बाल दिवस- 7 दानवों की धुंध पर कैसे लगे लगाम

सोशल मीडिया की सीमित दुनिया के परिवारों में कैद बच्चों को वर्जना की बजाए प्रकृति और समाज का विस्तार यदि मिल जाए तो कई बुराइयों से उनकी मुक्ति का मार्ग जल्द खुल सकता है.

विराग गुप्ता | Updated: Nov 14, 2017, 03:59 PM IST
बाल दिवस- 7 दानवों की धुंध पर कैसे लगे लगाम

रानी लक्ष्मीबाई और भगतसिंह तरुणाई में शहीद होकर इतिहास में नाम अमर कर गए और डिजिटल इंडिया के नए दौर के बच्चे अब गेम ऑफ़ थ्रोन्स देखकर ब्लू व्हेल के खूनी खेल का शिकार हो रहे हैं. 7-डी के दानवों से बचाने के लिए वर्जना की बजाए प्रोत्साहन चाहिए-

देश में 84.14 फीसदी स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में हैं जहां के अधिकांश बच्चे कुपोषण और साधनहीनता के शिकार हैं. दूसरी ओर शहरी स्कूलों के नाबालिग बच्चों में ड्रग्स, ड्रिंक्स, डिप्रेशन, डायबिटीज, डेटिंग, डिटेचमेंट और ड्राइविंग के 7 दानव तेजी से अपना विस्तार कर रहे हैं. सोशल मीडिया की सीमित दुनिया के परिवारों में कैद बच्चों को वर्जना की बजाए प्रकृति और समाज का विस्तार यदि मिल जाए तो इन दानवों से मुक्ति का मार्ग जल्द खुल सकता है.

बच्चों की ऊर्जा संचरण के लिए ‘दृष्टि’ और अन्य प्रयोग
चित्रकूट की ‘दृष्टि’ संस्था में 100 से अधिक नेत्रहीन बच्चियां अपने पैरों पर खड़े होकर समाज को नई दिशा दे रही हैं. एक और सामुदायिक प्रयास के तहत दक्षिण मुम्बई की कॉलोनी में बच्चों के सहयोग से सन् 2000 में लगाए गए हमारे पौधे अब फल देकर कंकरीट की महानगरीय कठोरता को चुनौती दे रहे हैं. दक्षिण दिल्ली के मदर्स इंटरनेशनल स्कूल के बच्चों ने राज्य सरकार के विभिन्न विभागों को प्रतिवेदन देकर स्कूल के बोर्ड को सुधरवाने की सार्थक पहल की, जिसका सार्थक परिणाम कल ही सामने आया. इन छोटे प्रयोगों की सफलता से यह जाहिर होता है कि बच्चों पर भरोसा करके यदि उन्हें चुनौतियों का प्लेटफॉर्म दे दिया जाए तो वे बड़ों से बेहतर परिणाम दे सकते हैं.

बच्चों द्वारा योग और कूड़ा-प्रबंधन से हिंसा के मामलों में लगाम
रायन इंटरनेशनल स्कूल में नाबालिग द्वारा छोटे बच्चे की हत्या किए जाने की सीबीआई थ्योरी यदि सच निकली तो अमेरिका की तरह भारतीय स्कूलों में भी हिंसा का खतरा मंडरा रहा है. सिगरेट, शराब और ड्रग्स को स्वीकारने वाले मां-बाप शारीरिक श्रम के लिए बच्चों को छोटा क्यों मानने लगते हैं? बच्चों को योगाभ्यास के साथ यदि हम घर की सफाई और सामुदायिक कूड़ा-प्रबंधन के लिए प्रेरित करें तो ऊर्जा के सार्थक संचरण से हिंसा के मामलों में कमी आ सकती है.

ऑड-ईवन की बजाए बच्चों द्वारा समाधान की बेहतर पहल हो सकती है
दिल्ली में प्रदूषण से निपटने के लिए नवंबर महीने में ऑड-ईवन समेत अनेक शिगूफों की शुरुआत हो जाती है. स्कूल जाने वाले बच्चे अपने दोस्तों के साथ कार-पूल की शुरुआत करें, इसके लिए स्कूल प्रबंधन ठोस पहल क्यों नहीं करते? सरकारी गाड़ी या ड्राइवर वाली गाड़ी की बजाए मेट्रो का इस्तेमाल और एसी से बच्चों की स्वैच्छिक दूरी से महानगरों में प्रदूषण कम करने की सार्थक पहल हो सकती है.

धुंध के लिए स्काउट और एनसीसी की तर्ज पर बने बालसेना
पूरा देश इस समय पर्यावरणीय संकट और धुंध से परेशान है. सीआईआई और नीति आयोग द्वारा किए गए आंकलन के अनुसार हरियाणा और पंजाब में पराली की समस्या से निपटने के लिए 3 हजार करोड़ के सरकारी खर्च की जरूरत है. 5 साल पहले दक्षिण दिल्ली के गुलमोहर इन्क्लेव कॉलोनी में 80 बच्चों ने सामूहिक प्रयास करके सभी पार्कों और सार्वजनिक स्थानों से पूरी गंदगी को साफ करके एक नई मिसाल पेश की. फिर ऐसे प्रयोगों को राष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं अपनाना चाहिए? धुंध के दौरान स्कूलों को बंद करके बच्चों में दहशत पैदा करने का नया रिवाज बन गया है. तकनीक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस बच्चे जमीन से जुड़ने के साथ किसानों की अनेक समस्याओं का खेल-खेल में समाधान कर सकते हैं. देशभर के 23 करोड़ से ज्यादा स्कूली बच्चों को छुट्टी देने की बजाए उन्हें पराली जैसी समस्या के समाधान की राष्ट्रीय पहल का हिस्सा क्यों नहीं बनाया जाता?

इस बाल दिवस पर बच्चों में डर और वर्जना की बजाए मुक्ति के भाव से उल्लासपूर्ण न्यू इंडिया के निर्माण की सार्थक प्रक्रिया, आइये हम सब मिलकर शुरू करें.

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और दृष्टि संस्था के राष्ट्रीय निदेशक हैं)