इन टिकटों से इसलिए नहीं चौंकिए!

 इस बार एक बात मार्के की पकड़ी वो ये कि पिछड़ों में लोधी-कुनबी-किरार भर नहीं औधिया-दर्जी-सुनार भी हैं. मीसाबंदियों के राष्ट्रीय नेता तो वे हैं ही सो इस बार उनकी दिल्ली ने भी सुन ली. 

इन टिकटों से इसलिए नहीं चौंकिए!

ये तो लगभग नरसिंहराव जैसी ही घटना हुई, हैदराबाद लौटने के लिए डेरा-डकूला बांधे बैठे थे कि बन गए प्रधानमंत्री. अपने राजमणि पटेल के साथ भी कुछ ऐसा ही घटा. दोबार कबीना मंत्री रहने वाले पटेल को कांग्रेस ने टिकट देना बंदकर रिटायरमेंट दे दिया था, हमेशा राष्ट्रीय प्रतिनिधि रहने वाले व पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष रह चुके राजमणिजी को इस बार प्रदेश प्रतिनिधि बनने के लिए मशक्कत करनी पड़ी और आज उन्हें संसद के उच्च सदन राज्यसभा की टिकट मिल गई. इधर भाजपा के बड़े-बड़े तुर्रमखां दिल्ली भोपाल एक कर टीपते रह गए टिकट अजयप्रताप सिंह और कैलाश सोनी को मिल गई. सही ही कहते हैं-राजनीति तड़ित की तरह चंचल और भुजंग की भांति कुटिल होती है. कोई मुझसे पूछे तो अपनी प्रतिक्रिया यही होगी कि भले ही यह जतीय संतुलन के राजनीतिक गुणाभाग की मजबूरी हो लेकिन दोनों पार्टियों ने टिकट को लेकर जो फैसला लिया है वह नई-पुरानी पीढ़ी के लिए उम्मीद जगाने वाली है वरना अबतक तो राज्यसभा टिकट पर थैलीशाहों और लाबिस्टों का पट्टा सा लिख गया था.

चलिए बात शुरू करते हैं राजमणि पटेल से. कांग्रेस में यह भी कमाल की बात हुई. 24 अकबर रोड में जिन दिनों राजमणि पटेल को राज्यसभा की टिकट की बात चल रही थी उन्हीं दिनों मुख्यालय के दूसरे कक्ष में कहीं भाजपा से डिफाल्टर हो चुके एक ऐसे नेता को कांग्रेस में धूमधड़ाके के साथ शामिल करने का निर्णय लिया जा रहा था जिसने सही मायनों में राजमणि पटेल के राजनीति की लुटिया-डोर को डुबो दिया. जी हां रीवा जिलापंचायत अध्यक्ष अभय मिश्र ने ही सेमरिया विधानसभा से राजमणि पटेल को इतने भारी अंतर से हराया था कि पार्टी ने पटेल को अगले चुनाव में टिकट देने के बारे में एक दफे भी विचार नहीं किया. अभय मिश्र अब बाजे-गाजे के साथ कांग्रेस में आने का जस लूट रहे हैं और पटेलजी राज्यसभा के लिए परचा दाखिल कर रहे हैं. वाकय क्रिकेट और राजनीति में कुछ भी संभव है.

राजमणि पटेल कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी के आखिरी चरागों में से हैं जिसे बुझने से पहले ही तेल मिल गया और लौ टिमटिमा उठी. मुझे लगता है कि कांग्रेस के अष्टधातुओं को पटेलजी की याद अभी मुंगावली-कोलारस चुनाव और उसके कुछ हफ्ते पहले मंत्रीमंडल में शामिल कुनबी लोधी जाति के दो सदस्यों की वजह से आई होगी. मुंगावली-कोलारस का चुनाव वोटरों के बीच नहीं जातियों की गोलबंदी के बीच हुआ. लोधी,किरार,धाकड़,कुनबी,काछी जातियों के घोषित सम्मेलन हुए और जातीय भावनाओं के आधार पर प्रत्याशी चुनने के लिए खुले मुंह कहा गया. असर दिखा, कांग्रेस जीती जरूर पर उसके वोट सिमटे.

आजकल लोक-वोकतंत्र और संविधान की मर्यादाओं का ख्याल रखता ही कौन है. कास्ट-क्रीड-रेस-रिलीजन से ऊपर उठकर काम की शपथ लेनें वाले ही घूमफिरकर कुनबी-काछी,लोधी-किरार में आकर अरझ जाते हैं, क्या करियेगा. राजनीति इसी दिशा में चल पड़ी है. खुद गेंदे में लदकर गांधी को सूत की माला पहनाओं और जातीय सम्मेलनों में उन दीनदयाल को भजो जिन्होंने जाति-संप्रदाय को चुनने की बजाय जौनपुर लोकसभा में चुनावी हार को चुन लाया. हाथी के दा.त खाने के कुछ,दिखाने के कुछ, खाते जाइए दिखाते जाइए. राजनीति में अब लोकलाज कहा..

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राजमणि पटेल जातिवादी राजनीति की पैदाइश नहीं हैं. वे छात्र जीवन में यमुनाप्रसाद शास्त्री और चंद्रप्रताप तिवारी के चेले थे. चंद्रप्रताप जब कांग्रेस में गए और 72 में विंध्य में टिकट बंटवारे में उनकी चली तो कालेज में पढ ही रहे राजमणि को अपने पुराने समाजवादी साथी यमुनाशास्त्री के खिलाफ लड़ाने के लिए चुना. यह राजनीति का अद्भुत उदाहरण है कि शिष्य गुरू के खिलाफ लड़ने की आग्या उसी गुरू से लेता है और फिर चुनाव प्रचार में प्रतिद्वंदी(जो कि शास्त्री जी थे) को हरा देता है. शास्त्री जी को राष्ट्रीय ख्याति मिल चुकी थी उनको हराने के बाद राजमणि राष्ट्रीय भले न बने हों पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की नजर के नजारे तो बन ही गए.

राजमणिजी इसके बाद 2008 तक सभी चुनाव लड़े पर 72 के बाद सफलता मिली 80,85 व 98 में. अर्जुन सिंह तथा दिग्विजय सिंह के मंत्रिमंडल में सदस्य रहे. राजनीतिक प्रतिबद्धता इसी से समझ सकते हैं कि जब अर्जुन सिंह ने तिवारी कांग्रेस बनाई तब पटेलजी पद प्रलोभन के बाद भी अर्जुन सिंह के साथ डटे रहे. पटेलजी कार्यकर्ताओं के लिए कितने दरियादिल हैं कि राजस्वमंत्री रहते एक बार बेटे की जगह बाप का ट्रांसफर कर दिया था, वजह सिफारिश करने आए बाप ने याद के लिए पुरची में अपना नाम थमा दिया उसीकी नोटशीट बन गई. बाद में संशोधित हुई. मंत्री-विधायक रहे हों या फुर्सत में घर बैठे ये ऐसे विरले नेता हैं जो हर किसी के लिए फोन करने,चिट्ठी लिखने में जरा भी वक्त नहीं लगाते. यही सहज मिलनसारिता उन्हें अन्य नेताओं से विशिष्ट बनाती है. पर उन्हें राज्यसभा की टिकट इस विशिष्टता के लिए मिलनी होती तो कब की मिल जाती. विधानसभा चुनाव में इसबार कांग्रेस भाजपा के ही अस्त्रों से लड़ना चाहती है. भाजपा ने पिछड़ा वोटबैंक मुकम्मल कर रखा है राजमणिजी निःसंदे  कांग्रेस के लिए पिछड़ों में प्रदेशव्यापी परिचय वाले चेहरे हैं.

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अब आते हैं अजयप्रताप और कैलाश सोनी पर. अजयप्रताप ऐसे मेहनतकश संगठक हैं कि जिम्मेदारी पर जिम्मेदारी ओढ़ने और उसे डूबकर निभाने में उफ् तक नहीं करते. भाजपा के प्रदेश कार्यालय में पूरी रात भोर तक बैठकर वे लिखापढ़ी करते मिल सकते हैं. पिछले सालों में संगठन के चुनाव और सिंहस्थ की जिम्मेदारी को जिस तरह निभाया उसके मुरीद शिवराज सिंह चौहान भी थे नंदू भैय्या के कहने ही क्या. एक बात शायद पार्टी के बाहर के लोगों को न मालूम हो, अजयप्रताप पिछले पांच सालों से वो काम कर रहे हैं जिसमें विक्रम वर्मा को महारत माना जाता था. इन वर्षों में प्रदेश कार्यसमिति और अधिवेशनों के जितने भी राजनीतिक प्रस्ताव बने उसे ड्राफ्ट करने वाले अजयप्रताप ही थे. वे चुरहट के बघेल हैं और बघेली में एक कहावत है- गाए गाए बिआह होइन जात है. अजयप्रताप पिछले कई चुनावों से राज्यसभा प्रत्याशियों के पैनल में डमी रहते थे इस बार असली हो गए. 

अख्खड़-फक्कड़ कैलाश सोनी के पास हर मर्ज की पुड़िया रहती है. मजाक नहीं वे आयुर्वेद और देसी जड़ी बूटियों के गजब के जानकार हैं. इस बार उन्होंने राजनीति की नब्ज सही तरीके से पकड़ली. नरसिंहपुर में वे दो-दो मुश्रानों श्यामसुंदर नारायण और अजयनारायण से लोहा लेते आए हैं. इस बार एक बात मार्के की पकड़ी वो ये कि पिछड़ों में लोधी-कुनबी-किरार भर नहीं औधिया-दर्जी-सुनार भी हैं. मीसाबंदियों के राष्ट्रीय नेता तो वे हैं ही सो इस बार उनकी दिल्ली ने भी सुन ली. प्रदेश की राजनीति के पचड़े में कभी फंसे नहीं हां राजधानी के पत्रकारमित्र जरूर यह बता रहे हैं कि प्रहलाद पटेल को संतुलित करने के लिए यह शिवराज सिंह चौहान का सोचा समझा दांव है वैसे कैलाशजी को लेकर जितना मैं जानता हूं उस हिसाब से वे दांव पर नहीं आर-पार पर भरोसा रखते हैं. इस आरपारी मूड की बदौलत ने ही प्रदेश संगठन ने उनका नाम आगे बढ़ाया. अब 2024 तक इन तीनों के लिए उच्चसदन में सीटें बुक अब चाहे वहां जाकर मौज काटें या यहां एक के बाद एक चुनावों में जातीय वोटों की फसल.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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