पटना: Bihar Politics: 2017 और 2023, दो बार बड़ी शिद्दत से जनता दल यूनाइटेड को तोड़ने की प्ला​निंग हुई. यह प्लानिंग किसी और ने नहीं, खांटी राजनीतिज्ञ लालू प्रसाद की देखरेख में बनाई गई लेकिन जेडीयू है कि टूटती ही नहीं. लालू प्रसाद यादव भी सोच रहे होंगे कि ​फैविकॉल का जोड़ है क्या कि यह पार्टी टूट ही नहीं पा रही. ऐसे समय में जब बीजेपी ने जानें कितने राज्यों में विपक्षी दलों के जोड़तोड़ का फायदा उठाकर सरकारें बना ली, बिहार में वह भी अफसल रही. भाजपा पर भी आरोप लगता रहा कि वह राज्य में आपरेशन कमल को मूर्त रूप देने की कोशिश कर रही है लेकिन पार्टी ने हमेशा से इससे इनकार किया. लालू प्रसाद यादव बड़ी शिद्दत से तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनवाने में लगे हुए हैं लेकिन भाग्य है कि बिहार के डिप्टी सीएम का साथ ही नहीं दे रहा है.


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2017 में जब नीतीश कुमार राजद और कांग्रेस से अलग होने की सोच रहे थे और वापस एनडीए में जाकर सरकार बनाने की मंशा से आगे बढ़ रहे थे. तब अचानक तेजस्वी यादव ने राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी से मिलने का समय मांगा. वो तो गनीमत रही कि राज्यपाल अचानक बीमार हो गए और तेजस्वी यादव की मंशा फेल हो गई. राज्यपाल जब अस्पताल से दुरुस्त होकर आए तब तक नीतीश कुमार महागठबंधन से नाता तोड़ चुके थे और उनसे मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया. राज्यपाल ने तत्काल शपथ ग्रहण भी करा दिया था. इस तरह बिहार में जेडीयू में तोड़फोड़ मचाने की तेजस्वी यादव की मंशा पर पूर्णविराम लग गया. 



कुछ साल बाद आरसीपी सिंह जेडीयू के अध्यक्ष बने तो ललन सिंह गुट ने उन पर आरोप लगाना शुरू कर दिया कि वे भाजपा के इशारे पर काम कर रहे हैं. उस समय आरसीपी सिंह जेडीयू अध्यक्ष होने के साथ साथ मोदी सरकार में मंत्री भी थे. ललन सिंह के आरोपों से तब सहमति जताते हुए नीतीश कुमार ने उनसे अध्यक्ष पद से इस्तीफा ले लिया और ललन सिंह पार्टी के सर्वोच्च पद पर काबिज हो गए. ललन सिंह अध्यक्ष क्या बने, आरसीपी सिंह और उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं के बुरे दिन शुरू हो गए. ललन सिंह गुट का आरोप था कि ये दोनों नेता भाजपा के इशारों पर काम कर रहे हैं और पार्टी को दोफाड़ करने की फिराक में हैं. खुद नीतीश कुमार ने भी सार्वजनिक रूप से यह बोल दिया कि ये लोग किसी और के कहने पर काम कर रहे हैं. दोनों नेताओं को बाहर जाना पड़ा. ललन सिंह पार्टी में इकलौते नंबर 2 नेता बच गए. 


उसके बाद ललन सिंह को किसी 2 नंबरी नेता से खतरा नहीं था तो वे पार्टी को अपने हिसाब से चलाने लगे. स्थापत्य काल से ही भाजपा के नजदीक रही जेडीयू को ललन सिंह राजद के काफी करीब ले गए. पार्टी के दूसरे नेताओं को यह बात नागवार गुजरती रही तो वे खुद ही लालू प्रसाद एंड फैमिली के करीबी होते चले गए. नौबत यहां तक पहुंच गई कि उन्होंने तेजस्वी यादव को डिप्टी सीएम के बदले मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव नीतीश कुमार के सामने पेश कर दिया, जिसे नीतीश कुमार ने कैंसिल कर दिया. उसके बाद मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ललन सिंह ने प्लान बी पर काम शुरू कर दिया. पटना में 12 विधायकों की एक गुप्त बैठक बुलाई गई और पार्टी में तोड़फोड़ मचाने की कोशिश शुरू हो गई. 


वो तो गनीमत रही उस बागी विधायक की, जो पटना की गुप्त बैठक का राजदार था और उसने सारी बात नीतीश कुमार को बता दी. नीतीश कुमार को जैसे काटो तो खून नहीं. नीतीश कुमार भी कमजोर खिलाड़ी तो हैं नहीं. लालू प्रसाद और ललन सिंह की सारी प्लानिंग की हवा निकालने की तैयारी कर ली. इंडिया ब्लॉक की बैठक के बाद उन्होंने आनन फानन जेडीयू कार्यकारिणी और जेडीयू राष्ट्रीय परिषद की बैठक बुला ली. मीडिया में कयासबाजियों का दौर शुरू हो गया. ललन सिंह से नीतीश कुमार की नाराजगी की खबरें आम होती चली गईं. 


हालांकि अंत समय तक ललन सिंह इसका आरोप भाजपा समर्थित मीडिया के एक बड़े वर्ग पर लगाते रहे लेकिन जब जेडीयू की कार्यकारिणी की बैठक शुरू हुई, उसके कुछ मिनट बाद ही ललन सिंह का इस्तीफा आ गया और नीतीश कुमार की ताजपोशी हो गई. दोपहर बाद हुई राष्ट्रीय परिषद की बैठक में इसका औपचारिक ऐलान भी कर दिया गया. इस तरह नीतीश कुमार ने अपनी सूझबूझ से न केवल 2017 में अपनी सरकार और पार्टी बचा ली बल्कि 2023 में भी उन्होंने इसी तरह का करिश्मा दिखाने में सफलता हासिल कर ली. अब देखना यह है कि ललन सिंह का पार्टी में क्या भविष्य होता है.