गुजरात चुनाव 2017: न वादा न झांसा, इन 5 मुद्दों पर बरसेंगे जनता के वोट

 गुजरात विधानसभा चुनाव का बिगुल बजते ही मुख्य पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस पूरी ताकत झोंक चुकी है. हम आपका ध्यान उन पांच मुद्दों पर ले जाना चाहते हैं, जिसके इर्द-गिर्द गुजरात में चुनाव प्रचार चल रहे हैं.

गुजरात चुनाव 2017: न वादा न झांसा, इन 5 मुद्दों पर बरसेंगे जनता के वोट
प्रधानमंत्री नरेंद मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी.

नई दिल्ली: गुजरात विधानसभा चुनाव का बिगुल बजते ही मुख्य पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस पूरी ताकत झोंक चुकी है. कांग्रेस की तरफ से जहां पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी खुद मोर्चा संभाले हुए हैं तो बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के अलावा केंद्रीय मंत्रियों की फौज डेरा जमाए हुए हैं. दोनों दल जातीय समीकरण साधने के साथ लुभावने वादों और धर्म के आधार पर वोटरों को अपने पाले में करने की जुगत में जुटे हैं. ये तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही तय हो पाएगा कि बीजेपी और कांग्रेस में किसने जनता का भरोसा मिलेगा. दिलचस्प बात यह है कि लंबे समय बाद गुजरात के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस आक्रामक रुख अपनाए हुए है. सोशल मीडिया पर कैंपेन से लेकर रैलियों और जातिय समीकरण बिठाने में तत्पर दिख रही है. हालांकि बीजेपी भी अपने काम के दम पर वोटरों का विश्वास एक बार फिर से हासिल करने की पूरी कोशिश कर रही है. ऐसे में हम आपका ध्यान उन पांच मुद्दों पर ले जाना चाहते हैं, जिसके इर्द-गिर्द गुजरात में चुनाव प्रचार चल रहे हैं.

1. पाटीदार आरक्षण: इस बार गुजरात चुनाव में पाटीदार समाज सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है. हार्दिक पटेल समेत पाटीदार समाज के कई नेता बीजेपी को लेकर गुस्सा जाहिर कर चुके हैं. गुजरात में विधानसभा की 182 सीटों में से 60 पर पाटीदार हार-जीत के निर्णय में अहम रोल निभाते हैं. पाटीदार समाज के लोगे ओबीसी कैटेगरी के तहत आरक्षण मांग रहे हैं, जबकि अन्य दूसरी ओबीसी जातियां इसके विरोध में हैं. कांग्रेस ने पाटीदारों को आरक्षण देने की बात तो कही है, लेकिन हार्दिक के अल्टीमेटम के बाद भी स्पष्ट तौर पर कोई रोडमैप नहीं बताया है. कांग्रेस ने ये जाहिर नहीं किया है कि आखिर वे किस कानूनी तरीके से पाटीदारों को आरक्षण देंगे. हालांकि सत्ताधारी बीजेपी ने पाटीदार समाज के वरुण और रेशमा को पार्टी में शामिल कराकर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की है.

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पाटीदार नेता हार्दिक पटेल. तस्वीर साभार : PTI

2. जीएसटी: कारोबारियों का राज्य कहे जाने वाले गुजरात में GST (वस्तु एंव सेवाकर) चुनाव में बड़ा मुद्दा है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी लगातार अपनी रैलियां में जीएसटी के मुद्दे को जोर शोर से उठा रहे हैं. यहां के कपड़ा व्यापारी चाहते हैं कि सरकार टेक्सटाइल उद्योग पर 5 फीसदी GST के फैसले को वापस ले. इस फैसले के विरोध में लाखों कारोबारी प्रदर्शन कर चुके हैं. हालांकि केंद्र सरकार ने आभूषणों की 2 लाख रुपए तक की खरीद पर PAN कार्ड की अनिवार्यता खत्म की है. इसके अलावा ज्वेलरी कारोबार को मनी लांड्रिंग केस से बाहर कर दिया है. इन दोनों फैसलों से गुजरात के सर्राफा कारोबारियों को राहत देने की कोशिश की है, लेकिन टेक्सटाइल उद्योग से जुड़े अब भी नाराज हैं.

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गुजरात चुनाव 2017: रोड शो करते कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी. तस्वीर साभार PTI

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3. बेरोजगारी: भले ही गुजरात की गिनती विकसित राज्यों में होती है. लेकिन यहां के ओबीसी युवाओं के बीच बेरोजगारी बड़े पैमाने पर बढ़ी है. रोजगार के लिए आंदोलन कर रहे ओबीसी समाज के करीब 700 युवाओं को रोकने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को सख्त फैसले लेने पड़े थे. बेरोजगारी के चलते ही ओबीसी समाज ने आंदोलन की राह पकड़ रखी है. कांग्रेस ने बेरोजगारी के मुद्दे को भांपते हुए ही बेरोजगारी भत्ता के अलावा युवाओं को स्मार्टफोन देने का भी प्रलोभन दिया है. 12 वीं कक्षा पास युवाओं को 3000 रुपये, स्नातकों को 3500 रुपये और पीजी कर चुके युवाओं को 4000 रुपये मासिक भत्ता के तौर पर दिए जाएंगे.

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4. संविदा कर्मचारी: हमारे देश में आज भी सरकारी नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है. लोग संविदा पर भी सरकारी नौकरी करने को तैयार हो जाते हैं. ऐसे सोच रखने वाले लोगों में ज्यादातर ग्रामीण और मध्यम आय वाले परिवार हैं. गुजरात में मौजूदा और पिछली सरकारों ने कम खर्च में काम चलाने के लिए बड़े पैमाने पर शिक्षक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और कर्मचारियों की भर्ती की थी. इन्हें निश्चित वेतन का भुगतान होता है. अब यही लोग मौजूदा सरकार के लिए गले का फांस बन गए हैं. वे समान काम और समान वेतन की डिमांड कर रहे हैं. पिछले तीन साल में ये छिटपुट तरीक से आंदोलन करते रहे हैं.

5. दलितों पर हमले: गुजरात में पाटीदारों के अलावा दलित बड़ा मुद्दा है. आणंद जिले में एक अक्टूबर को गरबा आयोजन में शामिल होने पर एक समूह ने कथित तौर पर दलित युवक प्रकाश सोलंकी की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी. गांधीनगर के कलोल के लिंबोदरा गांव में कथित तौर पर मूंछ रखने पर 17 और 24 साल के दो युवकों के साथ मारपीट हुई थी. दशहरा पर अहमदाबाद में 300 दलित परिवारों ने बौद्ध धर्म कबूल लिया था. यूं तो गुजरात में दलितों की जनसंख्या 7.1 फीसदी है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस गुजरात चुनाव में इस मुद्दे को जोर शोर से उठा रही है.