गांधी के विरोध की एक ही वजह है कि वे सबके हैं किसी एक के नहीं

आज सारी ओर हिंसा का बोलबाला दिखाई पड़ रहा है. बहुत से लोगों का मानना है कि अहिंसा का विचार आज कमोवेश अप्रासांगिक हो गया है.

गांधी के विरोध की एक ही वजह है कि वे सबके हैं किसी एक के नहीं

‘‘इस बात से बड़ी और कोई उपलब्धि नहीं है कि लोग हमारी अच्छाई तक को हिकारत की नजर से देखें और हम तब भी विचतिल न हों.

-मरकस ओरेलियस

मरकस ओरेलियस रोम के उन पांच सम्राटों में से थे जिन्हें अच्छा या बेहतर सम्राट कहा जाता है. उस श्रृंखला के पांचवे एवं अंतिम सम्राट थे. उन्होंने ईस्वी 161 से 180 तक शासक किया. वे एक महान दार्शनिक भी थे और स्टोइकवाद अर्थात आत्मसंयम में बेहद विश्वास रखते थे. उनका उपरोक्त कथन महात्मा गांधी पर भी पूरी तरह से खरा उतरता है. गांधी के जितने प्रशंसक व अनुयायी हुए, उतनी संख्या में तो नहीं परंतु उनकी आलोचना करने और उनके कमोवेश प्रत्येक विचार एवं गतिविधि के खिलाफ भी खड़े रहने वालों की बड़ी जमात उनके अपने समय और आज भी मौजूद है. ऐसा अनुमान है कि आज विश्व में कहीं न कहीं प्रतिदिन गांधी जी पर एक पुस्तक का प्रकाशन होता है. यह अपने आप में एक विलक्षण उपलब्धि कही जा सकती है. उन्हें समझने और उनसे चिढ़ने वाले दोनों को ही पहले उनकी महानता को तो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्वीकारना ही होता है.

आज सारी ओर हिंसा का बोलबाला दिखाई पड़ रहा है. बहुत से लोगों का मानना है कि अहिंसा का विचार आज कमोवेश अप्रासांगिक हो गया है. परंतु साथ ही यह पुछल्ला लगाना ही पड़ता है कि बातचीत के अलावा समस्या के समाधान का कोई अन्य रास्ता या विकल्प नहीं है. गांधी जी के लंदन निवास के समय के उनके मित्र, जोसिह ओल्ड फील्ड जो कि बाद में भी उनके सतत् संपर्क में रहे थे, ने सन् 1934 में कहा था, ‘‘गांधी एक समस्या हैं. शासकों एवं राज्यपालों के लिए वह चुभने वाला कांटा हैं. तर्कवादियों की निगाह में वे मूर्ख हैं. अर्थशास्त्रियों के लिए वे एक निराशाजनक या कहें तो निकम्मे अज्ञानी हैं. भौतिकवादियों के अनुसार वे सपने देखने वाले हैं. कम्यूनिस्टों के लिए वे एक घिसटकर चलने वाले पहिए की तरह हैं. संविधानवादियों के हिसाब से वे एक विषिष्ट श्रेणीबद्ध क्रांति का प्रतिनिधित्व करते हैं.’’ बात यहीं खत्म नहीं होती. रामचन्द्र गुहा अपनी पुस्तक गांधी: दि इयर्स दैट चेंज्ड दि वर्ल्ड में इस फेहरिस्त में कुछ और बातें जोड़ते हुए लिखते हैं, ‘‘मुस्लिम नेताओं के लिए वे सांप्रदायिक हिन्दू थे. हिन्दू अतिवादियों के लिए वे कुख्यात मुस्लिम तुष्टीकरणकर्ता थे. ‘‘अछूतों’’ को वे उच्च जाति की परंपराओं के रक्षक प्रतीत होते थे. वहीं ब्राह्मणों के लिए वे एक एसे समाज सुधारक थे जो कि बहुत जल्दी में थे.’’ मजेदार बात यह है कि गांधी जी के विचार, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग में भी बाकी सबसे एकदम अलग हैं.

हिन्द-स्वराज में वे रेल यातायात तक की आलोचना करने से नहीं चूकते. इतना ही नहीं सन् 1909 में लिखी हिन्द स्वराज्य के सन् 1938 में छपे गुजराती संस्करण के लिए संदेश में वे कहते हैं, ‘‘इसे लिखने के बाद के जो तीस साल मैंने अनेक आंधियों में बिताए, उनमें मुझे इस पुस्तक में बताये हुए विचारों में फेरबदल करने का कुछ भी कारण नहीं मिला.’’ अपने संदेश का अन्त वे एक मजेदार टिप्पणी से करते हैं कि, ‘‘मेरे एक स्वर्गीय मित्र की यह राय भी जान लें कि ‘‘यह एक मूर्ख आदमी की रचना है.’’ उनकी इस स्वीकारोक्ति के मद्देनजर उनके पोते गोपालकृष्ण गांधी द्वारा महात्मा यानी अपने पितामह की गई विवेचना याद हो आती है. वे कहते हैं, ‘‘उन्हें (गांधी जी) मृत्यु से भय नहीं था. वे पराजय से डरते नहीं थे. उन्हें मूर्ख दिखने में भी भय नहीं लगता था और सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह, कि उन्हें अपनी गलती मानने में भी डर नहीं लगता था.’’ वैसे गांधी दार्शनिक स्तर पर स्वयं को अराजकतावादी ही मानते थे.

यहीं पर गांधी जी की प्रासंगिकता भी हमारे सामने आ जाती है. एक स्तर पर वे अपने समय स्थापित सभी मान्यताओं को खुली चुनौती देते हुए स्वयं को हिन्दू कहलाने या कहने में संकोच नहीं करते. उनके आश्रमों में हम किसी भी तरह का धार्मिक स्थल नहीं पाते पर प्रत्येक में सर्वधर्म प्रार्थना अनिवार्यतः होती है. उनकी सादगी मजाक का विषय बनती है. उनके अछूतों के प्रति लगाव का गलत अर्थ लगाया जाता है. हिन्दू-मुस्लिम एकता को लेकर तो उन पर न जाने कितने आरोप लगे और यही उनकी हत्या का कारण भी बना. परन्तु वे कभी अपने पथ से डिगे नहीं. अछूतों/दलितों के जिस समूह ने उनका सर्वाधिक विरोध किया उसके नेता डा. भीमराव अम्बेडकर ही भारत के संविधान निर्माण की प्रारूप समिति के अध्यक्ष बनते हैं. उनका सबसे अधिक विरोध करने वाली हिन्दू महासभा के वरिष्ठ सदस्य डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य बनते हैं. ऐसी तमाम घटनाएं हमें समझाती है कि एक राष्ट्र के निर्माण के लिए किस तरह के बड़प्पन और व्यापक सोच की आवश्यकता होती है. आज तो मोहल्ले में हो रही दुर्गा पूजा और गणेश स्थापना में भी अपनी-अपनी ढपली बजती है. गांधी उन तमाम आशंकाओं को दरकिनार करते हुए कि आजादी के बाद भारत का स्वरूप हिन्दूवादी होगा को नकारते हैं. उनका कहना था कि आजादी कांग्रेस को ही नहीं बल्कि पूरे देश को मिली है. वे संभवतः ऐसे एकमात्र राजनीतिज्ञ हैं जो कि प्रत्येक गतिविधि और कथन को सही व गलत से भी आगे जाकर नैतिकता की कसौटी पर कसते थे.

हिन्द स्वराज में गांधी जी कहते हैं, ‘‘हिन्दुस्तान अंग्रेजों ने लिया सो बात नहीं है, बल्कि हमने उन्हें दिया है. हिन्दुस्तान में वे अपने बल से नहीं टिके हैं, बल्कि हमने उन्हें टिका रखा है. वह कैसे सो देखें. आपको मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि हमारे देश में वे दरअसल व्यापार करने आए थे. आप अपनी कंपनी बहादुर को याद कीजिए. उसे बहादुर किसने बनाया ?’’ आज वैश्विक परिस्थितियां फिर उसी तरफ मुड़ती नजर आ रहीं हैं. ईस्ट इंडिया कंपनी से सैकड़ो गुना बड़ी कंपनियां पूरी दुनिया का व्यापार-व्यवसाय ही नहीं राजनीति भी संचालित कर रही है. वर्तमान में कई कंपनी बहादुर इतनी विशालकाय हो गई हैं कि उनकी संपत्ति अनेक माध्यम आकार के देशों से भी ज्यादा हो गई है. ऐसी परिस्थिति में गांधी को समझने और समझाने की आवश्यकता निरंतर प्रबल होती जा रही है. उनके सोचने, समझने व समझाने का तरीका भी बेहद अनूठा और कमोवेश दुस्साहसी भी था. लुई फिशर लिखते हैं, ‘‘गांधीजी की कांग्रेस अध्यक्षता का वर्ष अब समाप्त हो गया था और दिसंबर 1925 में कानपुर में उन्होंने अपनी गद्दी श्रीमती सरोजनी नायडू को सौंप दी. तब उन्होंने एक वर्ष तक ‘‘राजनीतिक मौन’’ का व्रत ले लिया. गांधी जी ने देखा कि राजनैतिक भारत छिन्न-भिन्न तथा साहसहीन हो रहा है. अतः मौन के लिए यह अच्छा समय था.’’ इस बावन हफ्ते के मौन में गांधी सिर्फ सोमवार को ही पूर्ण मौन रखते और पर्ची स्लेट इत्यादि पर लिखकर बात करते थे. गांधी इस राजनैतिक मौन वर्ष में भी चुप-चाप नहीं बैठे थे. लुई फिशर कहते हैं कि मैंने सन् 1942 में उनसे सोमवार मौन के पीछे का अभिप्राय पूछा. इस पर गांधी जी का जवाब था, ‘‘यह तब हुआ, जब मैं टुकड़े-टुकड़े हो रहा था, मैं कठोर परिश्रम कर रहा था. सख्त गर्मी में रेलगाड़ियों में सफर करता था, अनेक सभाओं में लगातार बोलता था. मैं सप्ताह में एक दिन आराम करना चाहता था. इसलिए मैंने मौन का दिन प्रारंभ किया. यह सही है कि बाद में मैंने इसे तरह-तरह के गुणों से ढक दिया और आध्यात्मिक जामा पहना दिया. परंतु वास्तव में नीयत यही थी कि मैं एक दिन की छुट्टी चाहता था.’’ इस बावन सोमवारों के अलावा गांधी मौन नहीं रहे. हां, वे सार्वजनिक सभाओं आदि में नहीं गए,यात्राएं भी नहीं की, परंतु वे लोगों से मिलते-जुलते रहे, बातचीत करते रहे, चिट्ठी-पत्री भी करते रहे. उस समय के लोगों का कहना था कि एक वर्ष के इस आत्मनिर्वासन के बाद गांधी में जो बड़ा परिवर्तन आया वह हिन्दू - मुसलमान संबंधों को लेकर था. उन्हें पूरी तरह से स्पष्ट हो गया था कि अंग्रेज किस तरह से दोनों सम्प्रदायों के मध्य दूरियां व कटुता बढ़ा रहे हैं. उनका मत था कि सरकार मुसलमानों के साथ पक्षपात कर रही है. वैसे उनका यह मौन वर्ष एक अलग लेख की मांग करता है क्योंकि यह बेहद घटनापूर्ण था और इसे गांधी जी के चरित्र का एक और विरोधाभास, यदि हम मानना चाहें तो सामने आता है. इसी वर्ष जीव दया और जीव हत्या, गर्भनिरोधकों के प्रयोग व विदेश प्रवास पर न जाने को लेकर उनके महत्वपूर्ण निर्णय व मत सामने आते हैं.

आज हमारे चारों ओर अतिवाचालता पैठ बनाती जा रही है. रुककर, ठहरकर, मौन रहकर, सोचना, समझना व समझाना अब हमारी समझ में ही नहीं आता. लगातार आरोप-प्रत्यारोप की कांव-कांव में गंभीर समस्याएं दृष्टिविहीन होती जा रही हैं. गांधी को उनके अपने समय में और कमोबेश आज भी ‘‘अंधों का हाथी’’ की तरह से समझने का प्रयास किया जा रहा है. हिन्दू अपनी तरह से, मुसलमान अपने तरीके, नारीवादी किसी और ढंग से, अर्थशास्त्री व वैज्ञानिक अपनी-अपनी तरह से उन्हें चाह भी रहे और कोस भी रहे हैं. यही गांधी की विशेषता और विजय भी है. अंत में मारकस आरेलियस का ही एक उद्धहरण, ‘‘हम जो सब कुछ सुनते हैं वह अभिमत होता है, कोई असलियत नहीं. हम जो सब कुछ देखते हैं, वह मात्र एक दृष्टिकोण है, सत्य नहीं.’’ जबकि गांधी तो सत्य और केवल सत्य ही खोज रहे थे.

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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