Zee जानकारी : लद्दाख में बच्चों के लिए उम्मीद की नई किरण हैं 'सोनम वांगचुक'

DNA में अगले विश्लेषण की शुरुआत करने से पहले मैं आपको, अमेरिका की कल्चरल एंथ्रोपोलाजिस्ट माग्रेट मीड का एक कथन सुनाना चाहता हूं। उनका कहना था, कि आपको कभी भी इस बात पर शक नहीं करना चाहिए, कि विचारों का एक छोटा समूह या लोगों का एक छोटा सा समूह इस दुनिया को बदल सकता है या नहीं? क्योंकि यही एक चीज़ है, जिसकी बदौलत आसानी से बदलाव लाया जा सकता है। आपको इस कथन के बारे में जानकारी देनी इसलिए ज़रूरी थी, क्योंकि हमारा अगला विश्लेषण, सामाजिक बदलाव की दिशा में एक व्यक्ति द्वारा उठाए गए सकारात्मक कदम पर आधारित है।

Zee जानकारी : लद्दाख में बच्चों के लिए उम्मीद की नई किरण हैं 'सोनम वांगचुक'

नई दिल्ली : DNA में अगले विश्लेषण की शुरुआत करने से पहले मैं आपको, अमेरिका की कल्चरल एंथ्रोपोलाजिस्ट माग्रेट मीड का एक कथन सुनाना चाहता हूं। उनका कहना था, कि आपको कभी भी इस बात पर शक नहीं करना चाहिए, कि विचारों का एक छोटा समूह या लोगों का एक छोटा सा समूह इस दुनिया को बदल सकता है या नहीं? क्योंकि यही एक चीज़ है, जिसकी बदौलत आसानी से बदलाव लाया जा सकता है। आपको इस कथन के बारे में जानकारी देनी इसलिए ज़रूरी थी, क्योंकि हमारा अगला विश्लेषण, सामाजिक बदलाव की दिशा में एक व्यक्ति द्वारा उठाए गए सकारात्मक कदम पर आधारित है।

ये ख़बर देश के उस हिस्से से संबंधित है, जहां आज का तापमान माइनस 20 डिग्री सेल्सियस है। मैं लद्दाख की बात कर रहा हूं, जहां भारी बर्फबारी के बीच आम लोगों का जीवन थम सा गया है। हालांकि, हम जिस ख़बर का विश्लेषण करेंगे, वो बर्फबारी से संबंधित नहीं है। बल्कि लद्दाख की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी हुई है। जिसे एक व्यक्ति ने अपनी सोच की बदौलत पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।

अगर मैं आपसे पूछूं कि, क्या आप 'फुंगसुक वांगड़ू' को जानते हैं। तो ये नाम सुनते ही आपको, हिंदी फिल्म थ्री इडिएट्स का क़िरदार याद आ जाएगा। जो लद्दाख में स्कूल चलाता है। लेकिन अगर मैं आपसे पूंछू, कि क्या आप 'सोनम वांगचुक' को जानते हैं, तो आपमें से ज़्यादातर दर्शक सोच में पड़ जाएंगे। आपको ये जानकर काफी खुशी होगी, कि आज की तारीख में 50 साल के 'सोनम वांगचुक' लद्दाख के बच्चों के लिए उम्मीद की नई किरण हैं। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं, इसे समझने के लिए आपको सबसे पहले एक छोटी सी जानकारी देना चाहता हूं।

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की साक्षरता दर 72.98 प्रतिशत है। देश के अलग-अलग राज्यों में साक्षरता की बात करें, तो बिहार में साक्षरता दर करीब 62 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में करीब 68 प्रतिशत, राजस्थान में 66 प्रतिशत, झारखंड में करीब 68 प्रतिशत और मध्यप्रदेश में करीब 69 प्रतिशत है। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि लद्दाख में साक्षरता दर 77.20 प्रतिशत है, एक बार फिर नोट कर लीजिए 77.20 प्रतिशत, जो इन पांचों राज्यों और देश के औसत के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है।

अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा, कि देश का वो हिस्सा, जहां ज़रूरत की चीज़ें भी इतनी मुश्किल से उपलब्ध हो पाती हैं, वहां शिक्षा के क्षेत्र में आई क्रांति की सबसे बड़ी वजह क्या है ? तो मैं आपको बताना चाहूंगा, कि लद्दाख में शिक्षा के स्तर को ज़मीन से आसमान तक पहुंचाने के लिए, 'सोनम वांगचुक' ने बड़ी भूमिका अदा की है। ऐसा क्यों है, इसे गहराई से समझने के लिए आपको, 'सोनम वांगचुक' का बॉयोडाटा पढ़ना चाहिए।

'सोनम वांगचुक' का जन्म 1 सितम्बर 1966 को लद्दाख के, Uley-Tokpo गांव में हुआ था। उस वक्त इस गांव में सिर्फ 5 परिवार रहा करते थे। उन्होंने अपने जीवन के शुरूआती 7 वर्ष अपनी मां के साथ बिताए और उन्हीं से शिक्षा की शुरुआती ABCD सीखी। उनके पिता एक नेता थे, जो बाद में राज्य सरकार में मंत्री भी बने। अगर 'सोनम वांगचुक' चाहते, तो राजनीति का रास्ता चुनकर, सुख और चैन की ज़िन्दगी व्यतीत कर सकते थे। लेकिन उन्होंने समाज की मदद करने की ठानी।

छोटी सी उम्र में ही, 'सोनम वांगचुक' ने ये महसूस कर लिया था, कि स्थानीय भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य है। क्योंकि उनकी स्कूल लाइफ में लद्दाख में इस्तेमाल होने वाली भाषा की पढ़ाई नहीं करवाई जाती थी। 'सोनम वांगचुक' का गणित और विज्ञान की तरफ काफी झुकाव था। हालांकि, इंजीनियरिंग करने के दौरान पिता के साथ उनका विवाद हुआ। वो मेकनिकल इंजीनियरिंग करना चाहते थे, लेकिन उनके पिता चाहते थे कि वो सिविल इंजीनियरिंग करें।

वर्ष 1984 में पिता से हुए झगड़े के बाद उन्होंने घर छोड़ दिया और अपने मन के सब्जेक्ट को चुनकर पढ़ाई पूरी की। बाद में जब उन्होंने, लद्दाख में शिक्षा के क्षेत्र में काम करना शुरू किया, तो उन्हें अहसास हुआ, कि बच्चों को सवालों के जवाब पता तो होते हैं, लेकिन उन्हें सबसे ज़्यादा परेशानी भाषा की वजह से होती है। इसके बाद उन्होंने स्थानीय भाषा में ही बच्चों की शिक्षा के लिए एक मुहिम की शुरुआत की। 

वर्ष 1988 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद, 'सोनम वांगचुक' ने कुछ स्थानीय निवासियों और अपने परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर एक संस्था शुरू की। इस संस्था का नाम स्टूडेंट एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख था, जिसे SECMOL भी कहा जाता है। यानी सर्वशिक्षा अभियान से 12 साल पहले ही 'सोनम वांगचुक' का अभियान शुरू हो चुका था। आपको बता दूं, कि देश में सर्वशिक्षा अभियान की शुरुआत वर्ष 2000 में हुई थी।

SECMOL के गठन के पीछे की सबसे बड़ी वजह थी, लद्दाख में शिक्षा की व्यवस्था में बदलाव लाना। इसके लिए SECMOL ने कई वर्षों तक सरकारी स्कूलों में बदलाव लाने का काम किया। 'सोनम वांगचुक' ने जम्मू-कश्मीर सरकार के साथ मिलकर, लद्दाख के स्कूलों में पाठ्यक्रम को, वहां की स्थानीय भाषा में कन्वर्ट करने का काम किया।

वर्ष 1994 में उन्होंने कुछ स्टूडेंट्स को इकट्ठा करके 1 हज़ार युवाओं का संगठन बनाया। और फिर उनकी मदद से उन्होंने एक ऐसा स्कूल बनाया, जो स्टूडेंट्स द्वारा ही चलाया जाता है और पूरी तरह सौर ऊर्जा से संचालित होता है। किसी ज़माने में लद्दाख में जब 10वीं की परीक्षा के नतीजे आते थे, तो सिर्फ 5 फीसदी बच्चे ही पास हो पाते थे। लेकिन, सरकार, ग्रामीण लोगों और सिविल सोसायटी की मदद से 'सोनम वांगचुक' ने जो मुहिम चलाई थी, उसका असर ये हुआ, कि 10वीं की परीक्षा में पास होने वाले छात्रों की संख्या 5 फीसदी से बढ़कर 75 फीसदी हो गई। यानी अगर समाज में बदलाव लाना है, तो एक छोटी सी कोशिश भी क़ामयाब हो सकती है। आज की तारीख में 'सोनम वांगचुक' को बहुत कम लोग जानते हैं। लेकिन अगर मेरी मानें तो वास्तव में असल ज़िन्दगी के सोनम वांगचुक, फिल्मी पर्दे के 'फुंगसुक वांगड़ू' से बड़े हीरो हैं।

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