईएएस और आईपीएस की फहरिश्त भी काफी लंबी है. इस लिस्ट में फिलहाल पूर्व आईपीएस आनन्द मिश्रा का नाम भी जुड़ गया है. 

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