Bihar Hill: गया शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर बेलागंज प्रखंड में कौवाडोल गांव स्थित है, जहां कौवाडोल पहाड़ी है. स्थानीय लोगों के अनुसार, करीब 1902 के आसपास कुछ वैज्ञानिकों ने इस पहाड़ी का दौरा किया था. इसमें ब्रिटिश इंजीनियर अलेक्जैंडर कनिंघर और पुरातत्वविद मेजर किष्टी प्रमुख थे.
इतिहासकार बताते हैं कि 1811-12 में ब्रिटिश वैज्ञानिक फ्रांसिस बुकान ने ईस्ट इंडिया कंपनी के दौरान इस पहाडी का दौरा किया था. हालांकि, पहाड़ी का नाम कौवाडोल 1902 के आसपास पड़ा. इसके पीछे एक अजीब कहानी है. जिसे जानकर लोगों को यकिन करना मुश्किल हो सकता है.
इतिहासकार के अनुसार, कौवाडोल पहाड़ी का जिक्र इतिहास में मिलता है. इंसेंट नाम की एक किताब जै डीआर पाटील ने लिखी है. यह किताब ब्रिटिश लाइब्रेरी पटना में रखी गई है. इस किताब के पेज नंबर 198 और 199 हर कौवाडोल पहाड़ी के बारे में बताया गया है.
कौवाडोल पहाड़ी पर चारों ओर चट्टानों पर देवी-देवताओं की आकृतियां बनाई गई है. कुछ पत्थरों पर शिवलिंग भी बनाए गए है. ये आकृतियां पाल वंश से जुड़ी मानी जाती है. अगर इस पहाड़ी की खुदाई की जाए तो माना जाता है जमीन के अंदर और भी मूर्तियां मिल सकती है.
कहानी के अनुसार, एक बार ब्रिटिश इंजीनियर अलेक्जैंडर कनिंघर ने देखा एक कौआ जब पहाड़ी पर बैठा तो एक बड़ा पत्थर हिल गया. यह देख कर वह बहुत हैरान हुए कि एक छोटे कौए के बैठने से पत्थर कैसे हिल सकता है. इस घटना की जांच कई वैज्ञानिकों ने की, लेकिन कोई सबूत नहीं मिला.
स्थानीय लोगों के अनुसार, करीब 1902 के आसपास कुछ वैज्ञानिकों ने इस पहाड़ी का दौरा किया था. इसमें ब्रिटिश इंजीनियर अलेक्जैंडर कनिंघर और पुरातत्वविद मेजर किष्टी प्रमुख थे. कहा जाता है जब ये वैज्ञानिक पहाड़ी पर आए तो एक कौए का झुंड़ पहाड़ की गुफा से निकला और चोटी पर बैठ गया. कौवे बार-बार बैठते और उठते रहे जिससे पत्थर हिलता रहा गिरा नहीं.