राष्ट्र के लिए 'धर्मयुद्ध' लड़ूंगा : अमर सिंह

अंतिम अपडेट: रविवार मार्च 5, 2017 - 07:10 PM IST
राष्ट्र के लिए 'धर्मयुद्ध' लड़ूंगा : अमर सिंह

समाजवादी पार्टी से निष्कासित नेता अमर सिंह अपने बेबाक बोल के लिए जाने जाते हैं और उनके बयान अक्सर राजनीतिक सरगर्मी को बढ़ा देते हैं। सपा से दूसरी बार अपने निष्कासन और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के साथ अपने संबंधों के बारे में अमर सिंह ने 'इंडिया 24x7' के एडिटर वासिंद्र मिश्र के साथ विस्तार से चर्चा की। पेश हैं इस बातचीत के मुख्य अंश- 

वासिंद्र मिश्र : उत्तरप्रदेश में चुनाव लगभग समाप्ति पर है आपकी वह सक्रियता देखने को नहीं मिली, सियासी तौर पर जो इसके पहले चुनाव में देखने को मिलती थी? इसकी कोई खास वजह?

अमर सिंह : देखिए, इसकी खास वजह ये है कि जो अच्छा सच्चा कलाकार होता है उसको अभिनय के लिए एक पटकथा चाहिए, एक कथानक चाहिए, एक मंच चाहिए। समाजवादी पार्टी से एक बार मेरा निष्कासन हो चुका है। पहले निष्कासन को भूल समझकर मैंने दूसरी बार 6 साल के अंतराल के बाद मुलायम सिंह जी के कहने पर उनका अनुरोध स्वीकार किया। दूसरी बार पुत्र ने निष्कासित कर दिया और राज्यसभा के अध्यक्ष आदरणीय हामिद अंसारी जी की अधिकृत सूचना के अनुसार मैं समाजवादी पार्टी का सदस्य भी नहीं हूं। मेरी हैसियत समाजववादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव या संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष की नहीं बल्कि दूसरी बार निष्कासित राज्यसभा सांसद की है। ऐसे समय में मुझे ‘मन की बात’ करने का एक अवसर प्राप्त हुआ है। मैं अपनी ‘मन की बात’उन्मुक्त तरीके से बिल्कुल खुलकर जनता के सामने रख सकूं यही मेरा उद्देश्य है।
 
वासिंद्र मिश्र : अमर सिंह के बारे में भारतीय राजनीति में एक बात बहुत चर्चित है कि अमर सिंह वन मैन आर्मी हैं और अनगाइडेड मिसाइल की तरह काम करते हैं। न तो वो किसी के कंट्रोल में रहते हैं न उनको किसी के सहयोग की जरूरत है। वो जिधर चलते हैं उधर पूर्णरूप से संगठन, पार्टी रहते हैं। हाल ही में आपके जो बयान आए हैं, आप भारतीय जनता पार्टी का नाम नहीं ले रहे हैं। आप राष्ट्रवाद का नाम ले रहे हैं, आप सफेदपोश, जो अपराधी हैं उनको बेनकाब करने की बात कर रहे हैं। इस तरह की बातें बीजेपी भी करती है, संघ परिवार से जुड़े लोग भी करते हैं। ऐसे में आपका जो अचानक हृदय परिवर्तन दिखाई दे रहा है, इसके पीछे क्या आपके साथ समाजवादी पार्टी में जो कुछ भी हुआ वो है या सचमुच आप वैचारिक तौर पर या जहनी तौर पर उन विचारधाराओं की तरफ चले गए हैं? 

अमर सिंह : मैं मनन कर रहा था कि हमारे जीवन, समाज, दर्शन में रामायण, महाभारत प्रासंगिक क्यों है, बार-बार उसको लोग पढ़ते हैं और भी पढ़ना चाहते हैं ऐसा क्यों है? तो मुझे लगा जर, जोरू, जमीन, दौलत, औरत, शौहरत ये विवाद का कारण हर युग में बनते हैं, चाहे त्रेता हो, चाहे द्वापर हो, चाहे अखिलेश यादव का कलियुग हो। धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन द्वारा किए गए कुकृत्यों से घायल उत्तर प्रदेश की जनता-मर्मांतक छटपटाहट लिए मैं अमर सिंह इस युग के कौरवों का द्रोणाचार्य अपनी व्यथा-कथा कहकर अब और हंसी का पात्र नहीं बनना चाहता। पर हां हो सकता है अर्जुन पुन: नपुंसक हो गए लेकिन मैं अमर सिंह योद्धाओं का योद्धा भला मुझे युद्ध में जाने से कौन रोक सकता है। जब दुर्योधन और दुशासन के अवशेष तक आतंकित कर रहे हों, समूची व्यवस्था को तब क्या भीम, विदुर, कृपाचार्य और स्वयं माधव की गीता के संदेश आज ग्राह्य नहीं होंगे। तो 'यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानि भवति भारत:' क्यों नहीं प्रासंगिक होगा और मैं अमर सिंह कौरवों का द्रोणाचार्य होने का प्रायश्चित क्यों नहीं कर सकता। किंतु स्मरण रहे उत्तर प्रदेश की जनता की तरह अनंत काल तक झूठे सपनों वादों में खोए रहना मेरे लिए असहनीय है और मैं अमर सिंह राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति के लिए अकेले ही बिना किसी दल पद के इस धर्म युद्ध का महाभारत लड़ूंगा और देखूंगा कि मुझे कौन अबू आज़मी आज़म खान दाऊद इब्राहिम, कौन अखिलेश इस युद्ध से रोकेगा। ये आपके प्रश्न का जवाब है कि द्रोणचार्य जैसा व्यक्ति जो अर्जुन को प्यार करता था उसने एकलव्य का अंगूठा ले लिया। जैसे मैंने शिवपाल जी का पद लेकर अपने अर्जुन को दे दिया। बस, इस महाभारत में अंतर इतना ही है कि उस महाभारत के अर्जुन ने द्रोण को मार दिया था ये द्रोण सजग है, सावधान है, इसकी मृत्यु अपने अर्जुन के हाथ नहीं लिखी।
 
वासिंद्र मिश्र : आपने बहुत अच्छी बात कही है लेकिन इसमें जो मुख्य पात्र रहे हैं धृतराष्ट्र वो तो आपके बहुत लंबे समय से पुराने दोस्त रहे हैं?

अमर सिंह : देखिए, मैं मुलायम सिंह के बारे में कोई हल्की बात करूंगा। मुलायम सिंह जी ने मुझे स्नेह और विश्वास बहुत दिया है लेकिन वो मेरे सम्मान की रक्षा नहीं कर पाए। पहली बार भी अपमान, दूसरी बार भी अपमान और अबकी बार तो हद हो गई। जब उन्होंने कहा, समाजवादी पार्टी के रजत जयंती समारोह में शामिल होने आप लखनऊ मत आइए क्योंकि आपके आने से विवाद होगा। फिर गायत्री प्रजापति बलात्कार शिरोमणि, अवैध खनन महाधिपति वो समाजवादी पार्टी के रजत जयंती समारोह के राष्ट्रीय संयोजक कैसे बने? मैंने आदरणीय मुलायम सिंह जी से सिर्फ एक व्यक्ति के समायोजन की बात की और उसके पीछे भी एक कारण था। मैं आपको बताऊं, दिल्ली के चुनाव में जया प्रदा जी ने लगभग बीजेपी के लिए प्रचार करने का मन बना लिया था। मुलायम सिंह जी का फोन आया, कहा- आपने जयाप्रदा को बीजेपी में भेज दिया, अच्छा नहीं किया, उन्हें रोकिए। मैंने जयाप्रदा जी से कहा, आप मत जाइए। ऐसे में मेरा नैतिक दायित्व हो गया, अगर वो बीजेपी में जातीं, उन्हें कोई पद मिलता, नहीं मिलता, जैसे किरण बेदी जी गईं तो मैं मेरी नैतिक जिम्मेदारी से मुक्त रहता। मैंने बस ये ही कहा-आपने आजम खान को नवाजा, आजम खान की शरीक-ए-हयात अर्धांगिनी को नवाजा, आजम खान के रिश्तेदार भोपाल के मुनव्वर सलीम को नवाजा, आजम खान के लड़के को नवाजा, तो मेरे साथ लंबी चौड़ी कोई भीड़ नहीं है। मुझे मालूम है कि मेरे 20-25 साल के संबंध में मेरे कहने पर एक टिकट नहीं दी गई तो कम से कम आप जयाप्रदा जी के लिए कुछ कर दीजिए। अखिलेश ने कहा, कवि नीरज को पद दूंगा पर जयाप्रदा को नहीं। जया को बेआबरू कर निकाल दिया गया। फिर मुलायम सिंह जी ने कहा कि मैं उन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाऊंगा, आपको जानकर आश्चर्य होना कि एसपी कार्यालय से सूचना आई कि राष्ट्रीय सचिव की नियुक्ति हो रही है लेकिन जयाप्रदा जी की जगह बलात्कार शिरोमणि, अवैध खनन महाधिपति गायत्री प्रजापति को मुलायम सिंह जी ने अपने कलम से राष्ट्रीय सचिव बना दिया। हालांकि, मुझे राष्ट्रीय महासचिव भी उन्होंने अपने कलम से बनाया लेकिन जब जया जी के लिए कुछ नहीं किया गया तो सोचिए मेरे हृदय पर क्या बीती होगी? और तब जब मैंने उनके आश्वासन पर जयाप्रदा जी को कह दिया। मैं आपको बताऊं जया ने रामाराव जी के साथ काम किया। समाजवादी पार्टी में आने से पूर्व एनटी रामाराव ने उन्हें राज्यसभा का सांसद बनाया। उन्हें स्थापित कर दिया था। डॉ. राममनोहर लोहिया ने दक्षिण की 2 महिलाओं अम्मालू बहनों को यूपी में लाकर राजनीति करवाई थी। बाद में वो मंत्री तक हुईं। उसी परंपरा के तरह दक्षिण भारत की एक महिला यहां आएगी। हालांकि मेरे कहने से जयाप्रदा जी को टिकट नहीं मिला। उन्हें आजम खान के कहने से रामपुर का टिकट मिला। ये अलग बात है कि आजम खान के सद्व्यवहार से पीड़िता जयाप्रदा संभवत: आजम खान में गायत्री प्रजापति को देख रही होंगी। इसलिए मुझे उनके सम्मान की रक्षा के लिए खड़ा होना पड़ा, मैं खुलकर बोल रहा हूं।   

वासिंद्र मिश्र : अापने महाभारत का जिक्र किया, महाभारत की कहानी पढ़ने पर जो उसका मुख्य पात्र पढ़ने को मिलता है वो द्रौपदी का है। माना जाता है कि महाभारत की लड़ाई द्रौपदी की जिद की वजह से हुई, तो आप और समाजवादी पार्टी, मुलायम सिंह के बीच में जो झगड़ा हुआ है उसकी वजह जयाप्रदा ही हैं क्या?

अमर सिंह : नहीं, जयाप्रदा नहीं हैं। आपको बताऊं झगड़ा बिलकुल नहीं हुआ है, आपके अंदर स्थिर प्रज्ञयता नहीं है, आप नहीं दीजिए, आप कुछ नहीं कीजिए लेकिन स्पष्ट साथी को बता दीजिए। जैसे इस बार उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि मेरे पुत्र अखिलेश यादव, मेरे मित्र आजम खान और मेरे भाई रामगोपाल ये त्रिमूर्ति मुझे यूपी में नहीं देखना चाहतीं तो आप यूपी मत आइए। मैं समाजवादी पार्टी का इतना कद्दावर, इतना बड़ा पदाधिकारी इस त्रिमूर्ति के कारण मेरे उत्तर प्रदेश में आने पर निषेधाज्ञा लगा दी गई। फिर उन्होंने मुझे कहा कि आप निर्वाचन आयोग जाते हैं। लोगों को अच्छा नहीं लगता, आप निर्वाचन आयोग मत जाइए। अरे, वकील मेरा, प्रयत्न मेरा, संघर्ष मेरा लेकिन मुझे अनुपस्थित करने का आदेश हुआ। उसके बाद कहा गया कि आपसे मिलना जरूरी होता है इसलिए आप प्रमुख द्वार से मत आइए क्योंकि वहां मीडिया रहती है, इसलिए अखिलेश, रामगोपाल, आजम खान के संज्ञान में आता है तो वो विचलित होते हैं। इसलिए आप पिछले दरवाजे से आया करिए। मुझे ऐसा लगा जैसे किसी स्त्री का किसी पुरुष से अवैध संबंध हो और छिप-छिप के हो। ‘हमको जो ताने देते हैं हम खोए हैं इन रंगरलियों में, हमने उनको आते देखा है छिपकर इन गलियों में, ये सच है झूठी बात नहीं... तुम बोलो ये सच हैं न...’। वही मेरे साथ हो रहा था कि छिपकर जाइए और रंगरलियां मनाइए। संबंध रखिए लेकिन प्रमुख द्वार से नहीं बैक डोर से एंट्री करिए।

वासिंद्र मिश्र : इसका मतलब ये मानें कि वो आपका इस्तेमाल करना चाहते थे? राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक कई तरह मदद लेना चाहते थे लेकिन, आपके रिश्ते को सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे?

अमर सिंह : नहीं, ये भी नहीं है। गलत होगा ये आकलन। मुलायम सिंह जी ने मुझसे कहा था कि आपमें, मुझमें एक गुणात्मक अंतर है। आप संबंधों के लिए राजनीति का त्याग करते हैं, मैं राजनीति के लिए किसी संबंध की कुर्बानी देने के लिए तैयार हूं। इसलिए शायद मेरी कुर्बानी दी गई लेकिन, जीवन में पहली बार पूरी आस्था और विश्वास के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ देने के बाद मैंने सोचा है कि मैं मुलायम सिंह जी से ये चीज अब समझ लूं कि जिस तरह वो राजनीति के लिए किसी रिश्ते की कुर्बानी देने के लिए तैयार रहते हैं, मुझे भी अपने जीवन के लिए कुछ सोचना चाहिए। कुर्बानी दूं या न दूं मुझे खेद है कि मैं आबूधाबी गया हुआ था, उनका संदेश आया कि वो दिल्ली सिर्फ मुझसे मिलने के लिए आए हैं। मैंने उनसे बात की कि आप दिल्ली मुझसे मिलने के लिए आ रहे हैं, मैं आबूधाबी में हूं ये मुलाकात नहीं हो सकती और मुझे बिलकुल खेद नहीं है कि मैं आबूधाबी में था। चूंकि संभवत: मैं यहां होता तो उनसे मिलता और मिलता तो मेरे अंदर इतना साहस न होता कि मैं उनके सामने जाने पर उनसे अवज्ञा करने का साहस करूं और संभवता वो मीडिया बुलाकर कह देते कि मेरा और अमरसिंह का फैसला हो गया है। अमर सिंह पुन: समाजवादी पार्टी में आएंगे और वो कहते अखिलेश ये तुम्हारे अंकल हैं बात करो तो मुझे इस बात का भी भय था क्योंकि तिल-तिल जलकर दीपक बनकर मैंने घर का तिमिर भगाय़ा भोर हुई तो सब सूरज के साथ चल दिए। ऐसा ही हुआ जब सत्ता आई तो सब चल दिए, ऐसे में कितनी कुर्बानी लेंगे। बकरे की भी कुर्बानी बकरीद में एक बार होती है। बार-बार लगातार नहीं होती है।

वासिंद्र मिश्र : मुलायम सिंह जी के पूरे राजनीतिक करियर पर नजर डालें, आप बहुत नजदीक से देखें हैं उन्हें। मैंने भी उन्हें काफी करीब से देखा है। उनके बारे में एक स्थापित मान्यता है कि मुलायम सिंह राजनीति के सबसे अनरिलायबल पॉलिटिशियन हैं जिन लोगों ने मुलायम सिंह की मदद की उन्होंने उन्हें सबसे पहले धोखा दिया। हरकिशन सिंह सुरजीत, प्रकाश करात, ममता बनर्जी, राजीव गांधी, चंद्रशेखर, वीपी सिंह और अमर सिंह एक लंबी फेहरिस्त है। आप मुलायम सिंह जी की इस फितरत को क्यों नहीं समझा पाए?

अमर सिंह : मैंने अपना राजनैतिक जीवन नक्सलवाद के विरुद्ध लड़ाई लड़ते हुए छात्र परिषद से शुरू किया। प्रियरंजन दास मुंशी और सुब्रत मुखर्जी के साथ मैंने काम किया। बाद में मेरा संबंध वीर बहादुर सिंह जी से हुआ वो यूपी के सीएम हुए और उन्होंने पहली बार आजमगढ़ की लालगंज सीट से मेरे लिए प्रयत्न किया, वो सीट नहीं मिली। उस समय मुख्यमंत्री एनडी तिवारी और वीर बहादुर सिंह में राजनीति द्वंद था तो क्षत्रिय प्रत्याशियों का टिकट तिवारी जी काट दिए थे और वीर बहादुर जी भी उनके लोगों के टिकट काट दिया करते थे, प्रतिस्पर्था थी। इसके बाद माधव राव जी ने कहा कि आप मेरे साथ काम कीजिए, उन्होंने कहा कि मैं जीत जाता हूं, पर ग्वालियर संभाग में मेरे लोग नहीं जीतते। माधव राव जी बहुत सज्जन व्यक्ति थे, उन्होंने कहा कि आप भिंड से खड़े हो जाइए क्योंकि भिंड के बगल में इटावा है तो मुलायम सिंह जी ने कहा कि अमर सिंह जी हमारे भी मित्र है अगर वो कांग्रेस से भी खड़े होंगे तो हम समर्थन करेंगे। हमारे और मुलायम जी के भावनात्मक संबंधो की नींव वही से पड़ी। लगभग टिकट मिल गया। हमारा टिकट उस समय कैप्टन सतीश शर्मा, स्वर्गीय ललित सूरी जी के कहने से वो टिकट हमारा उन्होंने कटवा दिया, उस टिकट के लिए अमिताभ बच्चन भी राजीव गांधी से सिफारिश करने गए थे। इतना तगड़ी सिफारिश के बाद भिंड का मिला हुआ टिकट काटकर उदयन शर्मा को दे दिया गया। खैर, मैंने उदयन जी को फोन किया, बधाई दी। वो हमारे बड़े अच्छे मित्र थे मैंने पूछा कि मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं, इसके बाद मुझे लगा कि कांग्रेस में मेरी पनौती है। मैं वीर बहादुर जी का मित्र, माधवराव जी का मैं खास, अमिताभ जी का मैं मित्र जो उस समय राजीव गांधी के सबसे निकट के व्यक्ति थे, उनकी सिफारिश के बावजूद लोकसभा का टिकट मुझे न मिला ऐसे में मैं क्या करूं? उस समय जैन हवाला कांड के बाद से पार्टी से बाहर हुए माधव राव जी ने एक अलग आंचलिक दल बना लिया था तो हम भी कांग्रेस के अलग हो गए। उस समय मुलायम सिंह जी ने मुझे पकड़ा। हमारे नरसिम्हा राव जी से गहरे संबंध थे, आज आपको एक अंदर का तथ्य बता रहा हूं। जितेंद्र प्रसाद जी और नरसिम्हा राव जी ने मिलकर बहन जी के साथ एक प्रयोग किया था कि कांग्रेस और बीएसपी का एक गठजोड़ होगा और तत्काल मुलायम जी की सरकार को हटाने का निर्णय लिया था। मुलायम सिंह जी के साथ जाकर नरसिम्हा राव जी का मैंने पांव पकड़ लिया। नरसिम्हा जी मुझे मानते थे और मुझे याद है कि सुबह-सुबह एक नंबर था 23015550 जो नरसिम्हा राव जी खुद ही उठाते थे। उस नंबर पर फोन करके हम लोग पहुंच जाते थे। तब मैं एआईसीसी का मेंबर था तो उन्होंने कहा कि आप तो कांग्रेस के सदस्य हैं आप मुलायम सिंह की बात क्यों कर रहे हैं। तो मैंने कहा कि 6 महीने की सरकार इनकी रहने दीजिए उसके बाद आपको जो करना हो करिए। उन्होंने बात मान ली, मुलायम भी इस बात को इनकार नहीं करेंगे। मुलायम जी ने भी एक कार्यकर्ता सम्मेलन में कहा कि ये जो 6 महीने की अतिरिक्त सरकार है ये अमर सिंह की देन है। उस समय लगा कि ये आदमी विलक्षण है जो अंदर की बात भी खुद क्रेडिट न लेकर सबको बता रहा है। उन्होंने खुद श्रेय न लेकर मुझे दिया, उससे मैं उनकी ओर आकर्षित हो गया। उसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि इस बार तो मैंने राजबब्बर से वादा किया है कि उन्हें राज्य सभा भेजना है, अगली बार आपको भेजना है और अगली बार मैं उनके पास नहीं गया बल्कि हर बार मैंनें उन्हें राज्यसभा के लिए मना किया। अबकी बार तो मैंने हद कर दी, मैंने कहा ‘मुझे अर्थी कबूल है, टिकटर्थी होना कबूल नहीं है’। मैंने कहा कि मैंने समाजवादी पार्टी का निर्माण आपके साथ किया है। मैं औपचारिक तौर से बेनी प्रसाद वर्मा जी की तरह एसपी का कार्यकर्ता पुन: बनकर अपना सौभाग्य मानता हूं। खैर, मैं उज्जैन में था तो मुझे अहमद पटेल का फोन आया कि बधाई हो! आप राज्यसभा में हो गए। उससे पहले मैं राहुल गांधी से मिला थे। मैंने कहा आप अब बधाई दे रहे हैं, कुछ दिन पहले राहुल जी से मेरी मुलाकात हुई थी तो क्या कांग्रेस ने मुझे राज्यसभा दे दिया। बोले, नहीं मुलायम जी ने दिया है। मैंने कहा संभव ही नहीं है मैं तो एसपी का सदस्य ही नहीं हूं, तो वो बोले ‘आप दिल में है दल में भले ही न हो’। इसलिए मैंने कहा कि मुलायम सिंह जी ने स्नेह और विश्वास दोनों देने में मुझे कोई कंजूसी नहीं की लेकिन जहां मेरे स्वाभिमान और सम्मान की बात हुई वो नहीं बचा पाए। राज्यसभा के चुनाव में उन्होंने सबसे अधिक संख्या मुझे अलॉट की लेकिन मैं तृतीय चरण में जीता। इस दौरान राम गोपाल यादव विदेश चले गए थे और ये सूचना देकर चले गए थे कि अमर सिंह और संजय सेठ हार सकते हैं। आप सोचिए कि मतदान हो रहा है सतीश चंद्र मिश्र, कपिल सिब्बल और मैं प्रत्याशी के रूप में बैठा हुआ हूं। आजम खान आते हैं और मतदान के वक्त सार्वजनिक रूप से मां-बहन की गाली देते हैं तो कितना अपमान? जहां रामगोपाल और आजम खान जैसे नेता हों जो भारत माता को डायन औऱ कश्मीर की स्वतंत्रता के लिए शहीद हुए जवानों का अपमान करते हों और कहते हैं कि कश्मीर भारत का हिस्सा ही नहीं है। अरे गुलाम नबी आजाद वहां से आते हैं, ये नेहरू, कौल और टकरू जो उत्तर प्रदेश में हैं, ये उत्तर प्रदेश के उपाध्यय, दूबे और चौबे नहीं हैं, ये मूल ब्राह्मण हैं ये सब कश्मीर ब्राह्मण हैं, ये भी बाहरी हैं तो आजम खान जी जो राहुल-अखिलेश की टीम के बड़े कद्दावर नेता हैं उनके अनुसार गांधी परिवार भी बाहरी है, पाकिस्तानी हैं, जैसे गुलाम नबी आजाद पाकिस्तानी हैं। 

वासिंद्र मिश्र : राष्ट्रवाद के बारे में आप जो बोल रहे हैं, सड़कों में गड्ढों के बारे में आप जो बोल रहे हैं तो क्या आप शिवपाल जी के बारे में बताना चाह रहे हैं कि शिवपाल जी के विभाग में काम ठीक नहीं हुआ साढ़े चार-पांच सालों में?

अमर सिंह : देखिए, शिवपाल जी के ही विभाग में काम हुआ है। ये अच्छा प्रश्न आप ने पूछा, जितने पुल बने आज़ादी के बाद अकेले उनके कार्यकाल में सबसे ज्यादा उन्होंने पुल का निर्माण किया। जबकि उनको उनके मन का सचिव भी नहीं दिया गया। हरदम उन पर अंकुश रखा गया, हमेशा उनको बाधित किया गया। शिवपाल जी जैविक पिता हैं अखिलेश जी के, उनके घर पर पले बढ़े लेकिन शिवपाल जी का जो काम था उसमें हस्तक्षेप किया गया। ये जो बड़ी बड़ी सड़कें बनी हैं जिस पर हवाई जहाज उतरा है जिसका उद्घाटन हुआ है। ये अदृश्य विकास है मैं उन सड़कों की बात कर रहा हूं, उन सड़कों पर मैं गया वहां गड्ढे मिले मुझे। शिवपाल जी की सड़कों की बात नहीं कह रहा हूं। पीडब्लयूडी के अंदर एक पीडब्लूडी है, 'चक्के पर चक्का चक्के पर गाड़ी और गाड़ी पर निकली अखिलेश की सवारी, थोड़े अगाड़ी थोड़े पिछाड़ी' तो हवाई जहाज जहां उतरा है वहां सड़क अच्छी नहीं है। मेट्रो बन रहा है एक अच्छा प्रयत्न है लेकिन पूरा बना नहीं है क्योंकि बनते-बनते चुनाव आ गया, लेकिन ये पहले 2 प्रोजेक्ट हैं। एक्सप्रेस हाई-वे के नवनीत सहगल और अखिलेश जी के संयुक्त निर्देशन में निर्मित जो पूर्ण निर्माण से पहले उद्घाटित हो गए और जिसमें अभी भी गड्ढा युक्त मामलें हैं और हमारी पुत्रवधु का बयान भी आया डिंपल जी का की अमर सिंह जी जब बोलते हैं तो मैं टीवी बंद कर देती हूं और अपने बच्चों को भी नहीं देखने देती हूं। मैं अपने पुत्रवधु को पूरे आशीर्वाद के साथ ये सलाह देना चाहता हूं कि उनके अंदर दुर्गा का स्वरूप है कि जब व्याख्यान देने जाएं अपने दल के लोगों के बीच तो व्यथित ना हों, बेबस ना हों, लाचार ना हों और दुखी होकर पीड़ित नारी की तरह कामायनी में जो जयशंकर प्रसाद जी की जो कविता है, उसका भाव कुछ ऐसा है कि 'आज समझ तो पाई हूं मैं दुर्बलता में नारी हूं, अलौकिक कोमल सुंदरता लेकर मैं सबसे हारी हूं' और कहती हैं अरे शांत रहो अपना दुष्कर्म छोड़ो नहीं तो मैं भैया को कह दुंगी तो टीवी बंद करने के साथ-साथ इन दुष्ट कार्यकर्ताओं के कुकृत्य को भी बंद करने का उनको इश्वर हौसला दे कौशल दे ऐसी मेरी इश्वर से प्राथना है।

वासिंद्र मिश्र : इतनी नफरत क्यों है डिंपल को, डिंपल की शादी तो आपने कराई थी, डिंपल की शादी को लेकर शुरू में कहा जाता है कि मुलायम सिंह जी शायद तैयार नहीं थे तो उस अमर सिंह ने जिसने एक नई जिंदगी दी उस अमर सिंह के नाम को लेकर उस अमर सिंह के आवाज़ से उस अमर सिंह के चेहरे से इतनी नफरत क्यों है।

अमर सिंह : एक कहावत है ना 'अति सर्वत्र वर्जयेत' तो किसी भी चीज का अतिवाद सब जगह वर्जित है। पुरानी कहावत है बहुत ज्यादा नमक खाएंगे तो ब्लड प्रेशर हाई हो जाएगा। बहुत ज्यादा मिठाई खाएंगे तो डायबिटीज हो जाएगी तो बहुत ज्यादा अगर आप अतिरिक्त समर्पण दिखाएंगे तो आप की अवस्था उस कालीन तरह हो जाएगी जिसपर सब चलते हैं। आपकी नीयति उस कालीन की तरह हो जाएगी जिस पर अपना पांव सब रगड़ते हैं, चलते हैं और कालीन चुपचाप उस रगड़ को सहता है तो मेरी भी स्थिति यादव परिवार में यदुकुल में कुछ उस तरह की हो गई है कि मैं यदुकुल का कालीन स्वंय अपनी मर्जी से जैसा बना और मेरा हाल आप देखिए कि आज भी मुझे उस बात का भय है कि दो-दो बार निष्कासन के बावजूद यह मेरे अंदर की अच्छाई है कि मैं अगर मुलायम सिंह जी से मिलूंगा और मुलायम सिंह जी मुझे कुछ कह देंगे तो मैं विवश हो जाऊंगा, ये मेरी भावनात्मक कमजोरी है जिसका पूरा शोषण कैसे हो ये विधा मेरे पुराने बड़े भाई मुलायम सिंह जी को ज्ञात है।

वासिंद्र मिश्र : एक और चीजें जो आप लगातार बोलते रहते हैं। अंडरवर्ल्ड के बारे में माफिया के बारे में चाहे व्हाइट कॉलर माफिया हो या हार्डकोर माफिया हो, आपको डर नहीं लगता है इस तरह की बातें कहने में। आपके इस आत्मविश्वास के पीछे, इस आत्मिक सुरक्षा के पीछे क्या आधार है आपका।

अमर सिंह : देखिए, सबसे बड़ा आधार है कि ये अच्छा प्रश्न आपने पूछा। मैं इश्वर की शपथ खाकर कहता हूं कि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मेरे अच्छे संबंध थे। प्रधानमंत्री से मेरी एक बार भी ठीक से औपचारिक मुलाकात नहीं हुई। दो तीन बार उनके निजी स्टाफ में मुझे नाम भी याद है जगदीश शर्मा नाम का व्यक्ति उससे फोन पर मेरी बात जरूर हुई लेकिन मुझे समय नहीं मिल पाया या मुझे किसी कारण से उन्होंने समय नहीं दिया लेकिन एक दुष्प्रचार चल रहा है कि हमारी आत्मिक सुरक्षा या हमारा आत्मविश्वास इसके पीछे कोई बड़ी ताकत है और अगर बड़ी ताकत नहीं होती तो मैं इतनी बड़ी बातें इतने कड़े मन से कैसे कह सकता था। ये भी कहा गया कि मुझे जो सुरक्षा दी गई हमने डील कर ली। सत्य तो ये है कि मुझे सुरक्षा सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने दी थी। चिदंबरम बीच में हटा रहे थे तो मुझे विश्वस्त सूत्रों से पता चला कि राहुल गांधी ने हस्तक्षेप करके कहा कि उनकी सुरक्षा नहीं हटेगी बल्कि भारतीय जनता पार्टी में जब राजनाथ सिंह जी आए तो सुरक्षा तत्काल हटा ली गई। 

वासिंद्र मिश्र : राजनाथ सिंह जी किसी की मदद भी करते हैं।

अमर सिंह : उस पर मुझे टिप्पणी नहीं करना है। वो मेरे बड़े भाई हैं और वो थे हैं और रहेंगे। लेकिन उन्होंने हमारी सुरक्षा हटा ली उनके बाद प्रमोद तिवारी जी की सुरक्षा नहीं हटी उनकी सीआईएसएफ की सुरक्षा पूरे भारत में रही लेकिन वो बीजेपी के मध्यस्थ नहीं हैं, दलाल शब्द का इस्तेमाल नहीं करूंगा किसी के लिए ये घटिया शब्द है, मध्यस्थ कहूंग लेकिन मेरी सुरक्षा मनमोहन सिंह के वक्त चिदंबरम के वक्त चिदंबरम नहीं हटा पाए थे, भाई राजनाथ सिंह के गृह नेतृत्वकाल में हटा ली गई और बाद में जब आदरणीय रामगोपाल जी ने खुलेआम टीवी चैनलों पर ये कहा कि अमर सिंह में हिम्मत है तो यूपी में आएं और आकर सुरक्षित वापस चलें जाएं हमारे कार्यकर्ता उनको सुरक्षित वापस नहीं जाने देंगे। ये सीधे धमकी थी इसके बाद कोई भी स्टेट क्या करता और जिस तरह से प्रदर्शन हो रहे थे उग्र हिंसक दौर चल रहा था, उसके पूर्व हमारी जेड क्लास की सुरक्षा थी, उत्तर प्रदेश की जेड क्लास की पुलिस के स्थान पर सीआईएसएफ मुझे सिर्फ उत्तर प्रदेश के लिए मिली है। जहां तक आप भय की बात बोल रहे हैं तो भय तो है अभी कल ही मैं नवरंग हाउस में कस्तुरबा गांधी मार्ग में जहां मैं बैठता हूं नीचे उतर रहा था तो मुझे एक व्यक्ति मिला कहा कि 2009 में आप अमिताभ बच्चन और जया बच्चन के साथ दुबई के ऐड्रेस होटल में बाबा बच्चन नाम के एक बाबा से मिले थे और वहां पर मुस्तकीन नाम का एक आदमी भी था जो दाऊद का भाई है, उसके साथ आप लोगों की तस्वीर है मंगाई जा रही है, छपाई जाएगी तो बेहतर है आप चुप हो जाएं तो मैंने कहा जल्दी मंगावो, जल्दी छपावो। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी जी की भी एक अपराधी के साथ फोटो छप गई थी। नोटबंदी के बाद मौर्या होटल के परिसर में मैं खड़ा था, कोई व्यक्ति सेल्फी के नाम पर आकर मोदीजी को बहुत ही कुरक्षित भाषा में गाली दिया वो भी वायरल हो गई थी तो सार्वजनिक जीवन में जब हम इंडिगो के प्लेन में जाते हैं तो बगल में दाऊद का भाई है कि इकबाल मिर्ची का साला है, हमें क्या पता और सभी सेल्फी लेते हैं किसको मना करेंगे। चार्टड प्लेन में चलने की कुबत अखिलेश जी की होगी मेरी तो है नहीं, जहां पर पूर्ण निरापदता हो, पूरा शुद्धीकरण हो कि बगल में इकबाल मिर्ची है कि दाऊद इब्राहिम है कि हीना कैशर है कौन बैठा है क्या पता है। तो धमकियां मिलती है लेकिन एक चीज मैं आपको बता दूं कि अपराधी का मन बड़ा कमजोर होता है, वह सार्वजनिक जीवन में जिसकी बड़ी आवाज़ होती है उससे उलझना नहीं चाहता है और अगर उलझता है तो उसको घायल नहीं छोड़ता है, जैसा प्रभाकरण ने राजीव गांधी के साथ किया। पूरा का पूरा काम तमाम करता है तो इतना खुलासा करने के बाद कि हाफिज अल-दफाक डायमंड होटल दाऊद इब्रहाम से संबंध ये जो मैं बोल चुका हूं, अबू आसीम आज़मी के या आज़म खान के करीबी मुनौवर सलीम के निजी सचिव अजमत। मैं नहीं कह रहा हूं दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच में विस्फोट करने वाले आतंकवादियों की पनाहगाह अबू आसमी आज़मी का बंबई का घर था इस बात का प्रमाण कलमबंद है।

वासिंद्र मिश्र : हां, वो अरेस्ट भी हुआ।

अमर सिंह : नहीं, ये सब है तो ये नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी का काम है और मेरा एक सुझाव है आपके माध्यम से प्रधानमंत्री जी को और गृहमंत्री जी को दिल्ली के पुराने कमिश्नर एमएन सिंह के नेतृत्व में अगर एक टास्कफोर्स बना बांबे के पूर्व कमिश्नर के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स बना दें तो जितना ज्यादा अध्ययन उनका है सफेदपोश गुनहगारों के लिए एक-एक व्यक्ति का पूरा का पूरा कच्चा चिट्ठा बंबई के पूर्व आयुक्त एमएन सिंह के पास है कि किसका किससे कितना गहरा कितने इंच का, कितने फुट का, कितने सेंटीमीटर का संबंध है, उनको ये काम दें दें।

वासिंद्र मिश्र : अमर सिंह जी आपके बारे में एक बात ये भी कही जाती है कि आपने राजनीति में अपने समाज में क्षत्रिय समाज के लोगों को बहुत आगे बढ़ाया है और हर तरह से मदद की लेकिन जब जब आप राजनैतिक तौर पर संकट में आए तो आपके समाज के लोगों ने आपके साथ एकजुटता नहीं दिखाई और नहीं तो विरोध किया। वो चाहे आपका होम टाउन आज़मगढ़ हो, वहां से लेकर और दिल्ली और बंबई हर जगह।

अमर सिंह : कौन सी नई बात बता रहे हैं आप, महाराणा प्रताप के सगे भाई उनके विरुद्ध जलालुद्दीन अकबर से मिले गए उसके बाद मान सिंह वो भी क्षत्रिय थे। पृथ्वीराज चौहान का पतन जयचंद के कारण हुआ और सिकंदर जैसे योद्धा को पूर्वराज हरा नही पाते अगर रामभीग की बेइमानी नहीं होती। तो लोहा ही लोहा को काटता है, क्षत्रिय को अगर रोका है किसी ने तो उसके प्रतिद्वंदी क्षत्रिय के क्षत्रित्व ने ही रोका है और ये राज तंत्र की बीमारी है। क्षत्रिय माने राजपूत हम लोगों का संबंध सीधे राज्य से रहा है तो राजनीति का ये मूलमंत्र है। अब जुलियस सीजर भी देख लिजिए सेक्सपीयर का कि ब्रुटस ने ही मारा, कि जो आपके निकट का व्यक्ति होगा वहीं आपको धोखा देगा, उसी से आपको पीड़ा होगी। आप इंदिरा जी का जीवन देख लिजिए जिस सिद्धार्थ शंकर राय के कहने से उन्होंने आपात स्थिति लगाई, लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाया, ऐसे लोगों ने लोकसभा के कार्यपाल के विरुद्ध त्यागपत्र तक दिया। आपात स्थिति के निर्माण के मूल कारक रहे। सबसे पहले शाह कमीशन में गवाही देने वाले वही रहे, हमारे मित्र हैं, बड़े हैं हमसे बहुत आदर करता हूं। पूरे आपातकाल में डॉ. करण सिंह संजय गांधी के लोकप्रिय कार्यक्रम नसबंदी के स्वास्थ्य मंत्री रहे लेकिन 77 में इंदिरा जी जब हार गईं तो इंदिरा जी के विरुद्ध भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव वो लड़े। तो 'धीरज, धर्म, मित्र औऱ नारी आपातकाल परखिए चारी' ये तुलसीदास जी ने भी कह दिया है तो उसमें कौन सी नई बात है। क्षत्रिय हो या ब्राह्मण हो वैश्य हो या शुद्र हो ये आदमी की फितरत है कि आदमी स्वार्थ में आपके साथ रहता है। इसलिए, बार-बार मैं ये बात कहता हूं फिर कह रहा हूं 'गरज परस्त जहां में वफा तलाश ना कर,ये वो शय है जो बनी है किसी और जहां के लिए, ना तू ज़मी के लिए है ना है ना आसमां के लिए तेरा वजूद तो है सिर्फ दास्तां के लिए'।