इंग्लैंड में 'विराट और रवि शास्त्री की सिलेक्शन नीति' के कारण मिली हार

रविंद्र जडेजा की लगातार उपेक्षा भी आश्चर्यचकित कर देने वाली है. बार बार काट छांट की रणनीति किसी भी खिलाड़ी व टीम में आत्मविश्वास का संचार नहीं कर सकती.

इंग्लैंड में 'विराट और रवि शास्त्री की सिलेक्शन नीति' के कारण मिली हार

एक राजनेता मेरे मित्र रहे हैं. एक बार मैं एक स्वच्छ छवि के व्यक्ति को अपनी सिफारिश के साथ उनके पास  ले गया. उन्होंने जो कुछ कहा, उसने मुझे चौंका दिया. उनका कहना था 'मुझे अच्छा आदमी नहीं, अपना आदमी चाहिए.' क्या भारतीय क्रिकेट की चयन पद्धति में भी यही चल रहा है. जब तेज गेंदबाजों के लायक विकेट होता है तब उमेश यादव को बाहर बिठा देते हैं. इंग्लैंड में जब दो स्पिनरों को खिलाने लायक विकेट था, तब एक ही स्पिनर खिलाते हैं. वीरेंद्र सहवाग के बाद टेस्ट क्रिकेट में तिहरा शतक लगाने वाले करुण नायर की अनदेखी पर आपका दिल करुणा से भर जाएगा.

पिछली दो तीन सीरीज में रविचंद्रन अश्विन और रविंद्र जडेजा की स्पिन जोड़ी भारत के लिए जीत हासिल कर रही थी. महेंद्र सिंह धोनी की अद्भुत कप्तानी में इस जोड़ी की दहशत विश्व भर के बल्लेबाजों में फैल गई थी. पर अपने स्वर्णकाल में ही इस जोड़ी को तोड़ कर युजवेंद्र चहल और कुलदीप यादव को ले लिया गया. इस नई जोड़ी को तात्कालिक सफलता भी मिली. पर इंग्लैंड जा कर इस जोड़ी से मोह भंग हो गया. इधर कभी अश्विन तो कभी जडेजा को खिलाया जाने लगा है. जडेजा की लगातार उपेक्षा भी आश्चर्यचकित कर देने वाली है. बार बार काट छांट की रणनीति किसी भी खिलाड़ी व टीम में आत्मविश्वास का संचार नहीं कर सकती. मैंने पहले भी अपने लेख में लिखा था कि घरेलू क्रिकेट में विदर्भ को जीत दिलाने के प्रमुख शिल्पकार तेज गेंदबाज रजनीश गुरबानी को इंग्लैंड दौरे पर ले जाना चाहिए था. गुरबानी लेट स्विंग के माहिर हैं. भारतीय परिस्थितियों में अपनी इन स्विंग द्वारा लगातार विकेट चटका सकते हैं तो इंग्लैंड की स्विंग वाली परिस्थितियों में तो वह काफी कारगर सिद्ध हो सकते थे.

कुलदीप यादव जरूर शुरू में सभी के लिए हैरानी का सबब बने. उनकी चाइनामैन, गुगली व टॉप स्पिन के फर्क को समझने में बल्लेबाजों को कठिनाई हो रही थी. पर आज की क्रिकेट की दुनिया प्रतिस्पर्धा वाली और तकनीक रूप से सक्षम है. आपकी हर बारीकी व चालाकी का तोड़ निकाल लिया जाता है. कुलदीप यादव की गुत्थी भी इंग्लैंड ने सुलझा ली. जब टेस्ट मैच में कुलदीप यादव को खिलाया गया तो वह कोई सफलता हासिल नहीं कर सके. वास्ताव में भारत को चाहिए था कि भारतीय विकेटों पर तीन स्पिनरों की जरूरत थी, तब अश्विन, जडेजा के साथ कुलदीप यादव या चहल को बारी बारी से चुना जा सकता था, पर खिलाड़ियों को लंबी काट छांट सभी का मनोबल गिरा देती है.

भारतीय बल्लेबाजों की बात करें तो हम पाएंगे कि शिखर धवन और केएल राहुल लगातार असफल रहे. इनमें से एक को बदल कर करुण नायर को मौका देना बुद्धिमानी होती. करुण नायर की तकनीक अच्छी है. वह शरीर के पास से गेंद को खेलते हैं और साथ ही स्ट्रोक को देरी से खेलने की काबिलियत के लिए जाने जाते हैं. पर इंग्लैंड के खिलाफ लगातार पराजयों के बावजूद उन्हें नहीं खिलाया गया. दौरे पर जब भी टीम जाती है तब टीम प्रबंधन व कप्तान मिल कर ही अंतिम एकादश चुनते हैं. इस मायने में मैं कहूंगा कि कोच रवि शास्त्री की दादागीरी अपना काम करती है. वह अपनी बात मनवाने में माहिर हैं. विराट कोहली एक कप्तान के रूप में सफलता की सीढ़ियां चढ़ने की कोशिश ही कर रहे हैं. महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी के स्तर तक पहुंचने में उन्हें अभी काफी वक्त लग सकता है.

भारत में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, केवल फर्क यह है कि प्रतिभाओं को सही वक्त पर मौका नहीं मिलता है. अब देखिए न हनुमा बिहारी को इंग्लैंड के खिलाफ आखिरी टेस्ट में मौका मिला तो उन्होंने अपनी प्रतिभा के दर्शन करा दिए. हनुमा बिहारी विगत कई वर्षों से घरेलू क्रिकेट में असाधारण प्रदर्शन करते रहे हैं. विकेट पर लंबे समय तक टिके रहने की आदत उन्हें है. इसी प्रवृत्ति का उन्होंने इंग्लैंड में असरदार प्रदर्शन किया. पर उन्हें तब खिलाया गया, जब भारत सीरीज हार चुका था. हार्दिक पांड्या के बारे में बड़ी खबरें फैल रही थीं कि कपिल देव का विकल्प मिल गया है. हमारे देश के क्रिकेट प्रेमी बड़े भावुक हैं. इसलिए एक दो अच्छे प्रदर्शन देखकर ही तुलना करने में जल्दबाजी करते हैं. स्वयं हार्दिक पांड्या बेचारे कह रहे हैं कि वह कपिल देव कहलाना पसंद नहीं करते, वह तो हार्दिक पांड्या के तौर पर ही खुश हैं.

पर यह तो कहना पड़ेगा कि ऑल राउंडर की जगह के लिए कोच रवि शास्त्री का कप्तान विराट कोहली अगर मोहित हैं तो केवल हार्दिक पांड्या से. चाहे वह सफल होते रहें या असफल. बेचारे रविंद्र जडेजा का क्या दोष है. वह विकेट लेने वाले गेंदबाज रन बनाने वाले बल्लेबाज व बेहद चुस्त क्षेत्ररक्षक के रूप में कई बार स्वयं को साबित कर चुके हैं. अब भारत इंग्लैंड के बीच ओवल के आखिरी टेस्ट की बात करें तो हम देखते हैं कि उन्होंने एक पारी में 4 विकेट भी झटके और नाबाद 86 रन बनाए. इंग्लैंड के असहनीय तेज आक्रमण पर जवाबी हमला बोल कर उन्होंने साबित कर दिया कि अन्य उत्कृष्ट कहे जाने वाले भारतीय बल्लेबाज बिना काम  बचाव की मुद्रा में खेल रहे थे.

पर  टीम वाले के बजाए अपने वाले पर भरोसा करने वाले भारतीय चुनाव प्रबंधन को कौन समझाए कि देशहित क्या होता है.

(लेखक प्रसिद्ध कमेंटेटर और पद्मश्री से सम्मानित हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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