Bihar Congress: 2014 और 2019 से भी दयनीय स्थिति में पहुंची कांग्रेस, बिहार में तो विलुप्त होने की कगार पर पहुंची पार्टी!
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Bihar Congress: 2014 और 2019 से भी दयनीय स्थिति में पहुंची कांग्रेस, बिहार में तो विलुप्त होने की कगार पर पहुंची पार्टी!

Bihar Congress: राजद अध्यक्ष लालू यादव ने सीटों का बंटवारा इस तरह से किया है कि तमाम कांग्रेसी नेता बेटिकट हो गए. पूर्णिया से पप्पू यादव, बेगूसराय से कन्हैया कुमार, मुजफ्फरपुर से आकाश सिंह और औरंगाबाद सीट से निखिल कुमार का चुनाव लड़ने वाला सपना चकनाचूर हो गया है.

कांग्रेस की दयनीय स्थिति!

Bihar Congress: बिहार में काफी मशक्कत के बाद आखिरकार महागठबंधन में सीट बंटवारे पर समझौता हो गया है. प्रदेश की 40 लोकसभा सीटों में आरजेडी 26, कांग्रेस 9 और वामपंथी दल 5 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे. कांग्रेस के खाते में किशनगंज, कटिहार, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, पश्चिमी चंपारण, पटना साहिब, सासाराम, महाराजगंज और समस्तीपुर सीट आई हैं. इस तरह लालू यादव ने सीट शेयरिंग पर फाइनल मुहर लगा दी है. वैसे पिछले लोकसभा चुनाव में भी लालू ने कांग्रेस को 9 सीटें ही दी थीं. लेकिन इस कांग्रेस जिन सीटों पर बेहतर चुनावी मुकाबला कर सकती थी, उनमें से कई सीटें राजद अध्यक्ष ने अपने पास रख ली हैं. सीटों की इस अदला-बदली से कांग्रेस के तमाम दिग्गज नेताओं के चुनाव लड़ने की उम्मीदें धूमिल हो गई है. 

बता दें कि 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में महागठबंधन में राजद 19, कांग्रेस 9, उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा 5, जीतन राम मांझी की हम 5 और मुकेश सहनी की वीआईपी 3 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. उस वक्त महागठबंधन मे वामदल शामिल नहीं थे. वहीं एनडीए में बीजेपी, जेडीयू और लोजपा शामिल थी. एनडीए ने प्रदेश की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की थी. महागठबंधन को सिर्फ एक सीट मिली थी. वो भी कांग्रेस ने जीती थी और राजद का खाता तक नहीं खुला था. वहीं 2014 के लोकसभा चुनाव में सभी प्रमुख दलों ने अकेले चुनाव लड़ा था. हालांकि एनडीए में बीजेपी के साथ उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा और राम विलास पासवान की लोजपा शामिल थी. उस चुनाव में एनडीए ने राज्य में 40 लोकसभा सीटों में से 31 सीटें जीतकर और कांग्रेस, राजद और जेडीयू सहित विपक्षी दलों का सफाया कर दिया था, जो उस समय विपक्ष में थे. राजद को 4 सीटें, जेडीयू और कांग्रेस को 2-2 सीटें और एनसीपी को एक सीट मिली थी. 

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इस बार महागठबंधन में सीट बंटवारा होते ही कई दिग्गज नेताओं का खेल पूरी तरह से बिगड़ गया है. लालू ने पूर्णिया कांग्रेस को देने के बजाय अपने पास रखी है. इससे कांग्रेस के नए-नवेले नेता पप्पू यादव के सारे अरमानों पर पानी फिर गया. इतना ही नहीं राजद अध्यक्ष ने मधेपुरा सीट को भी अपने पास रखकर पप्पू यादव के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं. यही नहीं आरजेडी ने सुपौल सीट भी अपने खाते में रखी है, जहां से पप्पू यादव की पत्नी रंजीता रंजन 2009 में सांसद रही हैं. पप्पू यादव तो पूर्णिया सीट से चुनाव लड़ने की ख्वाहिश लेकर ही कांग्रेस में आए थे और हाल ही में अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय किया था. उन्हें पूरी उम्मीद थी कि महागठबंधन से पूर्णिया से प्रत्याशी वही होंगे, लेकिन लालू यादव ने उनके साथ खेला कर दिया और इस सीट से बीमा भारती को टिकट दे दिया. 

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पप्पू यादव अब भी चुनाव लड़ने की जिद पर अड़े हैं और फ्रेंडली फाइट की बात कर रहे हैं. कांग्रेस रजामंद नहीं होती है तो उनके पास विकल्प निर्दलीय चुनाव लड़ने का होगा. कांग्रेस की फटकार के बाद भी पप्पू यादव पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. अब उन्होंने ऐलान किया है कि वो 4 अप्रैल को पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर नामांकन करेंगे. हालांकि, इससे पहले उन्होंने लालू यादव से आग्रह किया है कि वो पूर्णिया की सीट कांग्रेस के लिए छोड़ दें. पप्पू यादव ने कहा कि मैं भी आपका ही परिवार हूं लालू जी, सिर्फ 4 बच्चों को फैमिली मत समझिए. पूर्णिया सीट कांग्रेस को दे दीजिए.

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बेगूसराय में सीपीआई ने अपना कैंडिडेट उतारकर कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार के सपनों पर पानी फेर दिया. इस सीट से वह चुनाव लड़ने का सपना देख रहे थे और जो 2019 में नहीं कर पाए वह करने का ख्वाब संजोये हुए थे. पूर्व राज्यपाल और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता निखिल कुमार एक बार फिर से सक्रिय राजनीति में हाथ आजमाना चाहते थे और औरंगाबाद सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे. मुजफ्फरपुर सीट से आकाश सिंह और वाल्मिकी नगर से प्रवेश कुमार मिश्रा भी कुछ इसी तरह की इच्छा रखते थे. लेकिन महागठबंधन में सभी को निराशा हाथ लगी है. 

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