सरना क्या है? झारखंड में क्यों उठ रही नए धर्म की मांग

आदिवासी बहुल सूबा झारखंड में समुदाय के लोग जनगणना में सरना कोड की मांग काफी समय से कर रहे हैं. वहीं, झारखंड की नई सरकार में शामिल होने जा रही जेवीएम ने इसे अपने घोषणा पत्र में भी शामिल किया है. 

सरना क्या है? झारखंड में क्यों उठ रही नए धर्म की मांग
झारखंड में आदिवासी जनगणना में सरना कोड की मांग काफी समय से कर रहे हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

नई दिल्ली: 'सरना' आदिवासी समुदाय के धर्म का नाम है जिसमें प्रकृति की उपासना की जाती है. आदिवासी बहुल सूबा झारखंड में समुदाय के लोग जनगणना में सरना कोड की मांग काफी समय से कर रहे हैं, लेकिन अब इस मांग ने जोर पकड़ लिया है. झारखंड की नई सरकार में शामिल होने जा रहे जेवीएम (झारखंड विकास मोर्चा) ने इसे अपने घोषणा पत्र में भी शामिल किया है. 

ऐसे में प्रदेश में बनने जा रही नई सरकार में सरना कोड को लेकर क्या रवैया रहता है यह आने वाले दिनों में देखने वाली बात होगी और इसी से तय होगा कि देश में 'सरना' एक नए धर्म के रूप में सामने आएगा या नहीं. 

हजारीबाग विश्वविद्यालय के नृविज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) के प्रोफेसर डॉ. जी. एन. झा ने आईएएनएस से कहा, 'झारखंड में जनगणना में सरना कोड लागू करने की मांग काफी समय से चली आ रही है. सरना एक धर्म है जो प्रकृतिवाद पर आधारित है और सरना धर्मावलंबी प्रकृति के उपासक होते हैं.'

उन्होंने बताया कि झारखंड में 32 जनजाति हैं जिनमें से आठ पीवीटीजी (परटिकुलरली वनरेबल ट्राइबल ग्रुप) हैं. यह सभी जनजाति हिंदू की ही कैटेगरी में आते हैं, लेकिन इनमें से जो ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके हैं, वे अपने धर्म के कोड में ईसाई लिखते हैं.

झारखंड के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि यह भी एक कारण है कि आदिवासी समुदाय अपनी धार्मिक पहचान को बनाए रखने के लिए सरना कोड की मांग कर रहे हैं. 

प्रदेश में अब तक तीन जनजाति के लोग मुख्यमंत्री बन चुके हैं, जिनमें मुंडा जनजाति से बाबूलाल मरांडी, संथाल से शिबू सोरेन और कोड़ा जनजाति से मधुकोड़ा मुख्यमंत्री बने हैं. रघुवर दास पहले मुख्यमंत्री रहे जो गैर-जनजाति समुदाय के हैं.

झारखंड की सत्ता फिर संथाल जनजाति के शिबू सोरेन के पुत्र हेमंत सोरेन संभालने जा रहे हैं और जेवीएम सरकार का हिस्सा बनेगा, जिसने अपने घोषणा पत्र में सरना कोड लागू करने की बात कही है. 

एक अधिकारी ने नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर कहा कि जनगणना में झारखंड के आदिवासियों को अलग से धर्म कोड नहीं दिया जा सकता और उन्हें अब तक निर्धारित छह धार्मिक कोडों में से ही किसी एक को चुनना पड़ेगा, क्योंकि रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने कहा है कि फिलहाल पृथक धर्म कोड की श्रेणी बनाना व्यावहारिक नहीं होगा. 

राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा के धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने मीडिया से बातचीत में एक बार दावा किया था कि झारखंड में 62 लाख सरना आदिवासी हैं. रांची महानगर सरना प्रार्थना सभा ने मिशन 2021 के तहत अपने स्तर पर झारखंड के सरना आदिवासियों की जनगणना करवा रही है. 

बताया जाता है कि वर्ष 2011 की जनगणना में झारखंड के 42 लाख और देश भर के छह करोड़ लोगों ने अपना धर्म सरना लिखाया था, जिसे अन्य में शामिल किया गया. सरना धर्मकोड की मांग में एक-एक करोड़ की आबादी वाले गोंड और भील आदिवासियों को शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि वे अपना अलग धर्म मानते हैं. 

साल 2001 में हुई जनगणना के लिए जो निर्देश जारी किए गए थे, उसमें हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन इन छह धर्मो को 1 से 6 तक के कोड नंबर दिए गए थे. उसमें लिखा गया था कि अन्य धर्मो के लिए धर्म का नाम लिखें, लेकिन कोई कोड नंबर न दें. 2011 की जनगणना में भी इसी तरह की पद्धति अपनाई गई थी.

आदिवासियों का कहना है कि 1951 में पहली जनगणना में आदिवासियों के लिए धर्म के कॉलम में नौवें नंबर पर 'ट्राइब' उपलब्ध था, जिसे बाद में खत्म कर दिया गया. अब आदिवासियों का कहना है कि इसे हटाने की वजह से आदिवासियों की गिनती अलग-अलग धर्मो में बंटती गई जिसके चलते उनके समुदाय को काफी नुकसान हुआ है.