जी मीडिया से खात बातचीत में उन्होंने बताया कि उनकी पढ़ाई चेरियाबरियारपुर बसी ग्राम के प्राथमिक विद्यालय से शुरू हूई. फिर वह नवोदय विद्यालय, फिर मुम्बई के चाणक्या सेंटर से पढ़ाई कर मर्चेंट नेवी में जॉब किए.
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नई दिल्ली/पटना : बिहार के लाल और उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी रवींद्र कुमार ने माउंट एवरेस्ट की चोटी पर दूसरी बार फतह हासिल की है. रवींद्र कुमार बिहार के बेगूसराय जिले के चेरियाबरियारपुर प्रखंड के बसही गांव निवासी शिवनंदन प्रसाद सिंह के बेटे हैं. इससे पहले उन्होंने वर्ष 2013 में माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल की थी. उनकी इस उपलब्धी पर जी मीडिया ने उनसे खास बातचीत की है.
जी मीडिया से खात बातचीत में उन्होंने बताया कि उनकी पढ़ाई चेरियाबरियारपुर बसी ग्राम के प्राथमिक विद्यालय से शुरू हूई. फिर वह नवोदय विद्यालय, फिर मुम्बई के चाणक्या सेंटर से पढ़ाई कर मर्चेंट नेवी में जॉब किए. लगभग 9 वर्षों तक यूरोपियन फिनावल स्पा में कार्यरत रहे फिर उन्होंने आईएस की पढ़ाई की और पास करने के बाद सिक्किम में उनका पोस्टिंग हूई. वहीं से उन्हें इसका शौक लगा.
सवाल- सिक्किम जाने के बाद ही आपको लगा कि आप कुछ अलग भी कर सकते हैं?
जवाब- जी हां, सिक्किम जाने के बाद मैंने वहां के बारे मे खूब पढ़ा. वहां जाकर मुझे मालूम हूआ कि यहां भूकंप आया था तो उस वक्त बहुत सारे पर्वतारोही को राहत और बचाव कार्य में योगदान देने के लिए बुलाया गया. मैंने सोचा क्यों न मैं भी सीख लूं. अगर भविष्य में कभी जरुरत पड़ी तो किसी की मदद तो कर सकूंगा. फिर मैंने ट्रेनिंग करने की सोचा. कुछ और करने की सोच ने इसी सोच ने एवरेस्ट के लिए प्रेरित किया. मैंने सोचा आईआईटी किया आईएएस किया तो बस ये भी कर सकता हूं.
उनका मनना है कि कुछ भी दुनिया में असंभव नहीं है. इसलिए बचपन से उन्होंने बहुत तप किया. सकारात्मक सोच को हमेशा आगे रखा. यही उनके लिए अहम रहा.
सिक्किम जाने के बाद पहली बार कब शुरुआत की?
इसके लिए मेंटल और फिजिकल फिट होना सबसे अहम है. लोगों को कभी भी हार नहीं माननी चाहिए. इसी सोच को आगे रख जब आप सोचेंगे तो कामयाबी मिलेगी. मैंने हमेशा जो सोचा उसे पूरा किया.
क्या बिहार के आप दूसरे दशरथ मांझी हैं कि जो ठाना वह पूरा किया?
मेरी उपलब्धि उतनी बड़ी नहीं है जितनी बड़ी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, धीरू भाई अंबानी, अब्दुल कलाम जी की रही है. मुझे इन्हीं बड़े लोगों से प्रेरणा मिली. उन लोगों के बड़े काम ने मुझे इसके के लिए प्रेरित किया.
पहली बार 2013 में फिर 2015 में जो पूरा नहीं कर पाए, फिर 2019 में कैसे संभव हुआ?
सबसे बड़ी बात है कि फिजिकल और मेंटल लेबल के साथ ऐक्वॉमिक जरुरत भी बहुत थी. जिसमें मुझे सबसे ज़्यादा परेशानी हूई. क्योंकि पहले सिक्किम सरकार की तरफ से जाने के लिए मेरा सेलेक्शन हूआ. मुझे उस समय झटका लगा जब पता टचला कि सिक्किम सरकार का प्लान कैंसिल हो गया. फिर परेशानी बढ़ गई. मुझे अचानक 15 लाख रुपये इक्कठा करने के लिए कहा गया. मैंने अपने जॉब से पांच लाख रुपये बचाए थे. इसके बाद प्राइवेट लोन लिया. भाई से पैसे लिए. मैंने पैसों का इंतज़ाम किया और फिर गया.
माउंट एवरेस्ट फतह करने का सफर कैसा रहा?
ये तो साफ है कि वह बहुत ही मुश्किल सफर है. तापमान माइनस में रहता है. हवा का दवाब भी बदलता रहता है. माहौल में अंतर रहता है. हवा का दबाव भी बहुत होता है. वहां जाते वक्त रास्ते में आपको डेड बॉडी मिल दिख जाएगी. वहां डिकंपोज नहीं हो सकता है. 10 से 15 साल पुरानी बॉडी होती है. मैंने भी डेड बॉडी देखी. आपके हिम्मत की परिक्षा तभी होती है. आपको बिना डरे आगे बढ़ना होता है.
2013 में मैंने अपनी यात्रा पूरी कर ली थी. फिर 2015 में आधे रास्ते से वापस आना पड़ा, क्योंकि उस वक्त ही नेपाल में त्रासदी आने की वजह से वापस आना पड़ा.
इस बार क्या सोचकर आप गए थे अपनी यात्रा पर?
हिंदुस्तान के लोग जल संचय को समझें. पानी के दुरुपयोग से बचें. क्योंकि यहां पानी का बहुत दुरुपयोग होता है. इसी कारण से संकट के बादल मंडराते हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार भी इन मुद्दों को लेकर बहुत चिंतित है.