सोशल मीडिया कुप्रचार पर नकेल-प्रशासनिक चुनौती

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों से लेकर भारत में लोकसभा, विधानसभा, नगर निकाय, पंचायत चुनावों तक में सोशल मीडिया से जमकर प्रचार किया जाता है. यहीं नहीं भारत में चीनी माल की खरीदारी का विरोध हो, किसी बिजनेस का प्रमोशन हो, किसी संगठन का जनसंपर्क कार्यक्रम हो, सोशल मीडिया ने हर कंटेट को अपना चैनल दिया है. देखा जाए तो सोशल मीडिया पर ऐसे चीजों की एक अनियंत्रित बाढ़ सी चली आ रही है. 

सोशल मीडिया कुप्रचार पर नकेल-प्रशासनिक चुनौती

आज के दौर में सोशल मीडिया एक क्रांतिकारी माध्यम के रूप में उभरा है, तकनीक ने इसको इतना ताकतवर बना दिया है कि ये सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित एंव प्रभावित करने के साथ-साथ रोजमर्रा के जीवन की घटनाओं पर भी गहरा नियंत्रण रख रहा है. आपकी विचारधारा को नियंत्रित करने के साथ आपके निर्णयों को प्रभावित करने में सोशल मीडिया की गहरी भूमिका है. मध्य पूर्व एंव उत्तरी अफ्रीकी देशों जैसे यमन, सीरिया, ईराक, मिस्त्र, ट्यूनीशिया, लीबिया में राजनैतिक सत्ता पलट में सोशल मीडिया की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों से लेकर भारत में लोकसभा, विधानसभा, नगर निकाय, पंचायत चुनावों तक में सोशल मीडिया से जमकर प्रचार किया जाता है. 

यहीं नहीं भारत में चीनी माल की खरीदारी का विरोध हो, किसी बिजनेस का प्रमोशन हो, किसी संगठन का जनसंपर्क कार्यक्रम हो, सोशल मीडिया ने हर कंटेट को अपना चैनल दिया है. देखा जाए तो सोशल मीडिया पर ऐसे चीजों की एक अनियंत्रित बाढ़ सी चली आ रही है. 

हालात यह है कि यदि कोई असामाजिक मैसेज या वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो जाये तो उसे रोक पाना प्रशासनिक तौर पर संभव नहीं है. ऐसे में आंतरिक सुरक्षा एंव कानून-व्यवस्था के लिए सोशल मीडिया एक गंभीर प्रशासनिक चुनौती के रुप में सामने आया है. पिछले कुछ सालों में देश विरोधी तत्वों द्वारा देश की सामाजिक एकता को तोड़ने के लिए दूसरी जाति, धर्मो, वर्गो के खिलाफ फेसबुक, व्हाट्स ऐप एवं ट्विटर का प्रयोग नृजातीय (ETHNIC) कुप्रचार करने, वर्ग हिंसा फैलाने में बेहिचक किया गया है.

समय-समय पर विभिन्न जांच एंजेसियां भी इसकी पुष्टि करती है और विभिन्न राज्यों की पुलिस के सामने भी ऐसे मामले लगातार दर्ज हो रहे है. हाल ही में सहारनपुर में हुई जातीय हिंसा में भीम आर्मी एंव अन्य समूह द्वारा अपने प्रचार एंव जनसमर्थन हेतु सोशल मीडिया के प्रयोग की बात उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वीकार की है. यही नहीं, पिछले दो सालों में देश के विभिन्न शहरों में हुए दंगे एवं बलवे में उपद्रवियों द्वारा सोशल मीडिया का प्रयोग शांति भंग करने एवं लोगों को भड़काने में व्यापक रूप से किया गया है, इसकी पुष्टि भी संबंधित जिलों के पुलिस प्रशासन द्वारा प्रतिवेदित की गई है. 

इस कुप्रचार से सबसे प्रभावित युवा पीढ़ी हुई है, जिसके तार्किक आधार को ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सामाजिक रूप से परिपक्व व गंभीर होने से पहले ही उसे नृृजातिय (ETHNIC) एंव जातीय हिंसा के लिए मांइडवॉश करके तैयार किया जा रहा है. यदि इस प्रक्रिया पर कोई कानूनी रोकथाम नहीं लगाई गई तो दीर्घकालिक तौर पर सोशल मीडिया देश के बाल्कनीकरण, सरल शब्दों में कहे तो विभाजन के लिए अत्यंत घातक प्रचार मंच साबित होगा. स्वयं गुप्तचर एंजेसियां इस बारे में खुलासा कर चुकी है कि आंतकवादी, नक्सलवादी एंव अलगाववादी संगठन बड़े स्तर पर युवाओं को स्वयं से जोड़ने के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग कर रहे है.

सबसे बड़ी विडंबना ये है कि इस नृृजातीय एंव जातीय हिंसा आधारित कुप्रचार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम दिया जा रहा है, जबकि सूक्ष्म विश्लेषण किया जाये तो यह संविधान के अनुच्छेद 19(2) का सीधा अतिक्रमण है, जो राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था एंव अपराधिक कृृत्यों को प्रोत्साहन देने वाली अभिव्यक्ति पर रोक लगाने का प्रावधान करता है. फेसबुक में वैचारिक घृृणा फैलाने वाले लोगोें ने हजारों ऐसे प्रोफाइल खोल रखे है जहां से वे नियमित तौर पर अन्य वर्गो के प्रति जहर फैलाते, कुप्रचार करते है. धार्मिक, सामाजिक एंव नृृजातिय हिंसा के लिए लोगों को तैयार करते है.

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विदित हो कि साल 2015 में सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति पर नियंत्रण रखने वाली आईटी एक्ट की धारा 66क को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अंसवैंधानिक घोषित कर दिया था. लेकिन इसके बावजूद इस तरह के कृृत्य सीधे तौर पर आईपीसी की धारा 153क, 153ख, 295क का विधिक उल्लघंन है. बदलते हालातों में सोशल मीडिया वो मंच है जहां कुप्रचार के लिए भौतिक उपस्थिति की आवश्यकता नहीं है. कुप्रचार करने वाली प्रोफाइलों से हजारों लोग फॉलोअर्स के रूप में जुड़े रहते है और कुप्रचारित स्टेट्स में कमेंट एवं लाइक के जरिये नृृजातिवादी, जातिवादी घृृणा एवं हिंसा फैलाने वाली लिखित बहसों में हिस्सेदार बनते है और एक विजुअल भीड़ का रूप ले लेते है. ये विजुअली सक्रिय सदस्य भौतिक रूप से भी इस घृृणा को बढ़ाते है और सांप्रदायिक हमलों का आधार तैयार करते है. हाल ही में भीड़ द्वारा दूसरे धर्म के लोगों की हत्याएं इस बात के ज्वलंत उदाहरण है.

सोशल मीडिया एक नेशनल-इंटरनेशनल नेटवर्क पर काम करता है. ऐसे में एक समाधान ये सकता हो सकता है कि जब तक सरकार सोशल मीडिया के नियमन को लेकर कोई दीर्घकालीन नीति तय न करें तब तक तात्कालिक रुप से सोशल मीडिया से संबंधित जनशिकायतों के निष्पादन हेतु एक केन्द्रीय सोशल मीडिया सेल बनाया जाएं, जो सोशल मीडिया में नृृजातिय एंव जातिय हिंसा को बढ़ावा देने वाले पोस्टों पर राज्य सरकारों के पुलिस तंत्र के जरिये पर्यवेक्षण, अनुवीक्षण के साथ आवश्यकता पड़ने पर कानूनी कार्रवाई भी करे.

एक और बिंदु है वह यह है कि सोशल मीडिया में इस तरह के कुप्रचार को रोकने के लिए सोशल मीडिया वेबसाइट द्वारा कोई ठोस जनशिकायत तंत्र नहीं बनाया गया है. यही कारण है कि हजारों-हजार की जनसंख्या में ऐसी प्रोफाइल रोज जन्म ले रही है.

सोशल मीडिया में इस तरह के कुप्रचार को रोकने के लिए सोशल मीडिया वेबसाइटों को भी एक नियामक तंत्र के भीतर लाया जाये और ऐसे मामलों में उनकी कानूनी जिम्मेदारी को आवश्यक सीमा तक तय किया जाये. इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्रभावी जनशिकायत तंत्र बनाने के साथ उन्हें अपने कंटेट में ऐसे फिल्टर संधारित करने की व्यवस्था अपनाने को कहा जाये जो नृृजातिय हिंसा, जातिय घृृणा से संबंधित कंटेट को अपरिहार्य रुप से रोके. सबसे बढ़िया रहेगा कि यदि किसी कंटेट पर बहुराष्ट्रीय सोशल मीडिया कंपनी को बारम्बार नृृजातिय एंव जातिय घृृणा को भड़काने वाली जनशिकायत प्राप्त होती है तो इसकी सूचना कंटेट लिखने वाले को चेतावनी तंत्र के माध्यम से दी जाये और अंतिम तौर पर इसकी सूचना सरकारी सुरक्षा एंजेसी अथवा पुलिस को देना अनिवार्य किया जाये. हो सकता है कि डाटा शेयरिंग को लेकर सोशल मीडिया सर्विस प्रोवाइडर आपत्ति दर्ज कराये, ऐसे में विधिक प्रावधानों के तहत डाटा शेयरिंग के लिए आवश्यक प्रविधि का विकास सरकार द्वारा किया जाये. 

ऐसे में घृृणा फैलाने वालों के प्रोफाइलों के खिलाफ मिलने वाली बारम्बार जनशिकायतों से या तो उनके प्रोफाइल सर्विस प्रोवाइडर कपंनी द्वारा बंद कर दिये जायेंगे अथवा सरकारी एंजेसी की कार्रवाई में ऐसे लोग आ जायेंगे. अच्छा रहेगा की सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों को एकाउंट बनाने के और अधिक विश्वसनीय मानकों को अपनाने के लिए भी बाध्य किया जाये..हाल ही में जर्मनी जैसे देश मे सोशल मीडिया के नियमन  हेतु एक कानून पारित किया गया है, ऐसे कानूनों में उल्लेखित प्रक्रियाओं का भी अध्ययन कर भारतीय आवश्यकताओं के हिसाब से सोशल मीडिया नियमन में प्रक्रियाओं का विकास किया जा सकता है. 

(लेखक कपिल शर्मा बिहार राज्य निर्वाचन सेवा में अधिकारी हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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